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सीआईए ने ऑनलाइन जारी किया खुफिया दस्तावेज, खुलेंगे कई राज

अंदरुनी तौर पर हो सकता है जांच चल रही हो लेकिन नये दस्तावेजों से निकली जानकारियों पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं हुई

Updated On: Feb 02, 2017 07:43 PM IST

Jaideep A Prabhu

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सीआईए ने ऑनलाइन जारी किया खुफिया दस्तावेज, खुलेंगे कई राज

इस महीने की शुरुआत में सीआईए ने अपने लाखों डिक्लासिफाइड दस्तावेजों को ऑनलाइन कर दिया. हालांकि, इनमें से कोई भी फाइल नई नहीं है. सीआईए रिकार्ड सर्च टूल (क्रेस्ट) एक दशक से मौजूद है, लेकिन दस्तावेजों के ऑनलाइन होने से शोधकर्ताओं और आम जनता को कॉलेज पार्क तक पैर घसीटने की जरुरत नहीं रही, वे अब घर बैठे-बैठे इन दस्तावेजों को देख-पढ़ सकते हैं.

जाहिर है...इन दस्तावेजों में दर्ज कुछ सूचनाओं को जानकर बाहरी मुल्क के लोगों को धक्का पहुंचेगा. मिसाल के लिए, बहुत से भारतीयों को यह जानकर धक्का लगा कि शीतयुद्ध के दौरान उनके बहुत से नेता अमेरिकी खुफिया एजेंसी को सूचना पहुंचाया करते थे.

दरअसल, यह कोई नई बात नहीं है. क्रेस्ट के दस्तावेजों से उन्हीं बातों की पुष्टि हुई है जो दूसरे ठिकानों से बरसों से कही जाती रही हैं. जिन विद्वानों ने अमेरिका, जर्मनी, कनाडा और बाकी जगहों के अभिलेखागार (आर्किव्स) खंगाले हैं, वे बड़ी आसानी से बता सकते हैं कि कैसे किसी ज्ञापन को पढ़ते हुए उनकी नजर एक खास जानकारी पर गई.

वे उन बैठकों का हवाला देते हैं जहां उन्हें ऐसी काम की सूचनाएं हासिल हुई या फिर वे बात-बात पर भेद उगलने वाले भारतीय अधिकारियों से हुई बैठकों के ब्यौरेवार उदाहरण सुना सकते हैं.

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जो भी लोग कॉलेज पार्क, लिस्टरफेल्ड या वेलिंग्टन स्ट्रीट के चक्कर लगाने में असमर्थ हैं उनके लिए इंटरनेट पर पहले से ही बहुत सी चीजें मौजूद हैं. मिसाल के लिए अमेरिका के विदेश-संबंध शीर्षक से मौजूद ऋृंखला या फिर कनाडा के विदेश- संबंध के दस्तावेज. ये सब बरसों से इंटरनेट पर मौजूद हैं.

खुफिया जानकारी

भारत से जुटाई जाने वाली खुफिया जानकारी के बारे में पूरे लगन से खोजबीन करके कोई किताब लिखने का काम अभी नहीं हुआ है. विद्वान अभी तक इस काम से दूर-दूर ही रहते आये हैं. लेकिन कई किताबों में अफवाहों और दस्तावेजों के हवाले से यह जिक्र आया है कि भारतीय अधिकारियों ने किसी विदेशी व्यक्ति या संस्था को सूचना पहुंचायी है.

मिसाल के लिए क्रिस्टोफर एंड्रयू की किताब 'द वर्ल्ड वाज गोइंग अावर वे : दि केजीबी एंड दि बैट्ल फॉर द थर्ड वर्ल्ड' में एक जगह जिक्र आया है कि कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेताओं के मार्फत सोवियत खुफिया एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश करती थी कि भारत सरकार के भीतरखाने क्या चल रहा है.

केजीबी अपने प्रोपेगंडा के जरिए इस कोशिश में भी रहती थी कि भारतीय मीडिया, मॉस्को के साथ भारत की दोस्ती पर जोर दे और जरुरत के अहम इदारों में पश्चिमी मुल्कों से हासिल मदद को कमतर बताये जबकि कई मायनों में पश्चिमी मुल्कों से हासिल यह मदद मास्को की तुलना में ज्यादा थी.

(प्रतीकात्मक तस्वीर)

(प्रतीकात्मक तस्वीर)

ठीक इसी तरह मलय कृष्ण धर की किताब 'ओपेन सीक्रेट्स: इंडियाज् इंटेलिजेंस अनवेल्ड' में जिक्र आता है कि भारतीय खुफिया एजेंसी ने केजीबी की तनख्वाह पर काम करने वाले चार केंद्रीय मंत्रियों और एक दर्जन से ज्यादा सांसदों की पहचान की थी.

जैसे छलनी में पानी नहीं ठहरता वैसे ही दिल्ली-दरबार से सूचनाएं निकलती हैं, इसमें कोई शक नहीं है. इंदिरा गांधी बार-बार ‘विदेशी हाथ’ की बात कहती थीं.

कई लोग इसे इंदिरा गांधी का खब्त मानकर नाक-भौं सिकोड़ा करते थे, लेकिन ऐसा जान पड़ता है कि पूर्व प्रधानमंत्री का डर पूरी तरह से जायज था. ये अलग बात है कि उन्होंने अपने डर का इजहार थोड़ा मूर्खतापूर्ण तरीके से किया था.

सूचनाओं की भरमार

इस पूरे मामले की मजेदार विडंबना यह है कि विदेशी सरकारों को पता ही नहीं चल पाया कि भारत के भीतरखाने चल क्या रहा है और इसकी वजह सूचनाओं की कमी न होकर सूचनाओं की भरमार थी, जिससे ये पता लगाना मुश्किल हो गया कि असल सूचना क्या है.

1973 में अमेरिका और कनाडा के अधिकारी इस अफवाह को लेकर चर्चा कर रहे थे कि भारत एटमी परीक्षण करने वाला है. अमेरिकी अधिकारियों ने कनाडा के अधिकारियों से कहा कि हमलोग यह गप्प इतनी बार सुन चुके हैं कि अब इस खबर को तवज्जो के काबिल नहीं माना जा सकता.

यही बात सोवियत संघ और पूर्वी जर्मनी के बारे में भी कहा जा सकता है. सीपीआई के अपने दोस्तों के बदौलत भारत के बारे में इन दोनों मुल्कों के पास इतनी ज्यादा जानकारी थी कि उन्हें ट्रेन के आने-जाने के समय और फसल की कटाई के वक्त के बारे में भी पता होता था.

हालांकि, इनमें से कोई भी बात नई नहीं होने के बावजूद दो बातों पर ध्यान देने की जरुरत है. पहला यह कि जरूरी नहीं कि सूचना देने वाले हर इंसान को ये पता हो कि वो विदेशी खुफिया एजेंसी के लिए काम कर रहे हैं.

जासूस इतने भी असभ्य नहीं होते कि किसी को अपना बिजनेस-कार्ड दिखायें और कहें कि आप अपने देश को धोखा दीजिए. उनका सूचना निकालने का तरीका बड़ा मामूली हो सकता है. वो आपको एक छोटी सी बैठकी में भाषण देने का न्यौता दे सकते हैं या फिर किसी खास विषय पर एक अनजान सी पत्रिका में लेख लिखने का आग्रह कर सकते हैं.

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ऐसे हालातों में अक्सर ऐसा हो सकता है कि कोई अधिकारी अपनी जानकारी, पहुंच या अहमियत को लेकर डींग हांकने की लालच में आ जाता है. खुफिया एजेंट, यहां तक कि डिप्लोमेट (राजनयिक) भी अधिकारी की इस कमजोरी का फायदा उठा सकते हैं.  मिसाल के लिए 1970 के दशक में भारतीय खुफिया एजेंटों को खबर मिली कि पाकिस्तान भारत में होने जा रहे एटमी परीक्षण को लेकर चिन्ता में है.

बड़बोले राजनयिक

पता चला कि पाकिस्तान को यह जानकारी संयुक्त राष्ट्र संघ में निशस्त्रीकरण के मुद्दे पर हुए एक आयोजन में शिरकत करने आये बड़बोले भारतीय डिप्लोमैट्स से मिली. ठीक यही बात के आर नारायणन की 1964 की एक नोट के साथ हुई.

केआर नारायणन उस वक्त विदेश मंत्रालय के चीन प्रभाग में डायरेक्टर थे, उन्होंने सरकार को एक गोपनीय चिट्ठी लिखी जिसमें चीन के एटमी परीक्षण के जवाब में भारत सरकार को भी एटमी हथियार बनाने का सुझाव दिया. यह नोट उनके अपने डिप्टी ने अमेरिका को लीक कर दिया था.

(प्रतीकात्मक तस्वीर)

(प्रतीकात्मक तस्वीर)

काम के एवज में किया जाने वाला भुगतान भी कई रुपों में हो सकता है, विदेश घूमने के मौके, निजी उपहार, यूनिवर्सिटी और थिंकटैंक में फेलोशिप, कॉलेज में दाखिला या पार्टी फंड में चंदे की शक्ल में भी हो सकता है.

दूसरी बात यह कि भारत सरकार ने इन सूचनाओं को लेकर कोई कदम नहीं उठाए. विदेशी ठिकाने से शुरुआती तौर पर सबसे ठोस सबूत शायद पहली बार मित्रोखिन अभिलेखागार (आर्काइव) से निकले. लेकिन ऐसे आरोपों को अखबारों ने पश्चिमी दुष्प्रचार (प्रोपेगंडा) कहकर खारिज कर दिया.

लेकिन विदेशी अभिलेखागार से और सबूत निकलकर सामने आने के बाद ये जरूरी हो जाता है कि विदेशी खुफिया एजेंसियों को सूचना पहुंचाने के इस चलन की पूरी छानबीन होनी चाहिए.

संभव है, इस काम को अंजाम देने वाले लोग बहुत से लोग अब जीवित ना हों लेकिन यह भी हो सकता है कि ऐसे कुछ लोग अब भी जीवित हों और सरकार या संसद में ऊंचे ओहदे पर काम कर हों, इस मामले में सरकार की तरफ से की जा रही लापरवाही गंभीर चिंता का विषय है.

क्रेस्ट के डेटाबेस के ऑनलाइन होने से इन आरोपों को नया जीवन मिला है. सोशल मीडिया के कुछ संस्थाओं को छोड़कर बाकी हलकों में इन जानकारियों को लेकर उदासीन रवैया अपनाया गया है. इससे ये संकेत मिलता है कि भारत सरकार सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं है.

अंदरुनी तौर पर हो सकता है जांच चल रही हो लेकिन नये दस्तावेजों से निकली जानकारियों पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं हुई न ही लोगों की तरफ से कोई दबाव पड़ा. बात चाहे विदेश नीति की हो या फिर सुरक्षा की, या साइबर संस्थाओं की- ऐसा ढुलमुल रवैया देश के लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं है.

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