S M L

पाकिस्तान डायरीः हर पाकिस्तानी एक लाख रुपए का कर्जदार

पाकिस्तान का व्यापारिक घाटा बढ़ कर 15 अरब डॉलर तक जा पहुंचा और न तो बेगलाम आयात को रोका जा सका है और न ही खुले आम हो रही तस्करी पर कोई रोक लगाई जा सकी है

Updated On: Dec 18, 2017 12:02 PM IST

Seema Tanwar

0
पाकिस्तान डायरीः हर पाकिस्तानी एक लाख रुपए का कर्जदार

भारत के खिलाफ बयानबाजी में पाकिस्तान भले ही बढ़ चढ़ कर बात करता हो, लेकिन हकीकत यही है कि आर्थिक मोर्चे पर उसकी हालत बहुत पतली है. पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में देश पर बढ़ते कर्जों को लेकर चिंता जताई जा रही है. पाकिस्तानी रुपया अमेरिका डॉलर के मुकाबले लगातार गोते खा रहा है जिससे न सिर्फ महंगाई बढ़ने का खतरा है, बल्कि आर्थिक तंत्र भी हिचकोले खा रहा है.

दूसरी तरफ इस्लामी देशों के सैन्य संगठन में पाकिस्तान की हिस्सेदारी पर विपक्ष के सवाल भी मीडिया में चर्चा का विषय हैं. पाकिस्तानी विपक्ष इस बात से खफा है कि 40 से ज्यादा मुस्लिम देशों में सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनते हुए उसे क्यों विश्वास में नहीं लिया गया.

कर्जों के घनचक्कर में पाकिस्तान

रोजनामा ‘एक्सप्रेस’ के संपादकीय का शीर्षक है- पाकिस्तान पर विदेशी कर्जों का बढ़ता हुआ बोझ. अखबार ने पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान की रिपोर्ट का हवाला देते हुए लिखा है कि सितंबर तक कर्ज 85 अरब डॉलर तक पहुंच गया और एक साल में इसकी वृद्धि दर 12.3 फीसदी रही.

अखबार लिखता है कि एक डॉलर 110.54 पाकिस्तानी रूपए के बराबर है और जानकार इसमें और गिरावट की आशंका देख रहे हैं. स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान का कहना है कि जुलाई से सितंबर तक की तिमाही में दो अरब दस करोड़ डॉलर विदेशी कर्जों की अदायगी में खर्च किए गए. अखबार की राय में, ये आंकड़े बताते हैं कि 'हमारे आर्थिक मैनेजरों की नीतियां दुरुस्त नहीं थी और अगर देश पर कर्जों का भार यूं ही बढ़ता रहा तो देश की अर्थव्यवस्था को संभालना मुश्किल होता जाएगा.'

pakistan

रोजनामा ‘दुनिया’ लिखता है कि आज शायद ही ऐसा कोई देश हो जिसने घरेलू या विदेशी कर्ज न ले रखे हों, इसलिए ये पाकिस्तान की भी मजबूरी है. लेकिन अखबार कर्जों को एक हद में ही रखने की बात करता है ताकि देश के संसाधनों और मुद्रा भंडार पर असर न पड़े.

पाकिस्तान की खस्ता आर्थिक हालत के लिए सरकार और हुकमरानों को जिम्मेदार करते हुए अखबार लिखता है कि मौजूदा कानून के तहत कर्जे देश की जीडीपी के 60 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होने चाहिए लेकिन इस वक्त कर्जे जीडीपी के 65 प्रतिशत तक जा पहुंचे हैं.

अखबार लिखता है कि सरकारों ने इतना कर्ज लिया है कि इस वक्त हर पाकिस्तानी एक लाख रुपए के कर्ज में दबा है और देश कर्जों के घनचक्कर में फंसता जा रहा है. अखबार के मुताबिक पाकिस्तान पर घरेलू कर्जों का बोझ 16,200 अरब रुपए है तो विदेशी कर्जों का बोझ 9000 अरब रुपए.

इसी विषय पर रोजनामा 'आज' लिखता है कि पाकिस्तान का व्यापारिक घाटा बढ़ कर 15 अरब डॉलर तक जा पहुंचा और न तो बेगलाम आयात को रोका जा सका है और न ही खुले आम हो रही तस्करी पर कोई रोक लगाई जा सकी है.

अखबार कहता है कि डॉलर के मूल्य में इजाफे की वजह से जब महंगाई का सैलाब आएगा तो सरकार से पास उसे काबू करने का कोई तरीका नहीं होगा. अखबार कहता है कि इन हालात में अर्थव्यवस्था पर जो नकारात्मक असर पड़ रहा है उस पर नीति निर्माताओं को ध्यान देने की जरूरत है.

हिस्सेदारी पर सवाल 

वहीं रोजनामा ‘मशरिक’ ने इस्लामी सैन्य गठबंधन में पाकिस्तान की हिस्सेदारी को लेकर संसद के ऊपरी सदन सीनेट में विपक्ष की आपत्तियों को अपने संपादकीय में तवज्जो दी है.

pakistan 1

अखबार कहता है कि कितनी अजीब बात है कि प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री और सेना प्रमुख इस गठबंधन के एक हालिया सम्मेलन में हिस्सा लेकर भी आ गए, फिर भी कोई ये नहीं बता रहा है कि अमेरिका और अरब मुस्लिम देशों के इस गठबंधन में पाकिस्तान के हिस्सा लेने की वजह और जरूरत क्या है.

अखबार ने पाकिस्तान मुस्लिम लीग एन की सरकार पर तंज कसते हुए कहा है कि उठते बैठते लोकतंत्र का पाठ पढ़ने वाले इस मामले पर संसद को विश्वास में लेने से कतरा रहे हैं.

अखबार कहता है कि अरब राजनीति के विवाद और कुछ मुस्लिम देशों की आपत्तियां इस बात का साफ संकेत हैं कि पाकिस्तान को ऐसे किसी भी सैन्य या सियासी गठबंधन से दूर रहना चाहिए, जिसके गठन को किसी एक या चार मुस्लिम देशों के खिलाफ माना जा रहा है.

अखबार का इशारा इस गठबंधन में सिर्फ सुन्नी मुस्लिम देशों की हिस्सेदारी की तरफ है और इस गठजोड़ को शिया बहुल ईरान और उसके सहयोगी देशों के खिलाफ समझा जा रहा है.

रोजनामा ‘जंग’ लिखता है कि सीनेट में पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के फरतुल्लाह बाबर ने सवाल किया कि पाकिस्तान के पूर्व आर्मी चीफ राहील शरीफ को इस सैन्य गठबंधन का मुखिया क्यों चुन लिया गया और इस गठबंधन के टर्म ऑफ रेफरेंस क्या हैं?

अखबार ने इस बारे में सफाई देने के लिए मंगलवार को विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ को सीनेट में तलब किए जाने के फैसले को सही बताया है और लिखा है कि गठबंधन में शामिल होने के सकारात्मक और नकात्मक, दोनों ही पहलुओं पर गौर होना चाहिए, ताकि पाकिस्तान फिर किसी आजमाइश से दो चार न हो.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Jab We Sat: ग्राउंड '0' से Rahul Kanwar की रिपोर्ट

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi