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डोनाल्ड ट्रंप को किम जोंग उन से राष्ट्रपति बनकर मिलना होगा...व्यापारी बनकर नहीं

ट्रंप बतौर राजनेता और बतौर बिजनेसमैन ये बात जानते होंगे कि डिप्लोमेसी हो या बिजनेस ,एक ही कार्ड बार बार नहीं चलता

Updated On: May 31, 2018 03:20 PM IST

Alpyu Singh

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डोनाल्ड ट्रंप को किम जोंग उन से राष्ट्रपति बनकर मिलना होगा...व्यापारी बनकर नहीं

'किसी डील के दौरान,अधीर दिखना शायद सबसे खराब होता है. आपके विरोधी को आप की ये कमजोरी पता चल जाती. तब आपका खेल खत्म ही समझो.' 1987 में डोनाल्ड ट्रंप ने बतौर बिजनेसमैन एक किताब लिखी थी- The Art of the Deal. ये लाइनें वहीं से ली गई हैं. किताब बेस्टसेलर थी और इसीलिए शायद 31 साल बाद ट्रंप ने नॉर्थ कोरिया के साथ बातचीत की डील में बिजनेस के इसी फॉर्मूले को आजमाया.

पिछले सप्ताह नॉर्थ कोरिया और अमेरिका के बीच कभी हां-कभी ना वाला डिप्लोमेसी का एक रोमांचक खेल चला. हाई-रिस्क और हाई-गेन वाली डील में दोनों देशों की ओर से कूटनीति के कई राउंड्स हुए. मैक्सिमम प्रेशर की नीति पर चल ट्रंप दावा कर सकते हैं कि वो पहले राउंड में जीते हैं. लेकिन आखिरकार उत्तर कोरिया के अप्रत्याशित संयम के आगे सब चौंक गए. बिजनेस में चलने वाला फॉर्मूला डिप्लोमेसी में भी उतना कारगार हो ये जरूरी नहीं क्योंकि खेलों की तरह डिप्लोमेसी के भी कई राउंड होते हैं, और अमेरिका-नॉर्थ कोरिया के बीच डिप्लोमेसी के कई दौर अभी बाकी हैं.

लीबिया मॉडल से मैक्सिम प्रेशर

मीटिंग की तारीख तय होने के बाद से ही ट्रंप प्रशासन की ओर से लीबिया मॉडल का जिक्र बार-बार सामने आया. नॉर्थ कोरिया पर 'मैक्सिमम प्रेशर' की डिप्लोमेसी की शुरुआत सबसे पहले एनएसए जॉन बोल्टन के उकसावे से भरे बयान से हुई, जो एक टीवी प्रोग्राम का हिस्सा था. 2003 में जॉर्ज बुश के सिपहसालार रहे बोल्टन ने अमेरिका के साथ हुई लीबिया की परमाणु डील को अपनी आंखों से होते देखा था,और इसी मॉडल का जिक्र उन्होंने परमाणु निरस्त्रीकरण को लेकर नॉर्थ कोरिया और अमेरिका के बीच होने वाली बातचीत के लिए कर दिया. फिर तो जैसे बोतल से जिन्न निकल गया.

उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने एक दूसरे टीवी कार्यक्रम में लगभग धमकी के अंदाज़ में नॉर्थ कोरिया को चेताया कि 'अगर किम-जोंग-उन ने समझौता नहीं किया तो कोरिया का हश्र भी लीबिया जैसा होगा.' इस पर नॉर्थ कोरिया का रूख वैसा ही होना था जैसा कि उम्मीद की जा रही थी. कोरियाई विदेश मंत्रालय से तीखी प्रतिक्रिया आई, 'हमने बातचीत के लिए अमेरिका से भीख नहीं मांगी है. और अगर वो हमारे साथ बैठना नहीं चाहते तो ये उन पर निर्भर है कि वो हमसे मीटिंग रूम में मिलना चाहेंगे या परमाणु युद्ध के वॉरजोन में.'

लेकिन इसके बाद जो हुआ वो कूटनीति का असल खेल था. कहीं नॉर्थ कोरिया खुद ही बातचीत खारिज ना कर दे, उससे पहले ट्रंप ने गुरुवार को किम जोंग को चिट्ठी लिखकर बातचीत रद्द करने का ऐलान कर दिया. ट्रंप का ये दाव मैक्सिमम प्रेशर रणनीति का राउंड टू था. लेकिन इस बार नॉर्थ कोरिया ने बहुत सयंम से काम लिया और कहा कि वो तो बातचीत के लिए कहीं भी, कभी भी राजी है. अगले ही दिन डोनाल्ड ट्रंप का यू-टर्न वाला बयान आया. बातचीत रद्द करने के बाद एकदम एक्टिव मोड में आई अमेरिकी डिप्लोमेसी ने खुद ही अपनी अधीरता छुपाने के चक्कर में उघाड़कर सामने रख दी.

ईरान के साथ-साथ नॉर्थ कोरिया से भी नहीं टकराना चाहता अमेरिका

ईरान के साथ संघर्ष में खड़ा अमेरिका नॉर्थ कोरिया के साथ भी टकराव के हालात में खुद को नहीं देखना चाहता. ट्रंप उत्तर कोरिया के मसले को सुलझाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति बनना चाहते हैं, लेकिन वो ये दिखाना नहीं चाहते कि ये बातचीत उनके लिए कितनी अहम है. वहीं नॉर्थ कोरिया के लिए भी कोरियाई युद्ध के बाद से किसी अमेरिकी राष्ट्रपति से बातचीत की टेबल के पार बैठने का का महत्व क्या है ये उसका राजनीतिक नेतृत्व जरूर जानता भी है और समझता भी है.

इसीलिए दोनों देशों ने डिप्लोमेसी की बेस्ट टीम बातचीत की तैयारी के पहले मैदान में उतार दी है. उत्तर कोरिया की ओर से विवादित चेहरा किम-यों-चोल हैं. नॉर्थ कोरिया के पूर्व इंटेलीजेंस प्रमुख लेकिन तानाशाह किम के खासमखास. चोल ने दोनों कोरियाई देशों के बीच मध्यस्थता में भी अहम रोल अदा किया था. अमेरिका की ओर से दो टीमें हैं, जो बैकडोर डिप्लोमेसी के काम को देख रही हैं. कोरिया पहुंची टीम की अगुवाई सुंग किम कर रहे हैं, जो पहले साउथ कोरिया में अमेरीकी राजदूत थे तो वहीं सिंगापुर वाली टीम की कमान वाइट हाउस के डिप्यूटी चीफ ऑफ स्टाफ जो हेगिन के जिम्मे है.

बातचीत की तैयारी जोरों से चल रही है और ऐसे में अमेरिका ये दिखाना चाहेगा कि पहले राउंड में अमेरिका की मैक्सिमम प्रेशर की रणनीति काम आई. लेकिन इससे आगे नॉर्थ कोरिया पर लीबिया बम गिराना अब अमेरिका के लिए फायदेमंद शायद ना रहे.

बातचीत कैंसल होने के तुरंत बाद अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने ट्रंप के फैसले को सही ठहराया था और कहा था कि प्योंगयोंग को ये समझना ही होगा कि अमेरिका परमाणु हथियारों का पूरी तरह से खात्मा चाहता है. पोम्पियो दो बार कोरिया होकर आए हैं और किम जोंग से भी मिल चुके हैं. दबाव की रणनीति जारी है, जिसमें अमेरिकी प्रशासन का एक तबका लीबिया के जिक्र के साथ आगे बढ़ा रहा है फिर चाहे वो बोल्टन हो या पेंस.

किम जोंग उन के साथ माइक पोम्पियो.

किम जोंग उन के साथ माइक पोम्पियो.

नॉर्थ कोरिया लीबिया मॉडल के नतीजे समझता है?

तो क्या अमेरिकी नेतृत्व ये नहीं जानता कि लीबिया मॉडल उत्तर कोरिया में भय पैदा करता है? 2003 में अमेरिका के साथ लीबिया की परमाणु हथियारों के खात्मे को लेकर डील हुई थी. उसके बाद 2011 का लीबिया संकट, पश्चिमी देशों का मिलिट्री दखल और गद्दाफी की मौत. सब दुनिया ने देखा है. ऐसे में कोरियाई नेतृत्व ये भी सोचता होगा कि क्या अमेरिका के साथ लीबिया का समझौता जन्म लेता अगर गद्दाफी को ये पता होता कि इसका रास्ता उसकी मौत की ओर जाएगा?

क्या उत्तर कोरिया का राजनीतिक नेतृत्व ये महसूस नहीं करता कि शायद परमाणु कार्यक्रम ही उसके अब तक वजूद में बने रहने की वजह भी हैं. इसलिए लीबिया का जिक्र होगा तो कोरिया तो असहज होगा ही. 2011 में लीबिया संकट पर नॉर्थ कोरिया के विदेश मंत्रालय ने उस वक्त भी तीखी प्रतिक्रिया दी थी उसने कहा था कि 'परमाणु कार्यक्रम के खात्मे के नाम पर दखल का ये तरीका आक्रमणकारी है. लीबिया संकट से अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को सबक सीखने की जरुरत है.'

वैसे परमाणु हथियारों के खात्मे की डील बिना लीबिया का नाम लिए भी डराने वाली ही है. इस डर की जड़ में उन देशों के अनुभव शामिल हैं, जिन्होंने बिना किसी दबाव के परमाणु हथियार नष्ट किए हैं- दक्षिण अफ्रीका, यूक्रेन, बेलारूस और कजाकिस्तान. दक्षिण अफ्रीका को छोड़ बाकी तीन देशों ने तब खुद को न्यूक्लियर हथियारों से दूर किया जब सोवियत संघ का विघटन हो रहा था,और वो खुद को स्वायत्त देश घोषित कर रहे थे. लेकिन यूक्रेन का उदाहरण कोरिया के सामने आज भी होगा. रूस की ओर से बागियों को मदद दिए जाने के बाद वहां का राजनीतिक नेतृत्व इस फैसले को लेकर सोचता जरूर होगा. परमाणु हथियारों और देशों की स्वायत्तता का ये एक ऐसा पहलू है, जिसे नॉर्थ कोरिया नजरअंदाज करना नहीं चाहेगा.

नॉर्थ कोरिया से ज्यादा खतरा, लेकिन सही वक्त उठाने का वक्त अब भी बचा है

इसके अलावा जानकार मानते हैं कि नॉर्थ कोरिया और लीबिया के परमाणु कार्यक्रमों की तुलना वैसे भी नहीं की जा सकती. लीबिया के पास परमाणु हथियार थे ही नहीं. नॉर्थ कोरिया के परमाणु कार्यक्रम बहुत परिपक्व रूप में हैं और उसके पीछे चीन खड़ा है, जबकि लीबिया के साथ ऐसा नहीं था. इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी की 2004 की रिपोर्ट बताती है कि 1980-1990 के बीच लीबिया में जो न्यूक्लियर गतिविधियां हुईं वो किसी भी हालत में नॉर्थ कोरिया के परमाणु कार्यक्रम के सामने नहीं टिकती. लीबिया ने तो यूरेनियम तक नहीं बनाया था. 2007 की (गवर्नमेंट अकाउंटिबिलिटी रिपोर्ट) के मुताबिक लीबिया में 200 ऐसे वैज्ञानिक थे, जिनके पास जनसंहारक हथियार बनाने का कौशल था.

वहीं कोरिया के परमाणु कार्यक्रम में हजारों लोगों के पास ये कौशल है. मतलब साफ है कि लीबिया का परमाणु कार्यक्रम सीमित और कम खतरनाक था. नॉर्थ कोरिया के परमाणु कार्यक्रम की दुनिया झलक अब तलक दुनिया ने देखी है, वो उससे कहीं ज्यादा खतरनाक और छुपा हुआ हो सकता है, जिसका फिलहाल सिर्फ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है.

ऐसे में लीबिया मॉडल का जिक्र करना बिना मर्ज का पता लगाए ही दवा देना जैसा लगता है क्योंकि ट्रंप प्रशासन के पास नॉर्थ कोरिया को लेकर वाकई कोई मॉडल है नहीं. ना लीबिया मॉडल, ना ही ईरान मॉडल. ऐसे में बदले हुए हालातों के बीच भी लीबिया शब्द से नॉर्थ कोरिया का डरना लाजमी है. लेकिन बातचीत से वो पीछे हटेगा नहीं, ऐसा वो हाल-फिलहाल में दिखा चुका है.

नॉर्थ कोरिया एक बेहद सधी रणनीति दुनिया के सामने रख रहा है. इसीलिए पिछले छह महीनों में जो फैसले किम जोंग ने लिए हैं उनकी उससे उम्मीद नहीं की जा रही थी. चाहे वो लंबी दूरी की मिसाइलों के टेस्ट पर रोक हो या फिर न्यूक्लियर साइट pyunggye..ri को नष्ट करना. ये जानते हुए भी कि अमेरिका लीबिया-लीबिया उसे डराने को ही करता है, बावजूद इसके वो इस मॉडल की असहजता से वाकिफ है और उम्मीद करता है कि अगर अमेरिका आगे बात बढ़ाना चाहता है तो कम से कम उसे बातचीत की टेबल पर लीबिया-लीबिया का राग तो बंद करना ही पड़ेगा. वैसे भी ट्रंप बतौर राजनेता और बतौर बिजनेसमैन ये बात जानते होंगे कि डिप्लोमेसी हो या बिजनेस ,एक ही कार्ड बार बार नहीं चलता, इसलिए लीबिया कार्ड टेबल पर सामने रखने से परहेज़ करना होगा.

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