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लोगों की राय बदल सकते हैं अखबारों में छपे 'संपादकीय'

अध्ययन में पाया गया है कि लोग अपने राजनीतिक झुकाव की ओर विचार ना करते हुए संपादकीय में लिखी राय के अनुसार ही अपनी राय बना लेते हैं

Bhasha Updated On: Apr 25, 2018 04:09 PM IST

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लोगों की राय बदल सकते हैं अखबारों में छपे 'संपादकीय'

हाल ही में हुए एक अध्यन के मुताबिक अखबारों में अपनी राय देने वाले संपादकीय (ओ-पेड) दिन भर के मुद्दों के बारे में लोगों की सोच बदलने में प्रभावकारी साबित हो सकते हैं. क्वार्टर्ली जर्नल ऑफ पॉलिटिकल साइंस में प्रकाशित अध्ययन में पाया गया है कि लोग अपने राजनीतिक झुकाव की ओर विचार ना करते हुए संपादकीय में लिखी राय के अनुसार ही अपनी राय बना लेते हैं.

दो प्रयोगों के जरिए शोधकर्ताओं ने पाया कि संपादकीय (ओ-पेड) का आम जनता और नीति विशेषज्ञों दोनों के विचारों पर बड़ा और चिरकालीन असर पड़ता है.  बता दें कि द न्यूयॉर्क टाइम्स ने 21 सितंबर 1970 को सबसे पहले ‘अपोजिट ऑफ द एडीटोरियल पेज’ या ओ-पेड पेज की शुरुआत की थी ताकि समाचारों में प्रमुख मुद्दों पर चर्चा और समझ को बढ़ावा दिया जाए. आज सभी प्रमुख प्रिंट और ऑनलाइन अखबारों में ओ-पेड कॉलम प्रकाशित होता है. पैरोकारी समूह, राजनीतिक संगठन, थिंक टैंक और अकादमिक्स ओ-पेड लिखने में पर्याप्त समय और संसाधन लगाते हैं.

अमेरिका में येल युनिवर्सिटी के सहायक प्रोफेसर एलेक्जेंडर कोप्पोक्क ने कहा, ‘ओ-पेड को लिखने में जितना समय और ऊर्जा लगती है उससे यह सवाल उठता है कि क्या लोग इन संपादकीयों से प्रभावित होते हैं.’ उन्होंने कहा, ‘हमने पाया कि ओ-पेड का किसी मुद्दे पर लोगों के राजनीतिक जुड़ाव या शुरुआती रुख पर ध्यान दिए बिना विचारों पर चिरकालीन प्रभाव पड़ता है.’

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