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जनसंघर्षों की अदम्य अग्निशिखा: फिदेल कास्त्रो

उनका होना पूंजी की खुली गुंडागर्दी के समक्ष एक विश्वसनीय प्रतिरोध की उपस्थिति थी.

Updated On: Nov 28, 2016 07:39 AM IST

Ashok Kumar Pandey

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जनसंघर्षों की अदम्य अग्निशिखा: फिदेल कास्त्रो

बात 1995 की है. अर्जेंटीना के महान फुटबाल खिलाड़ी डिएगो माराडोना को अमेरिका ने वीसा देने से इंकार कर दिया था, कारण यह कि उन्होंने फ़िदेल कास्त्रो की तारीफ कर दी थी. बाद में उन्हें आठ दिन का टूर वीसा मिला जबकि उनके बाकी साथियों को दस साल का वीसा दिया गया था.

क्यूबा में अमरीका समर्थित बतिस्ता की सैन्य तानाशाही को उखाड़ कर पश्चिमी दुनिया का पहला कम्युनिस्ट शासन स्थापित करने के बाद से अपने पचास साल के शासन काल में लगातार आर्थिक प्रतिबन्ध, बे ऑफ पिग्स सहित अनेक परोक्ष हमलों और 600 से अधिक बार हुए हत्या के प्रयासों के बीच एक ओर क्यूबा में जनता का शासन स्थापित करने की जद्दोजेहद और दूसरी तरफ पूरी दुनिया, खासतौर पर लैटिन अमेरिका के देशों में साम्राज्यवाद विरोधी जन क्रांतियों को समर्थन और सहयोग देते हुए वह सीआईए की ऐसी तमाम परोक्ष-प्रत्यक्ष हिंसाओं के साक्षी रहे और उसके खिलाफ समझौताहीन संघर्ष के प्रतिनिधि.

उनका होना इस एक ध्रुवीय विश्व में अमेरिकी नेतृत्व में पूंजी की खुली गुंडागर्दी के समक्ष एक विश्वसनीय प्रतिरोध की उपस्थिति थी. 1979 में गुट निरपेक्ष देशों के हवाना सम्मलेन के दौरान उन्होंने इस संगठन का उद्देश्य साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, नवउपनिवेशवाद, नस्लवाद और हर तरह के विदेशी आधिपत्य के खिलाफ संघर्ष बताया था और यह उनका आजीवन ध्येय रहा और उनके नेतृत्व में लैटिन अमेरिका में लगातार अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ आवाजें बुलंद होती रहीं. सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया भर के देशों के अमेरिका के आगे घुटने टेकने के दौर में भी फिदेल जनसभाओं से लेकर संयुक्त राष्ट्र के अधिवेशनों तक में अमेरिका की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ पूरी ताकत से दहाड़ते रहे.

फिदेल कास्त्रो (पीटीआई)

फिदेल कास्त्रो (पीटीआई)

विद्रोह के प्रतीक फिदेल कास्त्रो

13 अगस्त 1926 को पूर्वी क्यूबा एक छोटे से कस्बे में समृद्ध गन्ना किसान परिवार में जन्मे फिदेल का आरम्भिक सफर किसी भी आम लैटिन अमेरिकी युवक जैसा ही था. बेसबाल के कुशल खिलाड़ी फिदेल ने कानून की पढ़ाई के लिए हवाना विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और उसी दौर में राजनीति में उनकी रूचि बढ़ी तो आदर्शवादी फिदेल भ्रष्टाचार विरोधी ऑर्थ्रोडॉक्स पार्टी  में शामिल हो गये और रॉफेल ट्रूजिलो खिलाफ असफल षडयंत्र में हिस्सा लिया.

1950 में कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वकालत तो शुरू की लेकिन मन राजनीति में ही रमा और दो साल बाद उन्होंने संसदीय चुनावों  के लिए नामांकन दाखिल किया. लेकिन इसी समय क्यूबा की राजनीति में बड़ा भूचाल आया और अमेरिका की मदद से बतिस्ता ने चुनाव से पहले ही मार्च के महीने में सत्ता पर कब्जा कर लिया.

इन नई राजनितिक परिस्थितियों में फिदेल के सम्मुख स्पष्ट लक्ष्य था किसी भी तरह बतिस्ता की सत्ता को उखाड़ फेंकना.

1953 की जुलाई में उन्होंने कोई सवा सौ साथियों के साथ विद्रोह की योजना बनाई और सैंटियागो डे क्यूबा में सेना के बैरकों पर हमला बोला. लेकिन यह प्रयास असफल हुआ. कास्त्रो के अनेक साथी मारे गए और वह गिरफ्तार कर लिए गए.
उन्हें पंद्रह साल की जेल हुई लेकिन दो साल बाद ही आम माफी के तहत उनको भी रिहा कर दिया गया.

फिदेल और चे गवेरा क्रांतिकारी जोड़ी

कास्त्रो मेक्सिको चले गए जहाँ उनकी मुलाकात चे गवेरा से हुई. अर्जेंटीना के रोजेरियो में 1928 में जन्मे चे पेशे से डॉक्टर थे अपने मित्र ग्रेंडोस के साथ 1951 में पूरे लैटिन अमेरिका का मोटर साइकल से चक्कर लगा चुके थे और इस यात्रा में अपने लोगों के दुःख यातना तथा शोषण के प्रत्यक्षदर्शी बन उसके खिलाफ आजीवन संघर्ष के लिए संकल्पबद्ध भी. दोनों युवाओं का रास्ता अब एक था और राउल कास्त्रो, जूलियो राबर्टो सहित अपने सौ से भी कम साथियों के फिदेल ने ग्रैन्मा नामक नौका में मैक्सिको से क्यूबा के उत्तर-पूर्वी तट की यात्रा शुरू करने से पहले घोषणा की – 1956 में या तो हम शहीद होंगे या आजाद.

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सामाजिक-आर्थिक समानता और शोषण से मुक्ति के विचार में आस्था के बावजूद इस समय तक फिदेल मार्क्सवादी नहीं हुए थे. असल में उस पूरी टोली में सिर्फ दो लोग थे, जो मार्क्सवादी विचारों से मुतमईन थे- राउल कास्त्रो और चे. ग्रैन्मा के लौहमर्षक अभियान को चे ने अपने संस्मरण रेमिनीसेंसेज ऑफ क्यूबन रिवोल्यूशन में बड़े रोचक तरीके से दर्ज किया है और यह अभियान न केवल फिदेल और उनके साथियों के अदम्य साहस का दस्तावेज है बल्कि उन महान मानवीय मूल्यों का भी जिससे यह अभियान संचालित था.

चे की शहादत के बाद आयोजित कार्यक्रम ने इस अभियान को याद करते हुए उन्होंने कहा था –

चे से मेरी पहली मुलाकात 1955 में जुलाई या अगस्त के किसी दिन हुई थी और उस एक रात में वह ‘ग्रेन्मा’ के भावी अभियानकर्ताओं में से एक बन गए थे, जबकि उस वक्त अभियान के पास न तो जहाज था कोई, न हथियार और न ही सेना.
फिदेल ने इन्कलाब के कोई दो साल बाद खुद को मार्क्सवादी-लेनिनवादी घोषित किया था और इसके बाद के पांच दशक फिदेल पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद की मुखालिफत के प्रतिनिधि बने रहे.

क्यूबा के निर्माण की चुनौतियां

क्रान्ति के बाद फिदेल के लिए एक समाजवादी, समृद्ध और विकासशील क्यूबा का निर्माण आसान नहीं था. वर्षों से लूट और भ्रष्टाचार का शिकार रहा एक संसाधनहीन देश और उस पर अमेरिका जैसे देश के लगातार जारी षड्यंत्र और आर्थिक प्रतिबन्ध. बतिस्ता के समय की सभी अमेरिकी कंपनियों का राष्ट्रीयकरण उनका सबसे बड़ा कदम था और अपने पूंजीपतियों के हितों पर इस हमले के बाद अमेरिका ने क्यूबा के खिलाफ षडयंत्रों के तमाम जाल बुने जिसमें बे ऑफ पिग्स के पास सी आई ए के सहयोग से क्यूबा से निष्काषित बतिस्ता समर्थकों के असफल षडयंत्र से लेकर उनकी सिगार में जहर मिलाने जैसे किस्से शामिल हैं. लेकिन फिदेल और उनके साथियों ने इस चुनौती का सामना किया और क्यूबा की जनता के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ पूरे विश्व और खासतौर से लैटिन अमेरिकी देशों की जनता की मुक्ति की लड़ाइयों को वैचारिक नेतृत्व और प्रेरणा प्रदान की.

फिदेल कास्त्रो

फिदेल कास्त्रो

क्यूबा की सामाजिक-सांस्कृतिक उपलब्धियों का जिक्र करते हुए लंदन के मेयर रहे केन लिविंगस्टोन ने 2006 की अपनी क्यूबा यात्रा के दौरान लिखा –

आधी सदी की अमेरिकी अवैध आर्थिक नाकाबंदी के बावजूद यह आश्चर्यजनक है कि क्यूबा ने अपने नागरिकों को विश्व स्तर की स्वास्थ्य और शिक्षा उपलब्ध कराई है और इसका श्रेय फिदेल कास्त्रो को है.
चिकित्सा के क्षेत्र में क्यूबा की उपलब्धि तो अद्वितीय है. उसके चिकित्सकों ने न केवल क्यूबा बल्कि पूरी तीसरी दुनिया को आपदा के समय में सबसे पहले पहुंच कर सहायता उपलब्ध कराई है.

क्यूबाई समाज की एक और विशेषता जेंडर समानता के प्रयोग थे. क्रान्ति के पहले वहां महिलाओं की स्थिति बाकी दुनिया की ही तरह थी और वेश्यावृत्ति आम थी. इंकलाब के कुछ ही सालों में न केवल वेश्यावृत्ति का उन्मूलन कर दिया गया बल्कि वहाँ की श्रम शक्ति में औरतों की भागीदारी पुरुषों के लगभग बराबर हो गई.

अमेरिकी विरोध के मजबूत स्तंभ

सोवियत संघ के विघटन और चीन के समाजवादी प्रयोग के पूंजीवाद के दलदल में पूरी तरह फंसते चले जाने के बाद क्यूबा दुनिया का इकलौता देश था, जिसने फिदेल के नेतृत्व में तमाम विपरीत स्थितियों में भी न केवल समाजवाद का परचम बुलंद रखा बल्कि दुनिया के अनेक मंचों पर तीसरी दुनिया के देशों के अधिकारों के सवाल उठाता रहा.

पश्चिमी मीडिया ही नहीं क्लासिकल वामपंथी लोगों ने भी समय-समय पर फिदेल की तीखी आलोचनाएं की हैं, जाहिर है पचास साल से अधिक समय के शासन और युग प्रवर्तक परिवर्तनों के बीच गलतियां होना भी स्वाभाविक थीं, लेकिन सबसे हास्यास्पद थी राउल कास्त्रो के सत्ता संभालने पर उनकी आलोचना.

क्रान्ति के बाद से ही परदे के पीछे रहकर काम करने वाले राउल का यह परिचय बहुत छोटा है कि वह फिदेल के भाई थे, राउल ग्रैन्मा के दिनों से फिदेल के साथी ही नहीं बल्कि इंकलाब के समझौताहीन सिपाही थे, जिन्होंने क्रान्ति के बाद नए क्यूबा के निर्माण में नेतृत्वकारी भूमिका निभाई.

विश्व राजनैतिक पटल पर  फिदेल की उपस्थिति अमेरिकी साम्राज्यवाद के नेतृत्व में एकध्रुवीय बनती जा रही दुनिया में जनपक्षीय प्रतिरोध की उपस्थिति थी. समाजवाद के लिए उनका आजीवन संघर्ष पूरी दुनिया की मुक्तिप्रिय जनता के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत है. आवारा पूंजी और धार्मिक हिंसा के चंगुल में फंसी इस सदी में वह उम्मीद और संघर्ष के एक टिमटिमाते दीप की तरह इतिहास में हमेशा दर्ज रहेंगे.

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