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आखिर अमेरिका को ‘ग्रेट अगेन’ बनाने की बात कर रहे डोनाल्ड ट्रंप क्या चाहते हैं?

क्या ट्रंप खुद को राष्ट्रपति बनाए जाने के अमेरिकी वोटरों के फैसले को सही साबित करने के लिये हर उस बड़े फैसले की रिस्क ले रहे हैं जिसके बारे में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति सोचने से भी कतराते थे

Updated On: Jun 14, 2018 03:47 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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आखिर अमेरिका को ‘ग्रेट अगेन’ बनाने की बात कर रहे डोनाल्ड ट्रंप क्या चाहते हैं?

सिंगापुर में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग के बीच हुई ऐतिहासिक परमाणु शिखर वार्ता के बाद अब इस वार्ता के फैसलों और परिणामों के पोस्टमार्टम का वक्त है. एक तरफ उत्तरी कोरिया का मीडिया किम जोंग की तारीफों के पुल बांधने में जुटा है. उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी मीडिया से खफा हैं. वो अमेरिकी मीडिया के कुछ बड़े संस्थानों को ‘फेक न्यूज़’ कह कर भड़ास निकाल रहे हैं. इसकी वजह ये है कि ट्रंप को लगता है कि उनके ऐतिहासिक कदम की अमेरिकी मीडिया में वो सराहना नहीं हुई जिसके वो हकदार थे.

लेकिन इससे पहले उन्होंने पूर्ववर्ती राष्ट्रपति बराक ओबामा पर निशाना साधा और कहा कि उनके राष्ट्रपति बनने से पहले लोग ये सोच रहे थे कि वो अमेरिका को उत्तर कोरिया के साथ युद्ध में झोंकने जा रहे हैं. उन्होंने बराक ओबामा का नाम लेते हुए कहा कि बराक ने उत्तर कोरिया को अमेरिका के  लिये सबसे खतरनाक समस्या बताया था. लेकिन अब वो बराक पर चुटकी लेते हुए कह रहे हैं कि अब ऐसा नहीं है और रात में अच्छी नींद लीजिये.

अमेरिका वापस आने के बाद से ट्रंप बार-बार ये दोहरा रहे हैं कि अब उत्तर कोरिया से कोई परमाणु खतरा नहीं है जैसा कि पहले समझा जाता था. उनका इशारा और निशाना अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपतियों पर है जो उत्तर कोरिया को ‘शैतान की धुरी’ बताया करते थे. जाहिर तौर पर ट्रंप अब उत्तर कोरिया के मसले को अपने मुताबिक सुलझा कर खुद को अमेरिका के इतिहास पुरूष की तरह स्थापित करना चाहते हैं. लेकिन उन्हें मीडिया में वो सुर्खियां नहीं मिल रहीं जबकि पॉर्न स्टार से संबंधों को लेकर ट्रंप हर अखबार में लगातार छाए रहे.

उत्तर कोरिया के साथ अहम समझौते के बाद ट्रंप अतिआत्मविश्वास से लबरेज हैं. वो गारंटी ले रहे हैं कि उत्तर कोरिया के साथ अब सबकुछ सामान्य हो चुका है. साथ ही वो ये भी जता रहे हैं कि पुराने राष्ट्रपतियों ने उत्तर कोरिया को बेवजह ही हौव्वा भी बना रखा था. कल तक उत्तर कोरिया को परमाणु हमले से नेस्तनाबूत करने की धमकी देने वाले ट्रंप अब उत्तर कोरिया की काबिलियत के कायल हो चुके हैं. किम जोंग को ‘पागल’ और ‘लिटिल रॉकेट मैन’ कहने वाले ट्रंप को अब ‘प्रतिभाशाली’ किम से ‘विशेष लगाव’ हो चुका है और वो किम को व्हाइट हाउस आने का न्योता भी देंगे.

ट्रंप को मीडिया पर बिल्कुल भरोसा नहीं

लेकिन इतना सबकुछ होने और करने के बावजूद ट्रंप को लेकर अमेरिकी मीडिया में सवालों की सुगबुगाहट बनी हुई है जिस पर ट्रंप अब ये कह रहे हैं कि अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन उत्तर कोरिया नहीं बल्कि ‘फेक न्यूज़’ हैं. उन्होंने अमेरिकी न्यूज चैनल एनबीसी और सीएनएन पर उत्तर कोरिया से हुई डील को लेकर ‘फेक न्यूज’ चलाने का आरोप लगाया.

ट्रंप ने ट्वीट किया, 'फेक न्यूज देखना मजेदार है, खासतौर से एनबीसी और सीएनएन पर. ये उत्तर कोरिया के साथ हुई डील को कम कर दिखाने की होड़ में जुटे हुए हैं. 500 दिन पहले वे इस डील के लिए 'भीख' मांगते दिख रहे थे- जैसे कि युद्ध होने वाला हो. हमारे देश का सबसे बड़ा दुश्मन फेक न्यूज है जो मूर्खों द्वारा आसानी से प्रचारित हो जाता है.'

ट्रंप इससे पहले भी पत्रकारों पर भड़क चुके हैं और अपनी कॉन्फ्रेंस से पत्रकारों को बाहर निकालने के लिये जाने जाते हैं. उन्हें लग रहा है कि सिंगापुर की ऐतिहासिक वार्ता के बावजूद मीडिया की वजह से आम अमेरिकी जनमानस में संशय पल रहा है.

वोटरों के फैसले को साबित करने के लिए बड़े फैसले ले रहे हैं ट्रंप

संशय तो ट्रंप के व्यवहार और विरोधाभासी विदेश नीति की वजह से भी बढ़ रहा है. ट्रंप ने आनन-फानन में ही दक्षिण कोरिया के साथ कई सालों से चल रहे सैन्य अभ्यास को बंद करने का ऐलान भी कर दिया है. ट्रंप के इस फैसले से खुद पेंटागन और दक्षिण कोरिया भी हैरान हैं. सवाल उठ रहा है कि उत्तर कोरिया को रियायत देने में डोनाल्ड ट्रंप आखिर इतनी जल्दबाजी क्यों दिखा रहे हैं? जबकि दक्षिण कोरिया और जापान इस संयुक्त सैन्य अभ्यास को पूर्वी एशियाई देशों के लिये जरूरी मानते हैं.

बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या ट्रंप खुद को राष्ट्रपति बनाए जाने के अमेरिकी वोटरों के फैसले को सही साबित करने के लिये हर उस बड़े फैसले की रिस्क ले रहे हैं जिसके बारे में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति सोचने से भी कतराते थे. या उनके जेहन में ये सवाल है कि वो अपने फैसलों से कहीं से भी पूर्व राष्ट्रपतियों से कमतर नहीं लगें. चुनाव जीतना और पद पर बड़े फैसले लेना अलग बात होती है. ट्रंप अभी तक राष्ट्रपति पद की विश्वसनीयता के पैमाने पर खुद को स्थापित नहीं कर सके हैं. उनके फैसलों में कहीं जल्दबाजी तो कहीं गुरूर तो कहीं अतिआत्मविश्वास तो कहीं असमंजस दिखाई देता है. पेरिस क्लाईमेट डील, ईरान न्यूक्लियर डील और यूरोपियन यूनियन के साथ आयात शुल्क का विवाद इसकी गवाही देता है.

ट्रंप के शासनकाल में रूस के साथ नजदीकियों ने अमेरिकियों को स्तब्ध करने का काम किया है. हालांकि बाल्टिक देशों के प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक में उन्होंने ये दावा किया कि रूस के खिलाफ उन्होंने ही अबतक का सबसे सख्त रुख अपनाया. उन्होंने ब्रिटेन में रूसी जासूस पर हुए रासायनिक हमले के विरोध में 60 राजनायिकों के निष्कासन का भी हवाला दिया. इसके बावजूद कहीं न कहीं वो रूस के साथ संबंधों पर जोर देते ही दिखे हैं. इसकी ताजा मिसाल जी-7 देशों का सम्मेलन था जहां उन्होंने रूस को शामिल करने की मांग की. जबकि अमेरिका की आंतरिक राजनीति में रूस के दखल को लेकर तूफान अभी थमा नहीं है. अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रूस पर साइबर हैकिंग का आरोप लगा है. जांच चल रही है. खुद राष्ट्रपति ट्रंप से भी एफबीआई पूछताछ कर सकती है.

दोस्तों से दुश्मनी और दुश्मनों को दोस्त बना रहे हैं ट्रंप

वहीं दूसरी तरफ ट्रंप अमेरिका के ऐतिहासिक करीबियों से रूठने और उन्हें नाराज़ करने का काम कर रहे हैं. कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो को बेईमान बता कर उन्होंने जी-7 के संयुक्त बयान से किनारा कर यूरोपीय देशों को हक्का-बक्का कर दिया. ट्रंप का व्यवहार और विदेश नीति कई विरोधाभासों से भरी हुई दिखाई देती है. एक तरफ उन्होंने स्टील और अल्युमीनियम पर आयात शुल्क लगाकर सबसे करीबी सहयोगियों देशों को नाराज करने का काम किया तो दूसरी तरफ उन्होंने ये भी कहा कि सहयोगी देशों की सुरक्षा के लिये अमेरिका नाटो सेना का पूरा खर्चा कब तक उठाता रहेगा.

इससे पहले भी वो नाटो देशों पर बजट को लेकर भड़क चुके हैं और सहयोगी देशों के सही योगदान न देने पर कड़ी कार्रवाई की बात कर चुके हैं. वो नाटो सेना के संगठन को ‘पुराना पड़ चुका संगठन’ तक करार दे चुके हैं. उनको लगता है कि सहयोगी देशों की सुरक्षा के लिये अमेरिका आखिर कब तक खर्च भुगतता रहेगा. इससे झलकता है कि कहीं न कहीं अमेरिका आने वाले समय में खुद को नाटो से अलग भी कर सकता है, जिसका इशारा ट्रंप की चुनाव प्रचार की रैलियों में भी दिखा था.

लेकिन फिलहाल ट्रंप की वजह से अमेरिका और यूरोपीय देशों के सात दशक पुराने रिश्तों में दरार तो पड़ ही गई है. अमेरिका को गुल्लक बताकर दुनिया के कई देशों को ‘लुटेरा’ बताने वाले ट्रंप के सत्ता में आने के बाद दुनिया की कई बड़ी घटनाएं अमेरिका को अलग-थलग करने का काम कर रही है. पेरिस में हुई जलवायु संधि से अमेरिका का बाहर निकलना तो ईरान के साथ डील को लेकर भी यूरोपीय देशों की नाराजगी सामने आई. अब चीन और यूरोप के साथ आयात शुल्क विवाद ट्रंप की देन है और ट्रंप अपने फैसले से टस से मस नहीं हैं.

चीन के साथ दक्षिण चीन सागर जैसे कई मुद्दे हैं जिनको लेकर अमेरिका की तनातनी है. लेकिन ताइवान के साथ ट्रंप के रुख ने चीन-अमेरिकी रिश्तों में तनाव बढ़ाने का ही काम किया. जबकि खुद अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर न ने साल 1979 में चीन के साथ ‘वन चाइना पॉलिसी’ की शुरुआत करते हए ताइवान के साथ औपचारिक राजनायिक रिश्ते खत्म किए थे. लेकिन ट्रंप ने ये कह कर चीन को चौंका दिया कि अगर अमेरिका को वन चाइना पॉलिसी से कोई फायदा नहीं हो तो फिर उससे बंधकर रहने की जरूरत भी नहीं है. अब चीन के साथ आयात शुल्क के मामले में एक तरह से ट्रेड वॉर की शुरुआत हो चुकी है. ट्रंप प्रशानस ने चीन पर 60 अरब डॉलर का ट्रेड टैरिफ लगा दिया है.

जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल ने जी-7 देशों के सम्मेलन में ट्रंप के ट्वीट पर कहा कि संयुक्त बयान से अमेरिका का हटना किसी गंभीर बात की तरफ इशारा करता है. बड़ा सवाल ये है कि आखिर वो कौन सी गंभीर बात है जिसे खुद अमेरिका भी समझ नहीं पा रहा है. ट्रंप के शासन के ये दो साल हॉलीवुड की किसी थ्रिल और सस्पेंस से भरपूर फिल्म की तरह फिलहाल नजर आ रहे हैं.

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