S M L

अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने होंगी कई चुनौतियां

इस चुनाव ने अमेरिकी राजनीति और चुनाव प्रचार में नाटकीय बदलाव ला दिया है.

Updated On: Nov 21, 2016 08:05 AM IST

FP Staff

0
अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने होंगी कई चुनौतियां

अमेरिकी का नया राष्ट्रपति कौन होगा, इसका नतीजा थोड़ी ही देर में सबके सामने होगा. जीतने वाले के लिए यह खुशी का मौका तो होगा लेकिन उसकी चुनौतियां खत्म नहीं होंगी. बल्कि राष्ट्रपति की असली मुश्किलें शुरु होंगी. अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने क्या होंगी चुनौतियां इस पर ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के निदेशक संजय जोशी से बात की हमारी सीनियर एडिटर, यूएसए, निखिला नटराजन ने.

निखिला नटराजन - चुनावी दंगल में हुई अभूतपूर्व कटुता को भुलाना कई वर्षों तक सम्भव नहीं होगा. इसके मद्देनज़र, क्या होनी चाहिए भावी विजेता की प्राथमिकताएं?

संजय जोशी - इस चुनाव का परिणाम जो भी हो पर इतना तय है कि इस चुनाव ने अमेरिकी राजनीति और चुनाव प्रचार में नाटकीय बदलाव ला दिया है. चुनाव जो भी जीते, अगले राष्ट्रपति के कामकाज पर इसका असर साफ दिखेगा.

एक बेहद आक्रमक चुनाव अभियान, जिसमें दोनो पक्षों ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. जिसके चलते अब जनवरी 2017 में अगले अमेरिकी राष्ट्रपति को वास्तविक चुनौतियों के अलावा एक दृष्टिकोण सुधार अभियान भी छेड़ना पड़ सकता है. नए राष्ट्रपति के शुरूआती कामों में सबसे पहले प्रचार के दौरान उछाले गए बेकार और अप्रासंगिक मुद्दों से निजात पाकर आगे बढ़ना होगा. ऐसे कटु चुनाव अभियान के बाद अब दुनिया अमेरिकी राष्ट्रपति से अमेरिका के स्पष्ट नेतृत्व वाले संदेश की अभिव्यक्ति की अपेक्षा करेगी ताकि कई ज्वलंत वैश्विक मुद्दों पर अमेरिकी नीतियां स्पष्ट हो सकें और सहयोगियों के साथ भागीदारी को दोबारा उर्जावान किया जा सके.

sunjoy-joshi

नए राष्ट्रपति को दुनिया में अमेरिका की स्थिति और भूमिका को एक नए सिरे से परिभाषित करना होगा. अगर उसे घरेलू और वैश्विक स्तर पर मजबूत स्तंभ के रूप में बने रहना है तो उसे सबसे पहले दुनिया भर को भरोसा दिलाना होगा कि अमेरिका सिर्फ अपनी दादागीरी स्थापित करने के लिए सीमित मामलों में हस्तक्षेप करने की नीति नहीं अपनाएगा. उसे वैश्विक सुरक्षा में प्रमुख भूमिका निभानी होगी, वैश्विक व्यापार व्यवस्थाओं की शुचिता को बरकरार रखना होगा और 'ग्लोबल कॉमन्स' जैसे पर्यावरण, सागर क्षेत्र, बाहरी अंतरिक्ष, साइबर दुनिया के वैश्विक प्रबंधन के प्रति प्रतिबद्धता जाहिर करनी होगी.

निखिला नटराजन - मैं पूछना चाहूंगी उस विरासत (और गंभीर समस्याओं) के बारे में जो नए अमेरिकी नेता को ओबामा से विरासत में मिली हैं.

संजय जोशी - चुनाव अभियान से साफ हो गया है कि नए राष्ट्रपति के सामने सबसे कड़ी चुनौतियां घरेलू मोर्चें पर हैं. चुनाव परिणाम जो भी हों पर राजनीति में बाहरी माने जाने वाले डोनाल्ड ट्रंप और बर्नी सैंडर्स जैसी शख्सियतों के उदय के प्रमुख कारण वास्तविक वेतनमानों में ठहराव या गिरावट और आर्थिक विकास की धीमी गति है. इसके चलते अगले राष्ट्रपति का ध्यान घरेलू मुद्दों पर ज्यादा होना स्वाभाविक होगा. दुर्भाग्यवश ऐसा तब होगा जब कि दुनिया भर में विरासत में मिले कई सुलगते मुद्दे कायम हैं.

निखिला नटराजन - इसी विरासत का हिस्सा है मिडिल ईस्ट. आपकी राय में नए अमेरिकी नेता के सामने इस क्षेत्र और इस क्षेत्र से जुदा विश्व शांति का मसौदा क्या है?

संजय जोशी - विरासत में मिले मुद्दों में इस्लामिक आतंकवाद और सीरिया-इराक में गृहयुद्ध ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें फौरन तवज्जो की दरकार होगी. इस्लामिक स्टेट यानी आइएस भौगोलिक तौर पर तो सिमटते दिखाई देते हैं, पर अभी भी एशिया, यूरोप और अमेरिका में आतंकी हमले करने की उनकी क्षमता कायम है. अमेरिका एक त्रिपक्षीय जटिल संघर्ष में खुद को उलझा हुआ पा रहा है, जिसमें वो इस्लामिक स्टेट और सीरियाई-रूसी-इरानी सुरक्षाबलों के खिलाफ तथाकथित नरम पक्षीय समूहों को समर्थन दे रहा है. समस्या यह है कि आपसी संघर्ष में उलझे इन पक्षों के एजेंडा को अलग करने वाली रेखाएं लगातार बदलती और हल्की पड़ रही है.

यहां फॉस्टियन सौदेबाजी नहीं हो सकती है. अमेरिका को यह सुनिश्चित करना होगा कि इराक और सीरिया में इस्लामिक स्टेट की न केवल हार हो बल्कि इसकी विचारधारा की स्वीकार्यता को पूरी तरह से खत्म करना होगा और इसके समर्थकों और संसाधानों के स्रोतों को भी जड़ से उखाड़ना होगा.

निखिला नटराजन - और चीन, जो अब अमेरिका को अपने से इक्कीस नहीं समझता?

SunjoyJoshi

संजय जोशी - भारत-प्रशांत क्षेत्र में चीन की आक्रामकता से दक्षता से निपटना होगा. अमेरिका अगर इससे निपटने में कमजोर होता दिखा तो कई छोटे पूर्व एशियाई देश चीन की शरण में चले जाएंगे. लेकिन अमेरिका ने अगर खुलकर आक्रामकता दिखाई तो इससे क्षेत्र की प्रमुख शक्तियों के बीच तनाव बढ़ सकता है. नए राष्ट्रपति को चीन के उदय से दीर्घकालीन चुनौती के रूप में निपटना होगा.

निखिला नटराजन - अब चाहूंगी कि आप भारतीय उपमहाद्वीप और दूसरे क्षेत्रीय संघर्षों का जिक्र करें.

संजय जोशी - इस सबमें आप क्षेत्रीय समस्याओं के घालमेल को भी जोड़ लीजिए. मसलन परमाणु हथियारों से लैस विवेकहीन पाकिस्तान, उत्तर कोरिया की ओर से मंडराता खतरा, अफगानिस्तान में मृगमरीचिका बन चुकी शांति और लगातार चल रहा इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष. मतलब यह कि नए राष्ट्रपति के सामने चुनौतियों का अंबार है.इस बीच अच्छी खबर यह है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत-अमेरिकी भागीदारी ठोस शक्ल अख्तियार कर चुकी है और दोनो देशों की धर्मनिरपेक्ष राजनीति से समर्थन के चलते मजबूत हो रही है. इस भागीदारी को और मजबूत करने की बात पर नए राष्ट्रपति को स्पष्ट रूप से मुहर लगाने में देर नहीं करनी चाहिए.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi