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इमैनुएल मैक्रों-ब्रिगिट: अजब प्रेम की गजब कहानी

16 साल की उम्र में ही ब्रिगिट को दिल दे बैठे थे मैंक्रो

Rajesh Raparia Rajesh Raparia Updated On: May 08, 2017 08:58 PM IST

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इमैनुएल मैक्रों-ब्रिगिट: अजब प्रेम की गजब कहानी

अब कोई शक नहीं रह गया है कि मध्यमार्गी 39 वर्षीय इमैनुएल मैक्रों फ्रांस के नए राष्ट्रपति होंगे. फ्रांस का यह चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक है. छह दशकों के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि मुख्य दक्षिणपंथी या वामपंथी दलों का कोई भी उम्मीदवार राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ में नहीं था. मैक्रों फ्रांस के सबसे युवा राष्ट्रपति हैं. मैक्रों ने विश्व में अतिराष्ट्रवाद की तेज बयार को शिकस्त देकर यह जीत हासिल की है.

मैक्रों एक पूर्व इंवेस्टमेंट बैंकर हैं, जिन्हें फ्रांस की राजनीति में बाहरी व्यक्ति माना जाता है. मैक्रों को राजनीति में राष्ट्रपति फ्रांस्वां ओलांद ही लाए थे. वे ओलांद की समाजवादी सरकार में वित्त मंत्री थे, पर सरकार से इस्तीफा देकर उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में अपनी उम्मीदवारी घोषित कर दी. तब उनका निर्णय बेहद अपरिपक्व माना गया था.

अप्रैल 2016 में उन्होंने अपनी सियासी मुहिम 'एन मार्शे' छेड़ दी. मैक्रों को चुनावी अभियान चलाने का कोई अनुभव नहीं था. फिर भी वे राष्ट्रपति की चुनावी दौड़ में महारथियों को पछाड़ते हुए सबसे आगे निकल गए. उनका अभियान भी अलबेला था. उसमें न झंडा था, न पर्चे. उनका पूरा अभियान टीवी कैमरों की भारी चकाचौंध से दूर ही रहा.

शुरुआत में राजनीतिक जानकारों ने उनका मखौल उड़ाया और अनाड़ी घोषित कर दिया. मैक्रों का सपना उपन्यासकार बनने का था, पर भाग्य ने उन्हें का फ्रांस का सबसे युवा राष्ट्रपति बना दिया.

अद्भुत प्रेमकथा की जीत

Emmanuel Macron

मैक्रों की विजय अल्ट्रा राष्ट्रवादियों की हार ही नहीं है, बल्कि अद्भुत प्रेमकथा की भी जीत है. इस प्रेमकथा का उनके विरोधियों ने जम कर मजाक ही नहीं उड़ाया, बल्कि उन्हें कुंठाग्रस्त तक घोषित कर दिया.

मैक्रों की पत्नी ब्रिगिट उनसे उम्र में 24 साल बड़ी हैं और सात बच्चों की दादी-नानी हैं. 16 साल की उम्र में स्कूली दिनों में मैक्रों ब्रिगिट को दिल दे बैठे थे. तब वे एमियंस शहर के प्राइवेट स्कूल में पढ़ते थे और उसमें ब्रिगिट उनकी ड्रामा टीचर थीं. उन्हें पहली नजर में ही ब्रिगिट से प्यार हो गया था, तब वे तीन बच्चों की मां थीं. ब्रिगिट की बेटी मैक्रों की क्लास में पढ़ती थी और उनकी गर्लफ्रेंड भी थी.

शुरुआत में मैक्रों के मां-बाप को लगता था कि इसका कुछ चक्कर गर्लफ्रेंड के साथ  है. पर जब उन्हें मालूम हुआ कि मामला कुछ और है, तो वे घबरा गए और उन्होंने ब्रिगिट को मैक्रों से दूर रहने को कहा कि अभी मैक्रों किशोर है. पर ब्रिगिट ने उन्हें कोई आश्वासन देने से इंकार कर दिया.

पढ़ाई के चलते 18 साल की उम्र में मैक्रों पेरिस आ गए. पर उन्होंने तभी ब्रिगिट को जता दिया था कि वे उनसे शादी करेंगे. बाद में मैक्रों ने एक इंटरव्यू में बताया कि पेरिस आने के बाद ब्रिगिट से उनकी घंटों बातें होती थी. ब्रिगिट अपने पति से कुछ दिन अलग रहीं, फिर तलाक देकर पेरिस आ गईं.

2007 में दोनों ने शादी कर ली. अब ब्रिगिट फ्रांस की 'फर्स्ट लेडी' कहलाएंगी. मैक्रों ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि उन्होंने प्रेम विवाह को लेकर कभी कुछ भी नहीं छिपाया है. वे मानते हैं कि उनकी शख्सियत में उनकी पत्नी की बड़ी भूमिका है.

मुद्दा बनाने की कोशिश

Emmanuel Macron

राजनीति, और उसमें भी चुनाव एक ऐसी चीज है जिसमें विरोधी आक्रमण करने के लिए सात पुश्तों का इतिहास निकाल लाते हैं.

उम्र के इस भारी अंतर को लेकर विरोधियों ने बवाल मचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, जबकि पश्चिम देशों की राजनीति में उम्र का अंतर, तलाक, इतर संबंध न तो अजूबा हैं, न उन्हें सामाजिक वर्जना माना जाता है.

शादी या प्रेम में उम्र में भारी अंतर के कई हालिया प्रसंग हैं. फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी की मॉडल पत्नी कार्लो ब्रूनी उनसे उम्र में 13 साल छोटी हैं. लेकिन वहां कोई अतिरेकी प्रतिक्रिया नहीं हुई. हां, दोनों की लंबाई को लेकर काफी किस्से-कहानी हुए.

सरकोजी लंबाई में कार्लो से छोटे थे, जैसे भारत में राज कुंद्रा और शिल्पा शेट्टी की जोड़ी. मौजूदा फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वां ओलांद के प्रेम-प्रसंग वहां काफी चर्चित हैं. उनकी माशूका अभिनेत्री और प्रोड्यूसर जूली गायेत उनसे 18 वर्ष छोटी हैं, पर कोई हाय-तौबा नहीं मची. पर मोटरसाइकिल पर जूली को घुमाते हुए राष्ट्रपति ओलांद के फोटो के चर्चे आम हुए.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दो बार तलाक दे चुके हैं. उनकी तीसरी पत्नी मेलेनिया भी उम्र में 24 साल छोटी हैं. पर मैक्रों और ब्रिगिट का मसला ठीक इससे उलटा है. ब्रिगिट मैक्रों से 24 साल बड़ी हैं.

पहली मर्तबा यह जान कर फ्रांसीसी जनता भी चौंक गई थी. पर इसे वहां गैर-राजनीतिक मुद्दा करार दिया गया और आम धारणा बनी कि यह निजी मामला है और राजनीति का इसमें राष्ट्रपति चुनाव से कोई लेना-देना नहीं हो सकता है.

मैक्रों ने भी  चुनाव के पहले चरण में विजयी होने के बाद सार्वजनिक बयान देकर विरोधियों के मंसूबों पर पानी फेर दिया कि आज वह जो भी हैं, ब्रिगिट की वजह से हैं.

हां, इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह वाकया यदि भारत या ब्रिटेन में होता तो भारतीय या ब्रितानी जनता उन्हें देश-निकाला तो नहीं दे पाती, पर समाज-निकाला अवश्य कर देती.

असल में इस मुद्दे ने चुनाव में महिलाओं को मैक्रों के पक्ष में खड़ा कर दिया. उन्होंने इसे महिला प्रतिशोध की संज्ञा दी, क्योंकि प्राय: बड़ी उम्र के पुरुष से छोटी उम्र की महिला की शादी या प्रेम के किस्से ही ज्यादा होते हैं. यह तो विस्तृत चुनाव परिणामों से पता चलेगा कि उनके पक्ष में महिलाओं ने कितना मतदान किया.

बहुमत हासिल करेंगे मैक्रों

 Emmanuel Macron

अपनी जीत की सूचना के बाद पहली विजय रैली में अपने समर्थकों से मैक्रों ने कहा कि देश में अरसे से लंबित आवश्यक बदलाव के लिए सबसे पहले संसद में बहुमत हासिल करेंगे.

उन्होंने भरोसा दिलाया है कि आगामी पांच सालों में वह सब काम करेंगे ताकि भविष्य में कोई भी अल्ट्रा राष्ट्रवादियों को मत देने के बारे में सोचे भी नहीं.

उन्होंने दावे के साथ कहा 'हमारा दायित्व बड़ा है. उनको पूरा करने के लिए प्रबल बहुमत चाहिए. जून में होने वाले निचले सदन के चुनावों में प्रचंड बहुमत हासिल करना हमारा पहला लक्ष्य होगा.'

अप्रवासियों का मुद्दा चुनाव में अहम रहा है. इस पर मैक्रों और पराजित मरी ला पेन के रवैये में भारी अंतर रहा. मैक्रो का रवैया नरम था और पेन का बेहद कठोर.

मैक्रों यूरोपीय संघ के समर्थक हैं और कारोबार बढ़ाकर अनेक समस्याओं का निदान करना चाहते हैं, जबकि पेन यूरोपीय संघ को छोड़ने की प्रबल पक्षधर हैं.

मैक्रों सरकारी घाटे को जीडीपी के तीन फीसदी के अंदर रखना चाहते हैं. इसके लिए 60 अरब यूरो की बचत करना उनका लक्ष्य है. कॉर्पोरेट टैक्स भी 33% से घटा कर 25% करना चाहते हैं.

हां, मैक्रों बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल पर प्रतिबंध के पक्षधर हैं. बच्चों में स्वतंत्रता, समता और भातृत्व  की भावना अधिकाधिक विकसित करने के लिए वे बच्चों को 500 यूरो का सांस्कृतिक भत्ता देना चाहते हैं, ताकि किताबों और थियेटर के माध्यम से यह भावना विकसित हो सके.

फिलवक्त, मैक्रों की जीत ने फ्रांस यूरोप और बाकी दुनिया को राजनीतिक, आर्थिक उथल-पुथल से बचा लिया है. आकलन था कि मरी ला पेन की जीत से ब्रेक्जिट अधिक से हड़कंप यूरोपीय बाजारों में मच जायेगा, जिसका असर अमेरिका समेत अन्य देशों पर भी पड़ता.

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