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दिवालिया घोषित हुए बेकर अगर भारतीय होते तो माल्या की तरह मौज करते

महिला जज ने कहा कि बोरिस बेकर शुतुरमुर्ग हो गए हैं

Murlidharan Shrinivasan Updated On: Jun 22, 2017 11:28 AM IST

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दिवालिया घोषित हुए बेकर अगर भारतीय होते तो माल्या की तरह मौज करते

गुजरे जमाने के जर्मन टेनिस स्टार बोरिस बेकर दिवालिया हो गए हैं. हाल के दिनों में उनकी शोहरत स्टार टेनिस खिलाड़ी नोवाक जोकोविक के कोच के तौर पर ज्यादा रही थी. बेकर को लंदन की एक अदालत ने दिवालिया घोषित कर दिया है. बेकर के वकील ने बहुत कोशिश की, लेकिन अदालत ने उन्हें कोई रियायत नहीं दी.

महिला जज ने कहा कि बोरिस बेकर शुतुरमुर्ग हो गए हैं. वो हकीकत से मुंह छुपाने के लिए अपना सिर रेत में छुपाकर बैठे हैं. जज ने वकील का ये तर्क नहीं माना कि बोरिस बेकर को दिवालिया घोषित करने से उनकी शख्सियत पर एक बदनुमा धब्बा लग जाएगा.

भारत में तो माल्या का नाम ही काफी है

हम हिंदुस्तान में ऐसा होते हुए तो नहीं देखते. जबकि हमारे देश में तो ऐसे बहुत से लोग हैं जो कर्ज नहीं चुकाते. भारत में भी अमीर लोग शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर छुपा लेते हैं. ऐसा करके वो हकीकत का सामना करने से बचते हैं. लेकिन ऐसे कर्जदार लोगों को इस बात से भी राहत होती है कि उनके खिलाफ इन कॉर्पोरेशन की वजह से दिवालिया होने का केस चलेगा नहीं.

आज की तारीख में विजय माल्या सबसे बड़े भगोड़े के तौर पर बदनाम हैं. लेकिन बैंकों का 9 हजार करोड़ रुपए कर्ज लेकर भागे माल्या सोशल मीडिया और कारोबार जगत में उसी तरह शान से चल रहे हैं. उनका गुरूर ऐसा है कि पूछिए मत. इतना कर्ज होने के बाद भी उनकी ऐंठ देखते बनती है.

कर्जदार होने के बावजूद शानो शौकत वाली जिंदगी जी रहे माल्या से जब पत्रकारों ने इसका राज पूछा तो माल्या ने बड़े आराम से कह दिया कि ये तो उनकी कंपनियों की मेहरबानी है.

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हमारे देश में लंबे वक्त से भारी-भरकम कर्ज लेने वाले इन कॉर्पोरेशन की आड़ में खुद को बचाते रहे हैं. भारत में कर्ज लेकर दबा जाने का भयंकर घोटाला इसलिए लगातार होता रहा है, क्योंकि हमारी जांच एजेंसियां सही मायने में कारोबारी घाटे और पैसा लेकर दबाने वालों में फर्क साबित करने में नाकाम रही हैं.

कॉर्पोरेट डेट स्ट्रक्चरिंग या स्ट्रैटेजिक डेट स्ट्रक्चरिंग जैसे नुस्खों के जरिए हम ऐसे कर्जदारों को बढ़ावा देते रहे हैं. इससे दूसरों को भी करोड़ों रुपए कर्ज लेकर दबाकर बैठ जाने का हौसला मिला है. कम से कम आम आदमी की नजर में तो ऐसा ही है. क्योंकि आम आदमी अगर घर कर्ज की एक भी किस्त नहीं चुका पाता, तो फौरन उसका घर ज़ब्त कर लिया जाता है. उसे जरा भी रियायत नहीं मिलती.

भारत में तो ज्यादातर रकम उद्योगपति दबाकर बैठे हैं

आज की तारीख मे बैंकों का जो पैसा डूबा हुआ है, उसमें से ज्यादातर रकम उद्योगपति दबाकर बैठे हैं. वो कंपनियों का जाल बुनते हैं. फिर उनकी आड़ में कर्ज लेकर दबाकर बैठ जाते हैं. इस खुलेआम लूट पर किसी का बस फिलहाल चलता नहीं दिखता. एक कंपनी से दूसरी कंपनी में पैसा ट्रांसफर करते हुए करोड़ों रुपए के वारे-न्यारे कर दिए जाते हैं.

अगर मोदी सरकार इस मुद्दे पर कुछ कर पाती तो अच्छा होता. मौजूदा सरकार ने बेनामी संपत्ति के खिलाफ सख्त अभियान छेड़ रखा है. 1988 से ही पहले की सरकारें इस पर आंख मूंद कर बैठी थीं. मोदी सरकार की इस कोशिश के नतीजे सामने आने लगे हैं. हाल ही में चारा घोटाले के मुजरिम लालू यादव और उनके परिजनों की तमाम बेनामी संपत्तियां जब्त हुई हैं. अब सरकार को कंपनियों के जाल की आड़ में छुपने वाले कारोबारियों पर भी सख्ती दिखानी होगी.

बेईमान लोग सिर्फ बेनामी संपत्ति की आड़ में काला धन नहीं छुपा रहे थे. वो कर्ज लेकर घी पीने और उसे पचा जाने का काम इनकॉर्पोरेशन की आड़ में भी कर रहे थे. मतलब वो कंपनियों के नाम पर कर्ज लेकर बैंकों का पैसा दबाकर बैठ जा रहे थे. अदालतों ने ऐसे कई मामलों में सख्ती दिखाई है. जैसे दिल्ली के स्किपर कंस्ट्रक्शन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी से संपत्ति के खरीदारों को उनकी रकम दिलवाई थी.

पहले की सरकारों ने भगोड़ों के लिए ये रास्ता खुला छोड़ा हुआ था. यही नहीं, उनके लिए लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप और वन पर्सन कंपनीज़ जैसे और नए तरीके कर्ज लेकर दबाने के तौर पर मुहैया करा दिए थे.

अब वक्त आ गया है कि कंपनियों के साझीदारों और मालिकों को साफ तौर पर बता दिया जाए कि कंपनियों के जाल के पीछे छुपने का वक्त खत्म हो गया. अगर बोरिस बेकर ने भारतीय वित्तीय संस्थानों से कर्ज लिया होता, तो वो ये काम निजी कंपनी के जरिए करते. ऐसा करके वो दिवालिया घोषित होने से पक्के तौर पर बच जाते.

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