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संयुक्त राष्ट्र से हिन्दी में समाचार बुलेटिन का प्रसारण शुरू: सुषमा

यही स्थिति जर्मनी और जापान के समक्ष भी है . ये दोनों देश भी अपनी भाषा को इस विश्व निकाय की आधिकारिक भाषा बनाना चाहते हैं, लेकिन उनके समक्ष भी यही बाधा आ रही है

Updated On: Aug 18, 2018 04:10 PM IST

Bhasha

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संयुक्त राष्ट्र से हिन्दी में समाचार बुलेटिन का प्रसारण शुरू: सुषमा
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मॉरीशस में आयोजित 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के दौरान हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने की प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने शनिवार को कहा कि संयुक्त राष्ट्र से हिन्दी में साप्ताहिक समाचार बुलेटिन का प्रसारण शुरू हो गया है .

यह बुलेटिन प्रतिदिन भी प्रसारित हो सकता है लेकिन इसके लिए दो वर्ष तक इसके प्रसारण को देखा जाएगा, रेटिंग तैयार की जाएगी और प्रतिक्रिया अच्छी हुई तब इसका दैनिक प्रसारण भी किया जा सकता है.उल्लेखनीय है कि अभी यह हिन्दी समाचार बुलेटिन प्रत्येक शुक्रवार को प्रसारित हो रहा है.

उन्होंने कहा कि अब हम हिन्दी भाषी लोगों की जिम्मेदारी है कि इसे बढ़ावा दें. विदेश मंत्री ने कहा कि हिन्दी में संयुक्त राष्ट्र में ट्विटर एकाउंट भी खोला गया है. इसके साथ ही वेबसाइट पर प्रमुख दस्तावेज हिन्दी में डाल दिए गए हैं .

हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने में बाधाएं

सुषमा स्वराज ने कहा कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने में कुछ बाधाएं हैं. इसे मान्यता प्रदान करने के लिए प्रस्ताव को दो तिहाई बहुमत से पारित करने के साथ समर्थन करने वाले सभी सदस्य देशों को इस पर होने वाले खर्च के लिए अंशदान करना होता है.

उन्होंने कहा कि हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र में 129 देशों का समर्थन जुटाना कठिन काम नहीं है . हमने योग दिवस को मान्यता दिलाने में 177 देशों का समर्थन जुटाया है .

विदेश मंत्री ने कहा कि लेकिन आधिकारिक भाषा के संदर्भ में सदस्य देशों को वोट से समर्थन देने के साथ आर्थिक खर्च भी साझा करना पड़ता है . अगर इसका पूरा खर्च भी हमें देना पड़े, तब भी हम इसके लिए तैयार हैं .मैंने संसद में भी कहा था कि 40 करोड़ रूपए तो क्या 400 करोड़ रूपए खर्च लगेगा, तो देने को तैयार हैं . लेकिन संयुक्त राष्ट्र का नियम है कि समर्थन करने वाले देशों को ही व्यय बांटना होता है.

यही स्थिति जर्मनी और जापान के समक्ष भी है . ये दोनों देश भी अपनी भाषा को इस विश्व निकाय की आधिकारिक भाषा बनाना चाहते हैं, लेकिन उनके समक्ष भी यही बाधा आ रही है .

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