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शिक्षा की अमेरिकी 'दुकानों' में ठगी का धंधा और शिकार बनते लाखों भारतीय छात्र

सोचने वाली बात ये है कि जो अमेरिका अपने छात्रों को कायदे की नौकरी नहीं दे पा रहा है, वो आने वाले दिनों में भारतीय या दूसरे विदेशी छात्रों को क्या देगा?

Updated On: Sep 09, 2018 12:40 PM IST

Ashwini Kumar

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शिक्षा की अमेरिकी 'दुकानों' में ठगी का धंधा और शिकार बनते लाखों भारतीय छात्र

बच्चा अमेरिका में पढ़े. वहीं सेटल हो जाए. खूब सारे डॉलर कमाए, और हो सके तो मां-बाप के एक बार अमेरिका घूमने के सपने को पूरा करे. अपने देश के लाखों माता-पिता के यह आम सपने हैं. लेकिन यह सपने हकीकत के कितने करीब हैं? क्या आपने आंकड़ों और अनुभवों के जरिए कभी इसकी पड़ताल की है? चलिए करते हैं. समझते हैं कि अंकल सैम की शिक्षा की दुकानों पर मिल रही डिग्रियां कितनी कारगर हैं और कितनी बेकार? उच्च शिक्षा देने वाले अमेरिकी संस्थानों से हमारे कितने छात्र अच्छे रोजगार के मौके लेकर निकल रहे हैं और कितने ठगी का शिकार होकर?

वर्ष 2008 में 81 हजार भारतीय छात्र अमेरिका पढ़ने गए. जबकि इसके 9 साल बाद 2017 में इनकी तादाद दोगुना से भी ज्यादा 1.86 लाख हो गई. इन आंकड़ों को देखकर हम इस बात के लिए खुश हो सकते हैं कि हमारे देश में ऐसे समृद्ध माता-पिता की तादाद बढ़ रही है, जो अपने बच्चों को अमेरिका में पढ़ाने की कूबत रखते हैं. लेकिन इससे आगे कुछ आंकड़े माता-पिता और छात्रों को अलर्ट करने वाले हैं. अमेरिका ने 2017 में सिर्फ 3.45 प्रतिशत छात्रों को पढ़ाई या ट्रेनिंग पूरी करने के बाद अपने देश में बने रहने की इजाजत दी. बाकी 96.55 फीसदी छात्र वापस भेज दिए गए.

किशलय वीआईटी से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के बाद 2013 में हायर स्टडीज के लिए अमेरिका चला गया. वहां उसके एकेडमिक्स के रिकॉर्ड भी काफी अच्छे रहे. पढ़ाई के बाद उसे वहीं नौकरी मिलने की उम्मीद थी. उसके अमेरिकी प्रोफेसर को भी ऐसा ही भरोसा था. लेकिन उम्मीद और भरोसा सब धरे के धरे रह गए. 2016 के अगस्त में भारत आ चुके किशलय को अब तक औसत दर्जे की नौकरी पाने में भी कामयाबी नहीं मिली है. उसके पिता पढ़ाई के लोन की किस्तें चुका रहे हैं.

कुछ ऐसा ही विभान के साथ भी हुआ था. 2013 में ही अमेरिका से लौटे विभान को एक साल में ही समझ में आ गया कि जिन उम्मीदों के साथ उसने फ्लोरिडा में रहकर तमाम बड़ी डिग्रियां हासिल की थीं, उनका अपने देश में कोई खास मतलब नहीं है. बेहद समृद्ध परिवार से होने की वजह से विभान और उसके परिवार को कोई आर्थिक परेशानी तो नहीं हुई, लेकिन कड़वा सच यही है कि उसके सपने पहले अमेरिका में और फिर भारत में पूरी तरह से बिखर गए.

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खुद अमेरिकी छात्रों की हालत ही कहां अच्छी है. ताजा रिपोर्ट के मुताबिक हायर स्टडीज करने वाले अमेरिका के लाखों छात्र बुरी तरह से कर्ज की गिरफ्त में फंस चुके हैं. हालत ऐसी है कि उन्हें मिलने वाली नौकरी से यह कर्ज चुकाना मुश्किल हो रहा है. स्थिति इतनी गंभीर है कि 2023 तक शायद 40 प्रतिशत ऐसे अमेरिकी स्टूडेंट्स लोन डिफॉल्ट कर जाएंगे और इससे लोन देने वाली एजेंसियों और बैंकों का करीब 560 अरब डॉलर डूब जाएगा.

क्या सिर्फ काबिलियत पर निर्भर करता है अमेरिका में नौकरी मिलना?

सोचने वाली बात यह है कि जो अमेरिका अपने छात्रों को कायदे की नौकरी नहीं दे पा रहा है, वो आने वाले दिनों में भारतीय या दूसरे विदेशी छात्रों को क्या देगा? यानी आने वाले वर्षों में ट्रंप सत्ता में रहें या न रहें भारतीय छात्रों के लिए अमेरिका में जॉब के मौके कोई बहुत बेहतर शायद ही होने वाले हैं.

यही नहीं, अगर आप यह सोचते हैं कि अमेरिका में नौकरियों का मिलना सिर्फ काबिलियत पर निर्भर करता है, तो इस सोच को भी कुछ हद तक बदल लीजिए. ट्रंप की अगुवाई वाला अमेरिका वैसे ही विदेशी छात्रों को जॉब मिलने के सारे रास्ते बंद करने में लगा है, स्थिति पहले भी बहुत पारदर्शी नहीं रही है. पहले भी देखा यही जाता रहा है कि एक नॉन अमेरिकी को जॉब मिलना काबिलियत के साथ इस बात पर निर्भर करता है कि उसने पढ़ाई के दौरान अपने सीनियर्स के साथ कैसे संबंध बनाए और इससे भी बढ़कर यह कि उसका प्रोफेसर उसे कितना सपोर्ट करता है.

पिछले दिनों एक मैट्रिमोनियल साइट पर विज्ञापन था- ‘वर चाहिए. आईएएस/आईपीएस/डॉक्टर/बिजनेसमैन. सॉफ्टवेयर इंजीनियर प्लीज कॉल न करें.’ जबकि एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि शादी के लिए अमेरिका में नौकरी कर रहे युवकों की मांग 2017 में अचानक गिर गई. यह दोनों चीजें उस सपने के धराशाई होने के नतीजे में सामने आई हैं, जो अब तक अमेरिका में पढ़ने, वहीं नौकरी करने और बस जाने की शक्ल में देखे जाते रहे थे.

यही वजह है कि लंबे समय बाद बीते एकेडमिक सेशन में ऐसा पहली बार हुआ है कि भारत से अमेरिका जाने वाले छात्रों की तादाद में गिरावट आ गई. 2018-19 के सत्र में अमेरिकी शैक्षिक संस्थानों में भारतीय छात्रों के दाखिले में 30 प्रतिशत की भारी कमी आई. इसकी वजहों में ट्रंप प्रशासन की नीतियों के साथ-साथ अमेरिकी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की बढ़ी फीस भी शामिल है.

अमेरिका की जगह अब छात्र कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और यूरोपीय देशों को विकल्प के तौर पर देख रहे हैं. लेकिन भविष्य को लेकर सवाल फिर भी खत्म नहीं हो रहे. क्योंकि अमेरिका की जगह इन वैकल्पिक देशों में भी पढ़ाई के खर्चे इतने भी कम नहीं हैं कि एक औसत परिवार से ताल्लुक रखने वाला भारतीय छात्र बगैर लोन लिए अपनी पढ़ाई पूरी कर सके. अगर पढ़ाई पूरी कर भी ली, तो घरेलू बाजार में नौकरियां ही कितनी हैं? पहले से ही देश के 55 प्रतिशत से ज्यादा इंजीनियर और एमबीए की डिग्री लिए युवा बेरोजगार बैठे हैं.

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अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल करना ज्यादातर भारतीय शहरी परिवारों के बच्चों का सपना होता है

अमेरिकी विश्वविद्यालयों में दाखिला लेने वाले छात्रों में सबसे ज्यादा करीब 36 प्रतिशत इंजीनियरिंग में जाते हैं. बगैर यह जाने कि इंजीनियरिंग सेक्टर में जॉब की स्थिति क्या है. भारतीयों के लिए अमेरिका में जॉब नहीं है और देश की स्थिति बड़ी विकट है. खुद अपने देश में हर साल करीब 15 लाख छात्र इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल कर रहे हैं, जो कि यहां के जॉब मार्केट के हिसाब से काफी ज्यादा है. नतीजा यह हो रहा है कि 80 प्रतिशत के करीब इंजीनियर नौकरी पाने के योग्य ही नहीं हैं.

विदेशों से डिग्री लेकर आए छात्रों को अपने ही देश में क्यों नहीं मिलती नौकरी?

विदेशी और खासकर अमेरिका में डिग्री लेकर आए छात्रों के संदर्भ में एक और बात जो उभरकर सामने आई है वो यह कि कई बार उन्हें अपने देश में नौकरी मिलने में परेशानी होती है. इसकी दो प्रमुख वजहें हैं...

1. अमेरिकी डिग्री लेकर आए छात्र अकसर स्थानीय (भारतीय संस्थानों से डिग्री लेने वाले) छात्रों के मुकाबले ज्यादा तेज करियर ग्रोथ की उम्मीद करते हैं और इस वजह से कंपनी प्रबंधन से ऐसी उम्मीदें रखते हैं, जिन्हें पूरा करना संभव नहीं होता.

  1. विदेशी डिग्री वाले स्टूडेंट्स स्थानीय छात्रों के मुकाबले काफी ज्यादा सैलरी की मांग भी करते हैं.
अगर यह स्थिति है, तो इसके लिए अमेरिका या कहीं और से पढ़कर आए छात्रों को दोष भी नहीं दिया जा सकता. दरअसल, इसका सीधा संबंध पढ़ाई में किए गए निवेश और अमेरिका में बनी मानसिकता से है.

इन 5 बातों का रखें खास ख्याल

आंकड़ों और हालात को देखते हुए 5 बातें बिल्कुल स्पष्ट हैं:

  1. भारतीय माता-पिता अब अपने बच्चों को अमेरिका में पढ़ाने को स्टेटस सिंबल से जोड़कर देखना बंद कर दें.
  2. यह मानकर चलें कि अमेरिका में पढ़ाई के बाद वहां जॉब की संभावनाएं नगण्य (नहीं के बराबर) हैं.
  3. अपना आर्थिक आधार देखकर ही एजुकेशन लोन लें.
  4. अमेरिका में हासिल डिग्री के आधार पर अपने देश में खुद के साथ स्पेशल ट्रीटमेंट की उम्मीद न रखें.
  5. अमेरिकी डिग्री के समानांतर देश में मिलने वाली डिग्रियों की तुलना करें और गंभीर विमर्श के बाद ही फैसले लें.
याद रहे, दूर के ढोल हमेशा सुहावने नहीं होते. आंकड़ों और अनुभवों से तो यही लगता है कि अंकल सैम की धरती पर चल रहे उच्च शिक्षा के केंद्र विदेशी छात्रों के लिए धंधे से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं. और इस धंधे में ग्राहक (विदेशी छात्र) ज्यादातर ठगी के शिकार होते दिख रहे हैं.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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