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हिलेरी के समर्थन में अमेरिकी मीडिया की हवाबाजी

हिलेरी क्लिंटन के पक्ष में जहां 57 अखबारों ने विज्ञापन दिया है, वहीं रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष सिर्फ 11 अखबारों ने विज्ञापन दिया है

Updated On: Nov 21, 2016 08:19 AM IST

Apoorva Sripathi

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हिलेरी के समर्थन में अमेरिकी मीडिया की हवाबाजी

7 नवंबर तक अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन के पक्ष में जहां 57 अखबारों ने विज्ञापन दिया है, वहीं रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष सिर्फ 11 अखबारों ने विज्ञापन दिया है. जिनमें क्रुसेडर जैसे छोटे अखबार भी शामिल हैं, जो केकेके का आधिकारिक माउथ पीस है.

इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं है कि ट्रंप के समर्थन में काफी कम अखबार सामने आए हैं, जबकि ज्यादा आश्चर्य ये है कि आखिर ये थोड़े से अखबार भी ट्रंप के समर्थन में कैसे हैं? हालांकि क्रुसेडर द्वारा ट्रंप का समर्थन करना कोई अजूबा नहीं है.

इसकी तुलना उस थोड़े से समर्थन से की जा सकती है, जो ट्रंप को अफ्रीकन-अमेरिकन समुदाय से मिल रही है, जो कथित तौर पर सिर्फ 2 प्रतिशत है. जैसा कि ट्रेवर नोआह ने अपने कार्यक्रम द डेली शो में कहा. (यहां फिर से ये बड़ा रहस्य है कि आखिर ये दो प्रतिशत लोग कौन हैं?)

कई मीडिया आउटलेट्स खुलकर क्लिंटन के समर्थन में सामने आए हैं, कई के लिए तो ये पहला मौका है. एटलांटिक के लिए ये तीसरा मौका है, 1857 में अपनी स्थापना के बाद.

(क्लिंटन से पहले वे अब्राहम लिंकन, बैरी गोल्डवॉटर का समर्थन कर चुके हैं). नौ अखबार जो साल 2012 में मिट रोमनी का समर्थन कर चुके हैं, उन्होंने साल 2016 में परंपरा तोड़ते हुए हिलेरी क्लिंटन का समर्थन किया है. जबकि जिन्होंने पहले ओबामा का अनुमोदन किया था, वे अभी तक ट्रंप के समर्थन में नहीं आए हैं.

सारा मीडिया दोफाड़

ये पूरा खेल ध्रुवीकृत हो रहा है और क्लिंटन इस राउंड को जीत रही हैं. लेकिन सवाल ये है कि आज जब इन अखबारों की विश्वसनीयता, सोशल मीडिया के दौर में संदेहास्पद है तो इनके समर्थन का कितना मूल्य है? हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हम सब ऐसे समय में रह रहे हैं कि जब राजनीति में ध्रुवीकरण हावी है.

जहां तक अखबारों की बात है तो वे एक तरह से वोटर को जानकारी देना अपनी जिम्मेदारी समझते हैं. इन अखबारों को लगता है कि वोटर को नैतिक रुप से निर्णय लेने में मदद करना उनकी नैतिक जिम्मेदारी है, और कौन जाने ऐसा कर के वे चुनाव में कोई बड़ा बदलाव ला पाएं.

बीबीसी इस धारणा को मौजूदा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में ‘क्रॉसओवर एंडोर्समेंट्स’ के रुप में समझाती है, जहां पारंपरिक रुप से एक रूढ़िवादी अखबार ट्रंप का समर्थन करने से इसलिए मना कर देता है क्योंकि उसे लगता है कि, ट्रंप एक ‘टिपिकल रिपब्लिकन’ प्रत्याशी नहीं है.

ऐसा कर के वो अपने संपादकीय नीति और सिद्धांतों से भी दूर नहीं होते और दूसरी तरफ लोकतंत्र का मजबूत खंभा भी बने रहते हैं.

अखबारों का रोल अहम

ब्राउन यूनिवर्सिटी के दो अर्थशास्त्री ब्रायन नाइट और चुंग फांग चियांग उस इलाके में रहते थे, जहां के वोटर अखबारों के विज्ञापन से प्रभावित होते थे. जवाब हां में था. मतदाता उन्हीं प्रत्याशी को चुना करते थे, जिनका अनुमोदन अखबार किया करता था. लेकिन इसके लिए ये जरूरी होता है कि अखबार कितना भरोसेमंद है.

इस शोध में इन अखबारों के पूर्वग्रहों पर भी ध्यान दिया गया था. मसलन दक्षिणपंथ की तरफ झुके या तटस्थ रहने वाला अखबार अगर एक डेमोक्रेट का समर्थन करता है तो मतदाता उसे ज्यादा तरजीह देता है.

इस चुनाव में एक गैर-पारंपरिक आदमी शामिल है जिसका नाम है डोनाल्ड ट्रंप. चूंकि वो एक गैर पारंपरिक व्यक्ति ही नहीं बल्कि रिपब्लिकन प्रत्याशी भी है. इस कारण ये समर्थन वाली बात चर्चा में आयी है. ये भले ही चुनाव नतीजों को क्लिंटन के पक्ष में न करे पर उस पर महत्वपूर्ण असर तो डालेगी ही.

इन नेताओं को पक्ष में स्वीकृति देने वाले सिर्फ अखबार ही नहीं है. कई टीवी चैनलों पर देर रात दिखाए जाने वाले कार्यक्रम भी इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. इनमें जॉन स्टुअर्ट शामिल हैं जिन्होंने एक तरह से देर रात के कार्यक्रमों में कॉमेडी की परत के साथ पॉलिटिकल टीका-टिप्पणी करनी शुरू की थी.

स्टीवन कोलबेयर स्टीवन कोलबेयर

लगभग 16 सालों तक स्टुअर्ट का पॉलिटिकल व्यंग्य टीवी पर छाया रहा. जिसे अब आगे ले जाने का काम जॉन ऑलिवर कर रहे हैं और कुछ हद उनका साथ सामंथा बी भी दे रही हैं जो ‘लोन वुमन’ का नजरिया सामने ला रही हैं.

स्टीवन कोलबेयर का ‘द कोलबेयर रिपोर्ट’ में दिखने वाला अवतार दक्षिणपंथ पर अपने आप में तीखा व्यंग्य था. हालांकि अपने नए कार्यक्रम ‘द लेट शो’ में वह थोड़ा नर्म नजर आते हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने ट्रंप के साथ नरमी नहीं बरती है.

एसएनएल वीकेंड अपडेट’ के बाद ‘एनबीसी लेट नाइट’ की एंकरिंग कर रहे सेथ मायर्स भी अब सेलिब्रिटी इंटरव्यू की जगह राजनैतिक विश्लेषण पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. वे अक्सर अपने कार्यक्रम में इन प्रत्याशियों से जुड़े स्कैंडल्स की बात करती हैं. इनके अलावा जिमी किमल, जिमी फैलोन, जेम्स कॉर्डन और कॉनन ओ ब्रायन अभी रेस में काफी पीछे हैं.

जॉन स्टीवर्ट की उत्तराधिकारी ट्रेवर नोआह उनकी जगह लेने की भरपूर कोशिश करने बावजूद चुनौती का सामना कर रहे हैं. पहला तो ये कि उनके पूर्ववर्ती दक्षिण अफ्रीकी कॉमेडियन जहां एक गोरे और स्विस जर्मन पिता और खोसा व आधी यहूदी मां के संतान थे. उनकी मौजूदगी का मतलब था गोरों के खेल में एक मिक्सड नस्ल का आदमी अपनी जगह बनाने की कोशिश में लगा है.

दूसरा उनका दक्षिण अफ्रीकी होने का मतलब ये होता था कि एक बाहरी आदमी अंदर घुसने की कोशिश में है. तीसरा, एक अश्वेत एंकर होने के कारण उनपर अपने लोगों का प्रतिनिधित्व करने की भी बड़ी जिम्मेदारी होती थी, और ये भी कि वे उन्हें निराश न करें, ऐसा होने पर उनकी नियुक्ति को ही देश की बहुरूपता के लिए की गई कोशिश मानी जाएगी.

इन सब में जो एक चीज सामान्य है वो है सीधे या अचेतन तौर पर हिलेरी के समर्थन और ट्रंप के विरोध में केस बनाना. हालांकि क्लिंटन को लेकर भी इनके मन में कई तरह के पूर्वाग्रह है, वे नहीं मानते हैं कि वे सबसे अच्छी प्रत्याशी हैं. कॉलबर्ट ने अपने कार्यक्रम में एक सेगमेंट सिर्फ इसपर चलाया कि, हिलेरी कितनी बेईमान हैं.

किसी को नहीं छोड़ते

ऑलिवर ने भी उन्हें नहीं छोड़ा और कहा कि ट्रंप जितना बुरा न होना, पास होने के मापदंड नहीं है. नोआह ने हिलेरी की रोबोट जैसे बर्ताव का मजाक उड़ाया. जॉन स्टीवर्ट ने भी अपने कार्यक्रम में हिलेरी को लेकर अपनी आशंकाओं को सामने रखा. लेकिन इस सबके बावजूद ये सब एकमत से ट्रंप के खिलाफ खड़े हैं.

देर रात में दिखाए जाने वाले इन कार्यक्रमों के अलावा, एसएनएल और एमी शुमर के स्टैंड-अप कॉमेडी शो में भी राजनैतिक ध्रुवीकरण किया जा रहा है, इस बात को भूलकर की इसका विपरीत नतीजा बाद में सामने आ सकता है.

शुमर के फ्लोरिडा शो में उस वक्त 200 लोग वॉक आउट कर गए जब उन्होंने ट्रंप का मजाक उड़ाते हुए उन्हें ‘ऑरेंज, सेक्सुअल एसॉल्टिंग, फेक-कॉलेज-स्टार्टिंग मॉनस्टर’ कहा था.

एसएनएल, ने पिछले साल ट्रंप को अपने शो का एक एपिसोड होस्ट करने का भी न्योता दिया था जिसका लोगों ने खूब विरोध किया था. जिसके बाद शो के आयोजकों ने ट्रंप के खूब सारे कार्टून भी बनाए जिसमें उनकी नकल की गई थी. इन सब ने ट्रंप को भी काफी नाराज कर दिया था और उन्होंने इसे बेमजा बताया था.

शेवी चेज शेवी चेज

इस चित्रण पर ट्रंप के गुस्से की वजह दो थी. पहला, ये कि उन्होंने एक स्केच कॉमेडी शो को राजनीति राय देने का अधिकारी नहीं माना था. हालांकि, ऐसा न होना पूरी तरह से असंभव है क्योंकि एसएनएल हमेशा से अपने देश के चुनावों की आलोचना करता रहा है.

रंगीन इतिहास

मनोरंजन और राजनीति हमेशा से साथ-साथ चलते रहे हैं-इस मामले में अमेरिका और भारत बिल्कुल एक जैसे हैं, हमें ज्यादा दूर जाने की भी जरूरत नहीं है, इसके लिए जेएफके-सिनात्रा का रिश्ता और उसका मर्लिन मुनरो द्वारा ग्लैमराईजेशन किया जाना अच्छा उदाहरण है.

या फिर शेवी चेज द्वारा गेराल्ड फोर्ड का चित्रण, जिसने फोर्ड को अमेरिकी जनता के करीब ला दिया था. इसकी एक दूसरी वजह ये है कि देर रात चलने वाले ये शो जो कि मूलत: उदार होते हैं, उनसे आमतौर पर ऐसी उम्मीद होती है कि वे राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों का मज़ाक ही उड़ाए, खासकर अगर वो दक्षिणपंथी, नस्लभेदी और अज्ञात ताकतों से डरने वाला हो- ऐसे लोगों की आलोचना ट्रंप के लिए सामान्य बात है, और जिस तरह से वे खबरों में छाए रहते हैं- इससे बचना भी मुश्किल है.

इस तरह अगर कहा जाए तो अमेरिकी टीवी चैनल्स हमेशा से लोगों की राय बनाने का काम करते रहे हैं और 2016 चुनाव भी इससे अछूता नहीं है.

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