S M L

रूसी राजदूत की हत्या: किस ओर मुड़ेगा अब पश्चिम और रूस का संबंध?

पश्चिमी देश रूस पर सीरिया में स्थिति बिगाड़ने और आम लोगों की बदहाल जिंदगी का जिम्मेदार ठहराते रहे हैं.

Updated On: Dec 21, 2016 11:14 PM IST

Vivek Katju

0
रूसी राजदूत की हत्या: किस ओर मुड़ेगा अब पश्चिम और रूस का संबंध?

तुर्की में रूस के राजदूत आंद्रे कार्लोव की 19 दिसंबर की शाम गोली मार कर हत्या कर दी गई. कार्लोव उस समय एक चित्र प्रदर्शनी में बोल रहे थे. हमलवार 22 साल का मेवलट ऑल्टिनटास था. उसने कार्लोव पर ताबड़तोड़ कई गोलियां चलाई. वह खुद तुर्की पुलिस के दंगारोधी दस्ते में अधिकारी था. बाद में उसे भी सुरक्षाकर्मियों ने मार दिया.

खुद मरने से पहले मेवलट अल्लाह-ओ-अकबर चिल्ला रहा था. उसने ये भी कहा, सीरिया को मत भूलो, अलेप्पो को मत भूलो. एक रिपोर्ट के मुताबिक मेवलट ने कहा, जब तक हमारे घर-बार सुरक्षित नहीं हो जाते तुम भी सुरक्षित महसूस नहीं करोगे. सिर्फ मौत ही मुझे यहां से बाहर निकला सकती है. जो भी सीरियाई तानाशाही में हिस्सेदार बनेगा उसका यही हस्र होगा.

इसमें कोई शक नहीं कि कार्लोव की हत्या से रूस गुस्से में होगा. हत्यारा खुद पुलिसकर्मी था, इसलिए नाराजगी थोड़ी ज्यादा भी हो सकती है. प्रदर्शनी स्थल पर ड्यूटी नहीं होने के बावजूद वह घुसने में सफल रहा.

रूस के रुख पर दुनिया की नजर 

रूसी विदेश मंत्रालय ने इसे आतंकी घटना बताया है. हालांकि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने संभला हुआ बयान दिया. ये अहम है. रूस ने अपने राजदूत की जान बचाने में विफल रहने के लिए सीधे तौर पर तुर्की को जिम्मेदार नहीं ठहराया.

अंतरराष्ट्रीय समझौते के मुताबिक किसी राजदूत की सुरक्षा की जिम्मेदारी मेजबान देश की होती है.

पुतिन ने ये कहा कि राजदूत की हत्या सीरिया संकट को सुलझाने में रूस, तुर्की और ईरान की कोशिशों पर हमला है. साथ ही रूस और तुर्की के सुधरते संबंधों पर भी चोट पहुंचाने की कोशिश की गई है.

दोनों देशों के संबंध पिछले साल नवंबर में बेहद खराब हो गए थे. तब तुर्की के लड़ाकू विमानों ने रूसी प्लेन को मार गिराया था. इसमें रूसी पायलट की मौत हो गई थी.

इसमें कोई शक नहीं है कि राष्ट्रपति पुतिन पश्चिम एशिया में रणनीतिक पैठ मजबूत बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इस वजह से उन्होंने कार्लोव की हत्या पर बहुत आक्रामक रवैया नहीं अपनाया. वो नहीं चाहते थे कि सीरिया के मुद्दे पर रूस-ईरान-तुर्की के विदेश मंत्रियों की बैठक पर कोई असर हो. ये बैठक 20 दिसंबर से पूर्व निर्धारित योजना के मुताबिक शुरु हुई.

Activists Protest Aleppo Bombing At Russian Embassy

पश्चिमी देशों और तुर्की की नाखुशी के बावजूद रूस पिछले दो वर्षों से सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद के साथ रहा है. सीरिया अभी भीषण गृह युद्ध की चपेट में है. यूक्रेन में हस्तक्षेप के कारण कई तरह के प्रतिबंधों का सामना करते हुए भी रूस पश्चिम एशिया में सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय रहा है.

पश्चिमी देश रूस पर सीरिया में स्थिति बिगाड़ने और आम लोगों की बदहाल जिंदगी का जिम्मेदार ठहराते रहे हैं. लेकिन रूस इन आरोपों से पल्ला झाड़ता रहा है. उसका कहना है कि वो इस्लामिक स्टेट के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है जो अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है.

रूस ने पलट कर पश्चिमी देशों पर इस्लामिक स्टेट के प्रति नरम रवैया अपनाने का आरोप लगाया है.

आईएस के खिलाफ साथ आएंगे पुतिन और ट्रंप?

अमरीकी राष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचित डोनाल्ड ट्रंप का भी पुतिन के साथ खास रिश्ता है. ट्रंप संकेत दे चुके हैं कि ओबामा प्रशासन इस्लामिक स्टेट को जितना खतरनाक मानता है उससे वो कहीं ज्यादा खतरनाक है. उन्होंने आईएस से निपटने के लिए रूस और अमरीका के निकट आने की भी वकालत की है. इसके बावजूद पुतिन सीरियाई संकट खत्म करने के लिए तुर्की और ईरान के साथ प्रयास करना चाहते हैं.

ये अभी निश्चित नहीं है कि रूस-तुर्की-ईरान का त्रिगुट कितना सफल होगा क्योंकि सीरियाई गृह युद्ध को लेकर तीनों ही देशों का रूख अलग-अलग रहा है. तुर्की ने कठोरता से असद का विरोध किया है, सीरियाई विरोधियों को समर्थन दिया है और आईएस के खतरों को नजरअंदाज किया है. इसका मुख्य उद्देश्य कुर्दों को ताकतवर होने से रोकना है. दूसरी ओर रूस और ईरान ने असद को बनाए रखने के लिए सैनिक और राजनीतिक दोनों स्तरों से मदद की है. दोनों के निशाने पर आईएस रहा है.

ईरान ने जहां इराकियों और सीरिया को आईएस के खिलाफ जमीनी स्तर पर मदद की है, वहीं रूस ने हवाई ताकत का सहारा दिया है. अगर तीनों का प्रयास सफल नहीं भी होता है तब भी अरब देशों में पश्चिमी और अमरीकी ताकत को नजरअंदाज कर एक बड़ा संदेश दिया गया है.

Activists Protest Aleppo Bombing At Russian Embassy

इस्लामी कट्टरपंथ की चपेट में तुर्की 

कार्लोव की हत्या से पता चलता है कि तुर्की में इस्लामी कट्टरपंथ किस तरह जड़ें जमा रहा है. तुर्की के राष्ट्रपति रिसेप तैय्यब एर्दोगान ने देश में इस्लामी मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए काफी प्रयास किया है. वो मुस्तफा कमाल अतातुर्क के धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक आदर्शों से अलग सोचते हैं.

कुछ साल पहले तक ये सोचना भी मुश्किल था कि जिस अतातुर्क के आदर्शों से तुर्की की सेना प्रेरणा लेती रही है उसमें इस्लामी कट्टरपंथ पैठ कर लेगा. वो भी इतना कि किसी राजदूत की बिना किसी दोष के हत्या कर दी जाए. लेकिन ये समझना होगा कि तुर्की की सेना अब एर्दोगान के नियंत्रण में है.

तुर्की की सेना के एक हिस्से ने इसी साल जुलाई में तख्तापलट की कोशिश की थी. ये एक बेकार कोशिश थी जिसका विफल होना तय था. एर्दोगान ने इस घटना से सबक लेते हुए संस्थानों पर पकड़ बनाई. हालांकि एर्दोगान उदारवादी इस्लाम को लाना चाहते हों पर अतातुर्क की धर्मनिरपेक्षता से इतर इतनी ढील भी ऐसा जिन्न बाहर कर देगा जिसे वापस बोतल में बंद करना मुश्किल साबित होगा.

कार्लोव की हत्या एक बार फिर दिखाता है कि इस्लामी दुनिया का संकट अभी खत्म होने से बहुत दूर है. इससे जो नकारात्मक नतीजे सामने आ रहे हैं उससे भारत समेत सभी देश प्रभावित होंगे.

(लेखक अफगानिस्तान, म्यांमार और थाईलैंड में भारत के राजदूत रह चुके हैं. साथ ही विदेश मंत्रालय में पाकिस्तान-अफगानिस्तान-ईरान डेस्क पर काम कर चुके हैं.)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi