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एमनेस्टी इंटरनेशनल ने आंग सान सू की से अपना सबसे बड़ा सम्मान वापस लिया

संस्था ने रोहिंग्या मुस्लिमों के खिलाफ म्यामां की सेना की ओर से किए गए अत्याचारों पर उनकी ‘उदासीनता’ को देखते हुए ये सम्मान वापस लिया

Updated On: Nov 13, 2018 12:26 PM IST

FP Staff

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एमनेस्टी इंटरनेशनल ने आंग सान सू की से अपना सबसे बड़ा सम्मान वापस लिया

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने सोमवार को म्यामां की राष्ट्र प्रमुख आंग सान सू की से अपना सर्वोच्च सम्मान वापस ले लिया. संस्था ने रोहिंग्या मुस्लिमों के खिलाफ म्यामां की सेना की ओर से किए गए अत्याचारों पर उनकी ‘उदासीनता’ को देखते हुए ये सम्मान वापस लिया.

लंदन स्थित वैश्विक मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा कि वह सू की को दिया गया ‘ऐम्बेसडर ऑफ कॉन्शन्स अवार्ड’ वापस ले रहा है जो उसने उन्हें 2009 में उस समय दिया था जब वह घर में नजरबंद थीं.

बैंकॉक पोस्ट के मुताबिक, समूह की ओर से जारी एमनेस्टी इंटरनेशनल प्रमुख कूमी नायडू के लिखे खत में कहा गया है, ‘आज हम बहुत निराश हैं कि आप अब आशा, साहस और मानवाधिकारों की रक्षा की प्रतीक नहीं हैं.’

इसमें कहा गया, 'एमनेस्टी इंटरनेशनल इस समस्या पर आपके रुख को न्यायसंगत नहीं मानता है, इसलिए हम आपको दिया गया ये अवॉर्ड वापस ले रहे हैं.'

समूह ने कहा कि उसने अपने फैसले के बारे में सू की को रविवार को ही सूचित कर दिया था. उन्होंने इस बारे में अब तक कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है.

सू की की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी 2015 में देश में दशकों से चले आ रहे सेना के शासन को खत्म कर बड़ी जीत के साथ सत्ता में आई थी. लेकिन म्यामां की सेना द्वारा रोहिंग्या मुस्लिमों की बड़ी जनसंख्या के साथ किए गए अत्याचार और उन्हें देश से भगा देने की घटनाओं पर उन्होंने अभी तक कुछ नहीं कहा है, जिससे उनकी लगातार आलोचना हो रही है.

कभी साहस और मुखर आवाज की प्रतीक रही आंग सान सू की आज रोहिंग्या मुस्लिमों के अधिकारों पर चुप्पी साधकर आलोचनाएं झेल रही हैं. अब तक उन्हें नवाजे गए कई सम्मानों को वापस भी लिया जा चुका है. पिछले महीने कनाडा की ओर से सम्मान के रूप में दी गई नागरिकता को भी उनसे वापस ले लिया गया.

इसके अलावा कई शिक्षा संस्थाओं और क्षेत्रीय सरकारों की ओर से दिए गए कई अवॉर्ड उनसे वापस लिए जा चुके हैं.

बता दें कि पिछले साल अगस्त में म्यामां के बौद्ध संप्रदाय की प्रमुखता रखने वाले रखाइन में सेना के हमलों से बचकर 720,000 रोहिंग्या मुसलमानों ने बांग्लादेश में शरण ली थी. ये भी कहा जा रहा है कि म्यामां की सेना कई हजार मुस्लिमों की हत्या भी की है. यूनाइटेड नेशन्स ने इसकी कड़े शब्दों में निंदा की है और दुनिया भर के नेताओं का इस ओर ध्यान खींचा है.

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