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मुसलमानों का कत्लेआम करता बौद्ध चरमपंथी विरात्हू और उसका 969 आंदोलन

आम म्यांमारी नागरिक के मस्तिष्क पर अंकों की गहरी छाप ही है जिसके कारण चरमपंथी बौद्ध भिक्षुकों ने मुसलमानों के चिह्न के तौर पर 786 को निशाना बनाया है और एक 969 आंदोलन भी स्थापित किया है

Updated On: Sep 23, 2017 02:13 PM IST

Saqib Salim

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मुसलमानों का कत्लेआम करता बौद्ध चरमपंथी विरात्हू और उसका 969 आंदोलन

म्यांमार (बर्मा) में अंकों की अहमियत का अंदाजा केवल इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी आजादी का समय न्यूमरोलोजी (अंक ज्योतिष) द्वारा तय किया गया था. जबकि ब्रिटिश देश को 1 जनवरी, 1948 को ही छोड़ देना चाहते थे पर अंक ज्योतिष्यों के कहने पर आजादी 4 जनवरी की सुबह 4 बजकर 20 मिनट पर दी गई. यहां तक कि 8 अगस्त, 1988 को सेना का शासन के विरुद्ध हुआ ‘8888 विद्रोह’ भी अंकों की गणना के कारण ही उसी दिन हुआ था.

ये आम म्यांमारी नागरिक के मस्तिष्क पर अंकों की गहरी छाप ही है जिसके कारण चरमपंथी बौद्ध भिक्षुकों ने मुसलमानों के चिह्न के तौर पर 786 को निशाना बनाया है और एक 969 आंदोलन भी स्थापित किया है.

969 क्या है ये जानने से पहले ये जानना भी जरूरी है की 786 क्या है और म्यांमार में इसको किस प्रकार पेश किया जा रहा है. अबजद एक अरब अंक प्रणाली है जिसके तहत अरबी वर्णमाला के हर अक्षर के लिए एक अंक होता है.

इस व्यवस्था के आधार पर कुरान की पहली पंक्ति 'शुरू करता हूं में अल्लाह के नाम से जो दयावान और करुणामयी है' का आंकलन 786 होता है. यही कारण है कि दुनिया भर में मुसलमान अपनी दुकान, मकान और अन्य स्थानों पर इस संख्या को लिखते हैं.

यूं शुरू हुआ 969 आंदोलन 

लेकिन पिछले कुछ सालों में म्यांमार के चरमपंथी बौद्ध संगठनों ने इसको एक अलग मतलब देना शुरू कर दिया है. वो म्यांमार की अंकों में अत्यधिक विश्वास रखने वाली जनता को ये समझाने में काफी हद तक कामयाब हुए हैं कि 786 (चूंकि ‘7+8+6= 21’) मुसलमानों का एक कोड है जिसका अर्थ है कि उनको 21वीं सदी में पूरी दुनिया में जिहाद कर के अपना साम्राज्य स्थापित करना है.

इस फर्जी कहानी को गढ़ने के बाद उसके ही जवाब के तौर पर कुछ चरमपंथी बौद्ध भिक्षुकों ने 969 आंदोलन स्थापित किया है. जिसमें 9 बुद्ध के नौ गुणों को दर्शाता है, 6 बौद्ध दीक्षा के छह गुण हैं और 9 बौद्ध भिक्षुक के गुण हैं.

969 आंदोलन ‘8888’ विद्रोह के दमन के बाद 1990 के आसपास शुरू हुआ था. क्याव ल्विन इसके पहले बड़े नेता के रूप में उभरे. जिनकी मृत्यु के बाद 2001 में विरात्हू, जो आज भी इस आंदोलन के मुखिया हैं, ने आंदोलन की बागडोर संभाली.

969 का मानना है कि म्यांमार केवल बुद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए है, उसमें भी बामर संजातीय समूह के बौद्धों का इस पर पहला हक है.

An Indonesian hardline Islamic Defenders Front member holds a poster of Buddhist monk Ashin Wirathu, a proponent of the Buddhist extremist movement in Myanmar known as 969 and was once jailed by Myanmar's former military junta for anti-Muslim violence, during a protest in front of the Myanmar Embassy in Jakarta, May 27, 2015. Thousands of Rohingya Muslims from Myanmar and migrants from Bangladesh have tried to land in Thailand, Malaysia and Indonesia since a Thai crackdown on people smugglers in early May led to trafficker crews abandoning them at sea. The poster reads, "The monk Ashin Wirathu is a Rohingya Muslim slaughterer." REUTERS/Beawiharta - GF10000108807

कौन है विरात्हू?

विरात्हू के मुसलमानों को ले कर विचार नफरत से भरे और हिंसा भड़काने वाले रहे हैं. 2001 और 2003 में हुए दंगों में 200 से ज्यादा मुसलमान मारे गए थे और हजारों बेघर हुए थे. तब की सेना की सरकार ने विरात्हू को धार्मिक उन्माद भड़काने का दोषी पाते हुए पच्चीस साल की सजा सुनाई थी.

ये अलग बात है कि 2011 में जब सेना ने लोकतंत्र के लिए बातचीत शुरू की तो कई राजनीतिक दोषियों के साथ साथ विरात्हू को भी रिहा कर दिया गया. ये शायद मानवता के ऐतबार से एक बड़ी भूल थी.

पिछली बार जब विरात्हू जेल गया था तब उसकी बात या तो उसकी रैली में सुनी जा सकती थी या किसी अखबार से पर अब 2011 में दुनिया काफी बदल चुकी थी. सेना की रोकटोक हट चुकी थी. फेसबुक और व्हाट्सऐप के जरिए उसके भाषण और तेजी से फैलने लगे. वो यूट्यूब के उपदेशों में खुलेआम धार्मिक उन्माद फैलाने लगा.

जहां भी कोई छिटपुट हिंसा होती उसकी जिम्मेदारी मुसलमानों पर बढ़ा-चढ़ा कर रख दी जाती. उसके कुछ प्रमुख आरोपों में मुसलामानों का अधिक बच्चे पैदा करना, बौद्ध औरतों का बलात्कार और उनका धर्म परिवर्तन है. उसका ये भी कहना है कि मुसलमान बौद्धों से म्यांमार छीन लेना चाहते हैं और वो ऐसा नहीं होने देगा.

रोहिंग्या शरणार्थी बॉर्डर पार करने के बाद नाफ नदी पार करने के लिए नावों का इंतजार करते हुए.

म्यांमार सरकार भी दे रही है चरमपंथ को शह

यहां गौरतलब बात ये है कि म्यांमार में 4%-5% मुसलमान आबादी है, जिसका ये डर दिखाया जा रहा है. विरात्हू केवल धर्म का चोला पहन कर मुसलमानों के खिलाफ लोगों नहीं भड़का रहा. वो आमतौर पर अपना हर उपदेश ‘जो भी हमें करना है, देशभक्त की तरह करना है’ से शुरू करता है. बड़ी ही खूबसूरती से मुसलमानों के खिलाफ नफरत को धर्म और देशभक्ति का चोला पहना कर पेश किया जा रहा है.

सिर्फ इतना ही नहीं इस कथन को मजबूती देने के लिए बार-बार ये कहा जाता है की मुसलमान बाहरी हैं और भारत या बंगाल से आए हैं. उन पर आरोप लगाया जाता है कि वो बौद्धों के व्यवसाय और नौकरियां खा रहे हैं इसलिए उनको देश से निकल कर ही देश की समस्याओं का हल हो सकता है.

इसलिए 969 आंदोलन मुसलमानों के व्यवसायों और दुकानों का सामाजिक बहिष्कार के लिए कहता है. न केवल इतना वे मुसलमानों को नौकरियां देने से भी मना करते हैं.

ऐसे में सरकार अपने बौद्ध वोट बैंक के लिए 969 को रोकना तो दूर उसे और बढ़ावा दे रही है. जिसका सबसे अमानवीय उदाहरण 2015 में तब देखने को मिला जब विरात्हू और उस जैसे एनी चरमपंथियों के सामने घुटने टेकते हुए सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों से मताधिकार छीन लिया.

रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या का हल केवल तब ही निकल सकता है जब म्यांमार सरकार चरमपंथी धर्म के ठेकेदारों के चंगुल से निकले और सेना की ‘जनता’ सरकार की तरह विरात्हू जैसे भिक्षुकों को जेल में डालने की हिम्मत दिखाए.

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