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संक्रमण के दौर से गुजरते चीन के भारत के लिए क्या मायने हैं?

शी जिनपिंग ने इस तरह के जोखिम में चीन को डाल दिया है और किस तरह से चीन इस हालात से बाहर निकलेगा

SL Narasimhan Updated On: Jun 07, 2017 11:34 PM IST

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संक्रमण के दौर से गुजरते चीन के भारत के लिए क्या मायने हैं?

2013 में जब से चीन में पांचवीं पीढ़ी की लीडरशिप ने सत्ता संभाली है, तब से वहां कई नाटकीय घटनाक्रम हुए हैं. जैसा हम जानते हैं कि हर देश तीन स्तंभों पर टिका होता है. ये हैं एग्जिक्यूटिव, मिलिटरी और इकनॉमी. चीन में ये तीनों स्तंभ इस वक्त एक उथल-पुथल वाले दौर से गुजर रहे हैं. शी जिनपिंग के सत्ता में आने से ठीक पहले उनके संभावित प्रतिस्पर्धी बो शिलाई को निकाल दिया गया.

पोलितब्यूरो में बदलाव

जब मौजूदा लीडरशिप ने कमान संभाली तो पोलितब्यूरो स्टैंडिंग कमेटी को नौ से घटाकर सात कर दिया गया. इन सात में से पांच की तो उम्र इतनी है कि वे महज एक टर्म ही टिक सकते हैं, जबकि परंपरा दो टर्म की है. इन घटनाओं से संकेत मिलता है कि चीन की पांचवीं पीढ़ी का नेतृत्व किस दिशा में आगे बढ़ रहा है.

भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी मुहिम

तीन स्तंभों में से एग्जिक्यूटिव देश को चलाती है और नागरिकों के लिए जिम्मेदार होती है. शी जिनपिंग के तहत भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम ने जबरदस्त रफ्तार पकड़ी है. इससे नागरिक प्रशासन और सैन्य बलों में काफी बेचैनी पैदा हो गई. भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की वजह से नौकरशाही में निष्क्रियता आई है क्योंकि उन्हें डर है कि उनके फैसलों पर बाद में उन्हें कानूनी मुकदमों का सामना करना पड़ सकता है.

करीबियों को बड़े पद

बताया जाता है कि शी अपने भरोसेमंद लोगों को आगे बढ़ा रहे हैं. इस साल मई में काई की को प्रमोट करके बीजिंग का पार्टी चीफ बनाया जाना इसकी मिसाल है. काई की को पिछले साढ़े तीन साल में ताबड़तोड़ तरीके से पांच प्रमोशन मिले हैं. इन एक के बाद एक प्रमोशनों की वजह उनका शी के साथ पुराना रिश्ता होना है. शी जब झेजियांग प्रांत के पार्टी सेक्रेटरी थे तब से उनसे जुड़े हुए हैं.

पार्टी में सब इधर-उधर किए गए

19वीं पार्टी कांग्रेस इस साल अक्टूबर में बीजिंग में होने वाली है. इस मीटिंग में यह फैसला होगा कि अगले पांच साल तक देश की कमान किसके हाथ रहेगी. 27 मई 2017 को द इकनॉमिस्ट में छपे एक आर्टिकल के मुताबिक, ‘2016 की शुरुआत से चीन के प्रेसिडेंट शी जिनपिंग ने कम्युनिस्ट पार्टी के 31 प्रांतीय सचिवों में से 20 को बदल दिया है.

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वह 27 प्रांतीय गवर्नरों को भी इधर-उधर कर चुके हैं. गवर्नर सेकेंड-इन-कमांड होते हैं. स्थानीय नेताओं के लिए अप्रैल सबसे ज्यादा खराब महीना रहाः 10 लोगों की बदली की गई.’ इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि अक्टूबर 2017 में पार्टी कांग्रेस से पहले शी के करीबी लोगों को सही पॉजिशन पर बैठाया जा रहा है.

पड़ोसियों के साथ रिश्ते खराब

दूसरा चीन के जापान, साउथ कोरिया, ताइवान और दूसरे पड़ोसी देशों के साथ संबंध अच्छे नहीं हैं. साउथ चीन सी में चीन के दावों को लेकर भी दुनिया के कई मुल्क नाराज हैं.

अरुणाचल प्रदेश के जिलों का मनमानी से नामकरण

चीन की सिविल अफेयर्स मिनिस्ट्री ने अरुणाचल प्रदेश के छह जिलों के नाम चाइनीज कैरेक्टर्स और तिब्बती नामों के आधार पर 18 अप्रैल 2017 को रख दिया. चाइनीज जगहों का नामकरण दो तरीकों से करते हैं.

एक नाम के फॉनेटिक्स के हिसाब से होता है और दूसरा जगह के नाम के अर्थ के मुताबिक होता है. मिसाल के तौर पर, शिगात्से को रिकाजे (日喀则) नाम दिया गया है. बीजिंग को उत्तरी राजधानी के तौर पर जाना जाता है (北京). चाइनीज सरकार ने चाइनीज कैरेक्टर्स और नाम दिए हैं वे हैं, 乌 间 岭, वोग्याइनलिंग, 米 拉 日, मिला री, 曲 登 嘎 布日 कोईडेंगारबो री, 梅 楚卡, मेनकुका, 白 明 拉 山 口, बुमो ला, 纳 姆 卡 姆, नामकापब री.

चीन के भारत के अन्य शहरों के भी अलग नाम हैं. जगहों के नाम अपने हिसाब से तय करने का मुद्दा ज्यादा अहम नहीं है क्योंकि दलाई लामा के अरुणाचल प्रदेश का दौरा करने के चलते चीन ने यह कदम उठाया है.

साउथ चीन सी का मसला

तीसरा मसला ईस्ट और साउथ चीन सी का है. दोनों मसलों पर शी प्रशासन का एक सख्त रवैया रहा है. चीन ने 23 नवंबर 2013 को ईस्ट चीन सी में एयर आइडेंटिफिकेशन जोन का ऐलान कर दिया. हालांकि, इससे ईस्ट चीन सी और सेनकाकू द्वीपों में तनाव पैदा हो गया. चीन का 26 जुलाई 2016 को पर्मानेंट कोर्ट ऑफ ऑर्बिट्रेशन के फैसले को मानने से इनकार करना और बाद में भी इस मसले पर लगातार चीन का व्यवहार नेविगेशन की स्वतंत्रता की चिंता को लेकर दुनिया को एकजुट करने वाला साबित हुआ है.

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दुनिया के जहाजों को निकलने से रोकने का प्रस्ताव

जहाजों के निकलने को लेकर एक कानून बनाने की कोशिश कर चीन ने इस मसले को भड़का दिया. 18 फरवरी 2017 को जापान टाइम्स ने खबर दी कि चीन 1984 के मैरीटाइम ट्रैफिक सेफ्टी लॉ में संशोधन पर आम लोगों की सलाह ले रहा है.

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नया ड्राफ्ट मैरीटाइम अधिकारियों को यह ताकत देगा कि वे ऐसे मौकों पर विदेशी जहाजों को चाइनीज इलाके से गुजरने से रोक सकते हैं, अगर उन्हें लगे कि ये सेफ्टी और व्यवस्था के लिए एक जोखिम हो सकते हैं. इससे चीन को खास इलाकों को तय करने और विदेशी जहाजों को इन इलाकों से गुजरने से अस्थाई तौर पर रोकने की इजाजत देगा. चीन ने साउथ चीन सी में मिसाइलें और अन्य डिफेंस इक्विपमेंट्स भी तैनात कर दिए हैं.

सैन्य बलों में आमूलचूल बदलाव

हालांकि, लीगेसी के तौर पर शी जिनपिंग ने चीन के आर्म्ड फोर्सेज में बड़े रिफॉर्म के आदेश दिए हैं, लेकिन जिस पैमाने पर यह काम किया जा रहा है वह अभूतपूर्व है. हायर डिफेंस ऑर्गनाइजेशन में चार डिपार्टमेंट्स (जनरल स्टाफ डिपार्टमेंट, जनरल पॉलिटिकल डिपार्टमेंट, जनरल आर्मामेंट डिपार्टमेंट और जनरल लॉजिस्टिक्स डिपार्टमेंट) हैं जिनके जरिए चीन का सेंट्रल मिलिटरी कमीशन (सीएमसी) आर्म्ड फोर्सेज का कमांड और कंट्रोल करता है. इसे अब छह दफ्तरों, छह विभागों और तीन कमीशनों में तब्दील कर दिया गया है. ये सीधे सीएमसी के तहत काम करेंगे.

मिसाइल डिवीजन को फुल सर्विस का दर्जा

सात मिलिटरी रीजन्स जिनमें पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को ऑर्गनाइज्ड किया गया था, उसे अब पांच संयुक्त थिएटर कमांड्स में बदल दिया गया है. ग्राउंड फोर्सेज के लिए एक हेडक्वार्टर्स बनाया गया है जो कि अब तक मौजूद नहीं था. सभी पारंपरिक और न्यूक्लियर मिसाइलें रखने वाली सेकंड आर्टिलरी कॉर्प्स को अपग्रेड कर आर्मी, नेवी और एयर फोर्स की तरह से एक फुल-फ्लेज्ड सर्विस बना दिया गया है.

एक नई फोर्स पीएलए स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फोर्स को तैयार किया गया है. इस फोर्स को स्पेस और साइबर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और साइकोलॉजिकल ऑपरेशंस जैसे इंफॉर्मेशन वारफेयर की जिम्मेदारी दी गई है.

एक जॉइंट लॉजिस्टिक्स सपोर्ट फोर्स को खड़ा किया गया है. यह फोर्स सभी सर्विसेज को लॉजिस्टिक सपोर्ट देगी. पीएलए से 3 लाख लोगों की कटौती का ऐलान सितंबर 2015 में शी जिनपिंग ने किया था. इस तरह के बड़े कदमों के साथ यह साफ दिखाई दे रहा है कि चीन की आर्म्ड फोर्सेज में आमूलचूल बदलाव हो रहा है.

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इकनॉमिक मोर्चे पर खस्ता हुई हालत

2008 की मंदी से चाइनीज इकनॉमी पर तगड़ा असर पड़ा है. तब तक चीन की इकनॉमिक ग्रोथ एक्सपोर्ट मॉडल पर बेस्ड थी. फॉरेन इनवेस्टर्स ने चीन से अपनी पूंजी बाहर निकालना शुरू कर दिया था. जिस क्राइसिस से शंघाई स्टॉक एक्सचेंज 2015 में फंस गया उससे चीन के फॉरेक्स रिजर्व से 3.9 लाख करोड़ डॉलर बाहर निकल गए. अब यह करीब 3 लाख करोड़ डॉलर है. इस तरह से करीब 1 लाख करोड़ डॉलर का फॉरेक्स रिजर्व घट गया है.

मंदी से निकलने के लिए ओबीओआर मुहिम

मंदी के चलते चीन में एक और दिक्कत पैदा हुई है. यह एक्सेस कैपेसिटी की दिक्कत है. चीन की वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) मुहिम की एक वजह यह है कि चीन के पास सीमेंट, स्टील, ग्लास जैसी चीजों की एक्सेस कैपेसिटी है. आज चीन की पूरी आर्थिक गतिविधि और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स इसी मुहिम के इर्दगिर्द घूम रहे हैं. इस प्रोजेक्ट के पूरे होने को लेकर कई तरह की मुश्किलें हैं. इंडिया इस समिट में शरीक नहीं हुआ.

4 जून 2017 को सात अरब देशों ने कतर के साथ अपने रिश्ते तोड़ लिए. इससे चीन के ओबीओआर प्रोजेक्ट को इस रीजन में झटका लग सकता है. चीन-यूरोपियन यूनियन समिट 2 जून 2017 को हुई, इससे ईयू की चिंताओं का पता चलता है.

यूरोप के देश ओबीओआर पर साथ नहीं

साउथ चीन मॉर्निंग पोस्ट में 5 जून 2017 को अपने लेख में कैथरीन वॉन्ग एक यूरोपीय डिप्लोमैट का जिक्र करते हुए कहती हैं कि, ‘यह मुहिम ग्लोबलाइजेशन को बढ़ावा देने की है, जो कि अच्छी चीज है. लेकिन, इसके साथ चाइनीज गुणधर्म भी आ रहे हैं. ऐसे में यह निश्चित तौर पर मार्केट ओरिएंटेड, लिबरल, रूल्स आधारित ग्लोबलाइजेशन नहीं है, जैसा कि हम चाहते हैं.’

यह चीज नोट करने वाली है कि कई यूरोपीय देशों के रेप्रेजेंटेटिव्स ने इस साल मई में ओबीओआर समिट में ट्रेड डिक्लेयरेशन पर दस्तखत नहीं किए. यह चीज अब केवल वक्त ही बता सकता है कि चीन जितनी ताकत से ओबीओआर पर पूंजी लगा रहा है क्या उसका फल उसे मिल पाएगा या नहीं?

शी के जोखिम का क्या नतीजा होगा?

ऐसे में चीन इस वक्त एक बड़े परिवर्तन से गुजर रहा है. इस बात का निर्णय अब पंच ही करेंगे कि क्यों शी जिनपिंग ने इस तरह के जोखिम में चीन को डाल दिया है और किस तरह से चीन इस हालात से बाहर निकलेगा.

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