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फिदेल कास्त्रो: 20वीं सदी के आखिरी महानायक का जाना

कास्त्रो की छवि दुनिया भर के युवाओं और आन्दोलनों को प्रेरित करती रही है

Updated On: Nov 27, 2016 08:57 AM IST

Anand Pradhan

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फिदेल कास्त्रो: 20वीं सदी के आखिरी महानायक का जाना

फिदेल कास्त्रो नहीं रहे. 90 साल की उम्र में उन्होंने आखिरी सांस ली. उन्होंने अपनी पसंद का जीवन जिया. वे कहा करते थे कि, 'मेरा मानना है कि एक आदमी को अपनी उस उम्र से ज्यादा नहीं जीना चाहिए जब उसका क्षय होने लगता है, जब उसके जीवन की वह चमक क्षीण होने लगती है जिसने उसके सबसे शानदार पलों को रोशन किया था.'

हालांकि जीवन के आखिरी दिनों में वृद्धावस्था और बीमारियों की वजह से उनकी सार्वजनिक मौजूदगी कम हो गई थी. लेकिन इसके बावजूद वे आखिरी सांस तक सक्रिय और सचेत रहे. जीवन के आखिरी वर्षों में भी उन्हें आराम नसीब नहीं हुआ क्योंकि क्यूबाई क्रांति और उसकी उपलब्धियों को बचाए रखने और उसे आगे बढ़ाने की चिंता से कभी मुक्त नहीं हो पाए.

कास्त्रो कहा करते थे कि, 'जीवन की संध्या में विश्राम मेरे नसीब में नहीं है.' उन्हें भला विश्राम नसीब कैसे होता जब वे खुद मानते थे कि, 'क्रांति, गुलाब के फूलों की सेज नहीं है.' वे हमेशा अमेरिका की आंख की किरकिरी बने रहे. ऐसे में, उन्हें आराम कहां से मिलता जब दुनिया की सबसे बड़ी और ताकतवर महाशक्ति क्यूबाई क्रांति का गला घोंटने के लिए आर्थिक-सैनिक नाकेबंदी से लेकर हत्या और तख्तापलट तक हर दांव आजमा रही थी.

सचमुच, यह किसी चमत्कार से कम नहीं है कि कास्त्रो ने अमेरिका के पिछवाड़े क्यूबा में न सिर्फ 1959 में अमेरिका समर्थक बतिस्ता की सरकार पलटकर एक समाजवादी सरकार की स्थापना की बल्कि उसे अमेरिकी नाकेबंदी, प्रतिबंधों और षड्यंत्रों के बावजूद 57 सालों से ज्यादा समय तक कायम रखने में कामयाबी हासिल की. लातिन अमेरिका में संयुक्त राज्य अमेरिका से टकराकर कोई टिक नहीं सका.

फिदेल कास्त्रो इसके एकमात्र और आजीवन अपवाद बने रहे. आश्चर्य नहीं कि क्यूबाई क्रांति का यह नायक जीते जी एक किंवदंती (लीजेंड) बन गया था. दुनिया उन्हें अमरीकी साम्राज्यवाद के खिलाफ अनवरत संघर्ष के एक दुर्धर्ष प्रतीक के रूप में जानती थी. यह संघर्ष सही मायने में 'दिए और बौराए तूफान' की लड़ाई बन गई थी जिसमें हर कोशिश के बावजूद तूफान, दिए को बुझाने में नाकाम रहा.

लातिन अमेरिका में क्यूबा एकमात्र देश था जो अमेरिका को लगातार मुंह चिढ़ाता रहा और फिदेल कास्त्रो एकमात्र ऐसे नेता थे जिसे 11 अमेरिकी राष्ट्रपति आए-गए लेकिन हरा नहीं पाए. कास्त्रो मजाक में कहा करते थे कि अगर हत्या के प्रयासों और तख्तापलट की कोशिशों से बचने के लिए कोई ओलम्पिक गोल्ड मैडल होता तो वह निश्चित तौर पर उन्हें ही मिलता.

असल में, बौराए तूफान को पता नहीं था कि यह दिया, विचारों के तेल से जल और लड़ रहा था. उसे बुझाना आसान नहीं था. उनके नेतृत्व में क्यूबाई समाजवादी गणतंत्र की असली ताकत उसके एक समतामूलक, न्यायप्रिय और शांतिप्रिय गणतंत्र की स्थापना के विचार और उससे बढ़कर उनके अमल में थी. यही कारण है कि सोवियत संघ के ध्वंस के बावजूद क्यूबा नहीं बिखरा. हालांकि सबको लगता था कि सोवियत संघ के विघटन के बाद क्यूबा, अमरीकी आर्थिक-सैनिक नाकेबंदी और षड्यंत्रों के आगे टिक नहीं पाएगा.

फिदेल कास्त्रो

फिदेल कास्त्रो

लेकिन क्यूबा उस झटके से न सिर्फ उबरने में कामयाब रहा बल्कि कास्त्रो की वैचारिक अगुवाई में उसने खुद को फिर से खड़ा कर लिया. यही नहीं, लातिन अमेरिका में अमेरिकी इच्छा के खिलाफ वेनेजुएला से लेकर अर्जेंटीना तक और बोलीविया से लेकर ब्राजील तक अनेकों रंगों की समाजवादी और वामपंथी सरकारें सत्ता में आ गईं. हैरानी की बात नहीं है कि इन सभी सरकारों ने क्यूबाई क्रांति और फिदेल कास्त्रो को अपना वैचारिक नेता माना.

दरअसल, कास्त्रो की सबसे बड़ी कामयाबी यह थी कि 50 वर्षों से ज्यादा समय तक अमेरिकी घेरेबंदी और प्रतिबंधों से लड़ते हुए भी सामाजिक और मानवीय विकास के क्षेत्र में क्यूबा ने उल्लेखनीय प्रगति की है. यहां तक कि सामाजिक और मानवीय विकास के कई पैमानों पर क्यूबा वहां पहुंच चुका है जहां खुद अमेरिका भी नहीं पहुंच पाया है. कास्त्रो अक्सर अमेरिका को ताने मारते हुए कहा करते थे कि वह अपने गरीब और चिकित्सा बीमा की सुविधा के दायरे से बाहर के नागरिकों को क्यूबा भेज दे, उनका मुफ्त इलाज किया जाएगा.

कास्त्रो के दावे में दम था. क्यूबा में प्रति एक लाख की आबादी पर उपलब्ध डाक्टरों की संख्या 519 थी. डाक्टरों की उपलब्धता के मामले में क्यूबा, अमेरिका और दूसरे अनेक विकसित देशों से बहुत आगे इटली के बाद दूसरे स्थान पर है. आश्चर्य नहीं कि आज क्यूबा के 17 हजार से ज्यादा डाक्टर अफ्रीका और लातिन अमेरिकी देशों में काम कर रहे हैं. अपने सभी नागरिकों को बेहतर और मुफ्त स्वास्थ्य और शिक्षा मुहैया कराने में क्यूबा की कामयाबी मानीखेज है.

यही नहीं, मानवीय विकास रिपोर्ट’ 2015 के सूचकांक में क्यूबा उच्च मानवीय विकास हासिल करनेवाले देशों की सूची में है और दुनिया के 188 देशों की सूची में 67वें स्थान पर है. कहने की जरूरत नहीं है कि कास्त्रो अगर क्यूबा के लोगों का भरोसा जीत पाए तो उसकी सबसे बड़ी वजह सामाजिक-मानवीय विकास पर जोर और हर गरीब और आम नागरिक तक एक बेहतर जीवन के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाओं को पहुंचा पाना था.

फिदेल कास्त्रो की कामयाबी की वजह यह थी कि वे वैचारिक तौर पर मार्क्सवादी-लेनिनवादी और स्वपनदर्शी क्रांतिकारी होने के साथ-साथ व्यवहारिक राजनेता, जनशिक्षक, संगठक और प्रयोगकर्ता भी थे. मार्क्सवाद और समाजवाद में विश्वास के बावजूद वे क्यूबाई राष्ट्रवाद और लातिन अमेरिकी एकजुटता के भी घोर पक्षधर थे. वे गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के भी सक्रिय नेता थे.

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कास्त्रो अफ्रीका, लातिन अमेरिका और एशिया के मुक्ति आन्दोलनों और नव गणतंत्रों के साथ भी खड़े रहे. वे भारत के भी अभिन्न मित्र थे और हर मुश्किल में उसके साथ खड़े रहे. आश्चर्य नहीं कि कास्त्रो का सम्मान सिर्फ क्यूबा या लातिन अमेरिका के देशों में ही नहीं बल्कि अफ्रीका और एशिया के देशों में भी उन्हें माननेवाले लोगों की संख्या खासी है. तथ्य यह है कि 60 के दशक से फिदेल कास्त्रो और चे गुएवारा की छवि दुनिया भर के रूमानी क्रांतिकारी युवाओं और बदलाव के आन्दोलनों को प्रेरित करती रही है.

दोहराने की जरूरत नहीं है कि फिदेल कास्त्रो का जाना 20वीं सदी के उत्तर्राद्ध में वैश्विक क्षितिज पर उभरे आखिरी महानायक का जाना है. उनसे पहले नेल्सन मंडेला गए और अब कास्त्रो के जाने के बाद 20वीं सदी में दुनिया को अपने नेतृत्व, संघर्षों और विचारों से झकझोरने वाला आखिरी महानायक भी चला गया. उन्हें जीवन की संध्या में जिस विश्राम के नसीब न होने का मलाल था, आखिरकार उन्हें वह विश्राम मिल गया. लेकिन वे निश्चिंत होकर गए होंगे.

आखिर उनके जीते जी वह ऐतिहासिक घटना भी हुई कि 90 वर्षों में पहली बार किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने क्यूबा की यात्रा की जब राष्ट्रपति बराक ओबामा इस साल मार्च में सपरिवार राजधानी हवाना पहुंचे. यही नहीं, क्यूबा में अमेरिकी दूतावास फिर खुल चुका है.

अलविदा फिदेल!

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