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किम जोंग और डोनाल्ड ट्रंप की 12 जून की मुलाकात दुनिया के लिए ‘ड्रीम-डेट’ से कम नहीं

बारूद के ढेर पर सिर्फ एक चिंगारी की कमी बाकी थी जो किसी भी वक्त पूरी दुनिया को सबसे बड़ी जंग के शोलों में झोंक सकती थी

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: May 11, 2018 01:13 PM IST

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किम जोंग और डोनाल्ड ट्रंप की 12 जून की मुलाकात दुनिया के लिए ‘ड्रीम-डेट’ से कम नहीं

12 जून साल 2018 की तारीख इतिहास के पन्नों में राजनीतिक बदलाव के दस्तखत के तौर पर दर्ज होने जा रही है. सिंगापुर गवाह बनने जा रहा है उस मुलाकात का जिसके होने से कुछ महीने पहले तक दुनिया पर महाविनाश का खतरा मंडरा रहा था. परमाणु युद्ध की आशंकाएं गहरा रही थीं. परमाणु मिसाइलों के हमलों की दहशत दुनिया के आसमान पर चील-गिद्धों की तरह उड़ान भर रही थी. एक महायुद्ध से महाविनाश की कल्पनाएं दुनिया को डराने का काम कर रही थीं क्योंकि एक तरफ जिद तो दूसरी तरफ अहंकार आमने-सामने थे.

दुनिया के सुपरपॉवर देश अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक छोटे से देश उत्तर कोरिया के सैन्य तानाशाह की धमकियां निजी तौर पर चुभ रही थीं. दोनों की जुबानी जंग विश्वयुद्ध की पटकथा लिखने की तैयारी कर चुकी थी. बारूद के ढेर पर सिर्फ एक चिंगारी की कमी बाकी थी जो किसी भी वक्त पूरी दुनिया को सबसे बड़ी जंग के शोलों में झोंक सकती थी.

TRUMPKIM

एक तरफ वो अमेरिका जिसने उत्तर कोरिया को परमाणु बम से मिटा देने की संयुक्त राष्ट्र में खुलेआम धमकी दी थी तो दूसरी तरफ वो उत्तर कोरिया जिसने अमेरिकी शहरों को अपनी परमाणु मिसाइलों से खाक में मिला देने का दम भरा था. व्हाइट हाउस की धमकियों के मद्देनजर कोरियाई प्रायद्वीप पर जंग का काउन्टडाऊन शुरू हो चुका था. उत्तर कोरिया के आसमान पर अमेरिका के फाइटर जेट्स हुंकार भर कर इरादे जता चुके थे. उधर उत्तर कोरिया की मिसाइलें जापान के ऊपर से गुजर कर युद्ध की तैयारियों और उन्माद का ऐलान कर रही थीं.

लेकिन अभी धरती और दुनिया की जिंदगी की उम्र बहुत बाकी है. शायद यही वजह रही कि किसी फिल्म की कहानी की तरह ही दोनों देशों के बीच एक क्लाइमैक्स आया और दोनों राष्ट्रों के मुल्क परमाणु टेबल से उठकर बातचीत की टेबल पर बैठने को राजी हो गए.

पूरी दुनिया हैरत से भर उठी कि ये कैसे हो गया. किम जोंग के बातचीत के न्योते को डोनाल्ड ट्रंप ने कैसे स्वीकार कर लिया? एक दूसरे को नेस्तनाबूत करने वाले डायलॉग, एक दूसरे को पागल, सनकी, रॉकेटमैन जैसे अपमानजनक शब्द कहने के बावजूद दोनों नेता ऐतिहासिक मुलाकात के लिए कैसे राजी हो गए?

President Donald Trump, accompanied by Iowa Gov. Kim Reynolds, speaks in the Roosevelt Room of the White House in Washington, Wednesday, June 28, 2017, during an energy roundtable with tribal, state, and local leaders. (AP Photo/Evan Vucci)

अब क्लाइमैक्स के बाद सिर्फ सस्पेंस बाकी रह गया है जो 12 जून की मुलाकात से सामने आ जाएगा. सिंगापुर इसलिए खास वैन्यू है क्योंकि अमेरिका और सिंगापुर के बीच अच्छे संबंध हैं तो वहीं उत्तर कोरिया के साथ भी सिंगापुर के करीबी रिश्ते रहे हैं. इसके अलावा यहां साल 2015 में चीन और ताइवान के बीच 60 साल बाद पहली बार ऐतिहासिक बातचीत हुई थी.

बहरहाल लिफाफे को देखकर खत का मजमून समझा जा सकता है. एक ट्वीट में ट्रंप ने कहा, ‘हम दोनों इसे वैश्विक शांति के लिए एक बहुत खास मौका बनाने की कोशिश करेंगे'.

ट्रंप का ट्वीट मुलाकात पर कयासों को सकारात्मक संदेश दे रहा है तो किम जोंग ने भी बातचीत से पहले अमेरिका के तीन नागरिकों को रिहा कर रिश्तों में मिठास घोलने का काम किया है. ट्रंप की खुशी का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वो खुद रिहा हुए इन तीन अमेरिकी नागरिकों को रिसीव करने एयरपोर्ट पहुंचे थे.

उधर किम ने भी ट्रंप के साथ होने वाली अपनी मुलाकात को लेकर उम्मीद जताई कि वो अमेरिका के साथ आपसी भरोसे की बुनियाद रखेंगे.

Trump-kim

लेकिन बड़ा सवाल ये है कि बातचीत में शर्तों के पुलिंदे दोनों तरफ हैं. ऐसे में बातचीत में शर्तें शरारत का काम न करें. हालांकि ट्रंप इस मुलाकात की जोरदार तैयारी कर रहे हैं. ट्रंप के राजनीतिक करियर में ये अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से भी बड़ा अवसर है. उत्तर कोरिया को लेकर वो पिछले अमेरिकी राष्ट्रपतियों की निंदा कर सुर्खियां हासिल कर चुके हैं. ऐसे में उनकी तरफ से एक भी कूटनीतिक चूक उनके लिए नुकसानदायक साबित होगी.

ट्रंप ये जानते हैं कि वक्त ने उन्हें इतिहास रचने का मौका दिया है. अगर वो इस बातचीत में सफल हो गए और उत्तर कोरिया को अपनी शर्तें मनवाने में कामयाब हो गए तो ट्रंप इतिहास में अमर हो जाएंगे. अमेरिका की पहली बड़ी शर्त यही है कि उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रमों को न सिर्फ बंद करे बल्कि हथियारों को नष्ट भी करें.

इसमें पेंच वहां फंस सकता है कि उत्तर कोरिया परमाणु कार्यक्रम बंद करने के एवज में अमेरिका की तरफ से भविष्य में न होने वाले हमले की गारंटी मांगे. उत्तर कोरिया ने सार्वजनिक मंच पर अपने परमाणु कार्यक्रमों के लिए सीधे तौर पर अमेरिका को जिम्मेदार बताया था. उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु कार्यक्रमों को अमेरिकी हमलों के मद्देनजर सुरक्षा कवच बताया है. ऐसे में बड़ा सवाल ये होगा कि किम जोंग को ट्रंप क्या गारंटी देते हैं?

नॉर्थ कोरिया ने 100 किलोटन के हाइड्रोजन बम का परीक्षण कर इस बार समूची दुनिया को हिला कर रख दिया. सवाल भूकंप के झटकों से बड़ा है जिससे दुनिया दहल गई है. अब सवाल ये नहीं है कि तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ने पर दुनिया का क्या होगा बल्कि बड़ा सवाल ये है कि एक सनकी तानाशाह के हाथ में न्यूक्लियर ताकत आने के बाद दुनिया कितनी सुरक्षित है?

किम जोंग दक्षिण कोरिया में मौजूद 30 हजार अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी का मुद्दा जरूर उठाएंगे. ऐसे में देखने वाली बात ये होगी कि अमेरिका का रुख क्या होता है.

हालांकि किम जोंग अमेरिकी मिजाज को पढ़ने-जानने के बाद ही राजी हुए हैं.  ऐसे में वो ये बखूबी जानते होंगे कि हर शर्त की काट क्या रखनी है और अपनी बातें भी कैसे मनवानी हैं. उत्तर कोरिया के लिए पहली प्राथमिकता संयुक्त राष्ट्र की तरफ से लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों से निजात पाने की होगी ताकि उत्तर कोरिया के आर्थिक हालात सुधर सकें. उत्तरी कोरिया के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों की वजह से संयुक्त राष्ट्र परिषद ने कई प्रतिबंध लगाए हैं.

किम जोंग ने दूसरी बार चीन का दौरा कर राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की. साफ है कि किम खुद को बातचीत के लिए तैयार करने की जोरदार तैयारी कर रहे हैं और वो इसके लिए अनुभवी शी से बातचीत के एजेंड पर राय लेने का काम कर रहे हैं.

Beijing : In this photo provided Wednesday, March 28, 2018, by China's Xinhua News Agency, North Korean leader Kim Jong Un, left, and Chinese President Xi Jinping shake hands in Beijing, China. The Chinese government confirmed Wednesday that North Korea's reclusive leader Kim went to Beijing and met with Chinese President Xi in his first known trip to a foreign country since he took power in 2011. The official Xinhua News Agency said Kim made an unofficial visit to China from Sunday to Wednesday.AP/PTI(AP3_28_2018_000003B)

ट्रंप की तरह ही किम जोंग भी इतिहास रचने से एक कदम दूर हैं. वो चाहेंगे कि दशकों से चली आ रही युद्ध की आशंकाओं के बादल छटें और वो दुनिया से अलग-थलग किए गए प्रतिबंधों से आजाद हों ताकि उत्तर कोरिया उनके शासनकाल में नई तरक्की कर सके.

इस ऐतिहासिक बातचीत की नींव तब पड़ी जब विंटर ओलंपिक्स के बाद उत्तर-दक्षिण कोरिया के बीच रिश्तों की जमी बर्फ पिघली और वो बातचीत के लिए तैयार हो गए. बड़ी बात ये रही कि सैन्य सुरक्षा की गारंटी की मांग कर उत्तर कोरिया परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए राजी हो गया. अप्रैल में किम जोंग उन और दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति मून जे-इन ने कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु हथियार मुक्त बनाने की शपथ भी ली.

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बहरहाल मुलाकात में सिर्फ एक महीने का वक्त बाकी रह गया है. कोरियाई प्रायद्वीप पर फिलहाल फिजां में शांति दिखाई दे रही है. दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों को उत्तर कोरिया की सनसनाती मिसाइलों के सिर के ऊपर से गुजरने का खौफ नहीं है. वो आसमान पर आंखें गड़ाकर देखने की बजाए 12 जून का इंतजार कर रहे हैं और ये इंतजार पूरी दुनिया को भी है.

 

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