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फिदेल कास्त्रो: इतना जिए कि चाहने वाले गुजर गए...

फिदेल कास्त्रो दुनिया के तमाम लोगों के दिलों में हिम्मत पैदा करने का नाम है

Updated On: Nov 27, 2016 07:10 AM IST

Nazim Naqvi

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फिदेल कास्त्रो: इतना जिए कि चाहने वाले गुजर गए...

क्यूबा के पूर्व प्रधानमंत्री ‘फिदेल ऐलेजैंड्रो कास्त्रो रूज़’ जिन्हें दुनिया फिदेल कास्त्रो के नाम से जानती है, अब हमारे बीच नहीं हैं. 90 वर्ष की आयु में उनका दुनिया से जाना कुछ लोगों के लिए दुख और कुछ के लिए हर्ष की बात है. वैसे भी इस उम्र तक जिंदा रहकर जब कोई रुखसत होता है तो गम नहीं होता, गम के इजहार में बदलाव आ जाता है. अकबर इलाहाबादी ने तो लंबी उम्र तक जीने को बड़े अनोखे अंदाज़ में वर्णित किया- इतना जिए कि चाहने वाले गुजर गए बाकी बचा ना कोई तो चुपचाप मर गए

सच तो ये है कि फिदेल कास्त्रो की मौत पर अकबर का ये शेर अचानक कौंधता है. क्योंकि 1956 में जब क्यूबा में बतिस्ता सरकार का पतन हुआ तो लोग सड़कों पर उतर कर खुशियां मना रहे थे, कास्त्रो ने अमरीका-समर्थित फुल्गेंकियो बतिस्ता की तानाशाही को उखाड़ फेंका था. हर तरफ कास्त्रो के नाम की धूम थी.

90 साल बाद आज जब ‘कास्त्रो नहीं रहे’ खबर आई तो क्यूबा-अमरीका समर्थित लोगों ने उसी अंदाज में कास्त्रो की मौत का स्वागत किया. ट्वीटर पर लोगों को नाचते गाते और खुशियां मनाते दिखाया जाने लगा. @MillyGB ने ट्वीट किया 'लंबे समय से हम इंतजार कर रहे थे इसका. अब क्यूबा में लोकतंत्र और आजादी है'. हालांकि इसी के साथ उन अमरीकियों के ट्वीट की भी झड़ी लग गई जो क्यूबा से अमरीका आकर बसे क्यूबाई लोगों को ये संदेश भेजने लगे कि 'ये तो अच्छा हुआ, अब तुम लोग वापिस क्यूबा जाओ.'

फिदेल कास्त्रो का भारत के साथ एक अटूट रिश्ता था. भारत भी इसे मानता रहा और खुद फिदेल कास्त्रो भी जिंदगी भर इस रिश्ते का सम्मान करते रहे. इंदिरा गांधी (जिन्हें वो अपनी बहन मानते थे) से अपनी मुलाकात में जो आत्मीयता वो दिखाते थे उसकी गवाह कई तस्वीरें हैं. भारत को अपने एक बेहद महत्वपूर्ण समर्थक के चले जाने का दुःख प्रधानमंत्री के ट्वीट से झलकता है 'फिदेल कास्त्रो 20वीं सदी के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में से एक थे, भारत को अपने मित्र के दुनिया से चले जाने का दुःख है.'

एक और महत्वपूर्ण बात, फिदेल कास्त्रो के पूरे राजनीतिक जीवन की संरचना, उनकी अमरीका-दुश्मनी की बुनियाद पर टिकी हुई थी. पांच दशक से भी ज्यादा लंबी दुश्मनी में अमरीका ने क्या पाया और क्यूबा ने क्या खोया, ये किसी चर्चा का विषय जरूर हो सकता है, लेकिन इससे पहले कि कास्त्रो अपनी अंतिम यात्रा पर जाते, इस सोच के वो भी समर्थक हो चुके थे कि इस रिश्ते की पोषक बदलने का समय आ गया है. इसकी शुरुआत भी उनके रहते ही हो गई जब अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा दिसंबर, 2014 में क्यूबा की धरती पर आए. ऐतिहासिक पल था. 50 साल बाद कोई अमरीकी राष्ट्रपति क्यूबा आया था. ओबामा ने इस दुश्मनी का उल्लेख करते हुए क्यूबा-अमरीका को पूर्ण राजनयिक रिश्ते में बहाल करने की घोषणा की.

जरा देखिये वक्त कैसे बदलता है. फिदेल कास्त्रो जिसके नाम का लोहा दुनिया मानती रही, जिनके बारे में उनकी सुरक्षा में रहे फबियन एस्कलान्ते के अनुसार सीआईए ने कास्त्रो की हत्या के लिए 638 बार प्रयास किए या योजनाएं बनाईं. आज जब वो दुनिया से रुखसत हुए तो लोग उन्हें तानाशाही का पर्याय मानते हुए खुशियां मना रहे हैं. क्योंकि बकौल अकबर इलाहाबादी जबतक कास्त्रो की आंखें बंद होने का समय आया उनके चाहने वाले इस दुनिया से जा चुके थे. ये वो दुनिया बन चुकी है जहां कमुनिस्ट विचारधारा और लिबरल विचारधारा पर सवाल उठाए जा रहे हैं. उदारवादी सोच की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए जा रहे हैं.

जो भी हो फिदेल कास्त्रो आज के समय में चाहे जितना अप्रासंगिक हो गए हों, उनके चाहने वाले भले ही ना रह गए हों, लेकिन साम्राज्यवादी ताकतों से शेरों की तरह मुकाबला करने के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा. चे-गेवारा और फिदेल कास्त्रो, दुनिया के तमाम कमजोर लोगों के दिलों में ज़ुल्म के खिलाफ, हिम्मत पैदा करने का नाम है.

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