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शर्तों का 'ट्रंप' कार्ड चलकर अमेरिका ने उठाया रिस्क, किम जोंग कहीं न्योते से न ले लें यू-टर्न

सोचना अब ट्रंप को होगा कि अगर किम जोंग ने शर्त नामंजूर कर दी तो फिर उनके कूटनीतिक दांव को खुद अमेरिका किस तरह देखेगा

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Mar 13, 2018 10:09 PM IST

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शर्तों का 'ट्रंप' कार्ड चलकर अमेरिका ने उठाया रिस्क, किम जोंग कहीं न्योते से न ले लें यू-टर्न

पिछले हफ्ते व्हाइट हाउस के बाहर से हुए एक ऐलान ने पूरी दुनिया को सरप्राइज कर दिया. दक्षिण कोरिया के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने जब कहा कि मई में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग मुलाकात करेंगे तो अचानक हुए इस नाटकीय घटनाक्रम से दुनिया चौंक पड़ी. दोनों के बीच बातचीत की तस्वीर किसी 'रियलिटी शो' की तरह जेहन में उभरने लगी. एक तरफ ‘रॉकेटमैन’ किम जोंग तो दूसरी तरफ बेबाक डोनाल्ड ट्रंप.

लेकिन इससे पहले दुनिया के सबसे बड़े रियलिटी शो की जगह और तारीख तय होती कि इसमें क्लाइमैक्स आ गया. अमेरिका ने ‘ट्रंप’ कार्ड चल दिया. अमेरिका ने उत्तर कोरिया के साथ बातचीत की टेबल पर आने से पहले शर्तों का पुलिंदा सामने रख दिया. शर्तें ये कि उत्तर कोरिया पहले कुछ ठोस कदम उठाए तभी ट्रंप से मुलाकात हो सकेगी.

trump

उत्तर कोरिया के ठोस कदम के पीछे व्हाइट हाउस की प्रवक्ता सारा सैंडर्स ये याद दिलाना चाहती है कि उत्तर कोरिया ने कभी परमाणु हथियारों के त्याग और परमाणु परीक्षण न करने का वादा किया था. सवाल उठता है कि उत्तर कोरिया पर जब संयुक्त राष्ट्र के कड़े प्रतिबंधों का कोई असर नहीं पड़ा तो भला उसे अपने वादे कहां याद रहेंगे?

बातचीत की ये सारी कवायद ही इसी वजह से है कि साम-दाम-दंड-भेद के जरिए उत्तर कोरिया परमाणु निरस्त्रीकरण पर किसी तरह राजी हो जाए. तभी सैन्य कार्रवाई को आखिरी विकल्प मानने वाला ट्रंप प्रशासन बातचीत पर ही जोर देने की रणनीति पर काम भी कर रहा था.

बातचीत के जरिए ही किम जोंग ने भी एक तरह से परमाणु निरस्त्रीकरण के संकेत भी दिए हैं. किम ने खुद ही अमेरिकी राष्ट्रपति को न्योता देकर एक बड़ा दांव भी खेल दिया. दुनिया के सामने सनकी तानाशाह की छवि को बदलने की दिशा में पहला कदम बढ़ा दिया है. खुद को जिम्मेदार परमाणु संपन्न देश बताते हुए ये वादा भी कर दिया कि बातचीत के दौरान न तो मिसाइलें उड़ेंगीं और न ही कोई परमाणु धमाका होगा. यानी अब किसी न्यूक्लियर साइट पर न्यूक्लियर टेस्ट नहीं बल्कि सिर्फ बातचीत की टेबल पर ही असली टेस्ट होगा.

नॉर्थ कोरिया ने 100 किलोटन के हाइड्रोजन बम का परीक्षण कर इस बार समूची दुनिया को हिला कर रख दिया. सवाल भूकंप के झटकों से बड़ा है जिससे दुनिया दहल गई है. अब सवाल ये नहीं है कि तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ने पर दुनिया का क्या होगा बल्कि बड़ा सवाल ये है कि एक सनकी तानाशाह के हाथ में न्यूक्लियर ताकत आने के बाद दुनिया कितनी सुरक्षित है?

ऐसे में मुलाकात से पहले अमेरिकी शर्तों से बातचीत पर असर पड़ सकता है. अमेरिका की शर्तों से कई सवाल भी खड़े होते हैं. दरअसल शर्तों के पैंतरे के पीछे ट्रंप प्रशासन की शिखर वार्ता को लेकर अधूरी तैयारी भी एक वजह मानी जा सकती है. कुछ विशेषज्ञों की चिंता इस बात को लेकर भी है कि बिना अनुभवी कूटनीतिक टीम के बातचीत का खाका कैसे तैयार होगा?

हाल ही में व्हाइट हाउस प्रशासन के वरिष्ठ कोरिया विशेषज्ञ के इस्तीफे के बाद से ये खालीपन बना हुआ है. वहीं दक्षिण कोरिया में भी अमेरिकी राजदूत की मौजूदगी नहीं है. ऐसे में  क्या ये माना जाए कि ट्रंप प्रशासन बिना किसी ठोस प्लान के शिखर वार्ता के लिए अभी तैयार नहीं है? क्या ट्रंप प्रशासन ने ‘एक्सिस ऑफ एविल’ कहलाने वाले देश के साथ बातचीत का फैसला जल्दबाजी में लिया?

क्या पोर्न स्टार के साथ कथित संबंधों की वजह से ध्यान भटकाने के लिए ट्रंप ने आनन-फानन में उत्तर कोरिया के न्योते को मंजूर कर लिया?

Stephanie Clifford And Trump

अमेरिकी शर्तों के पीछे भले ही कोई भी कहानी हो लेकिन उत्तरी कोरिया के न्योते के बाद ट्रंप प्रशासन जरूर जोश में है. अमरीकी उप-राष्ट्रपति माइक पेंस मानते हैं कि अमरीका की उत्तर कोरिया को अलग-थलग करने की रणनीति सफल साबित हुई. उत्तर कोरिया से मिले न्योते के बाद व्हाइट हाउस में पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों के मुकाबले ट्रंप प्रशासन में श्रेय लेने की होड़ सी मच गई. राष्ट्रपति ट्रंप ने पिछले राष्ट्रपतियों की अबतक की कोशिशों को सिफर भी बताया.

व्हाइट हाउस प्रशासन ने ये बताने की कोशिश की कि ट्रंप की विदेश नीति में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन का अक्स दिखता है. जिस तरह अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने चीन के साथ संबंधों की नई शुरुआत की उसी तरह ट्रंप प्रशासन भी उत्तरी कोरिया के साथ बातचीत को ऐतिहासिक अंजाम देना चाहता है.

ट्रंप के पास किम जोंग से सीधी मुलाकात का ये मौका है क्योंकि अब तक अमेरिका और उत्तर कोरिया के राष्ट्राध्यक्षों के बीच कभी कोई मुलाकात नहीं हुई है. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और बराक ओबामा ने उत्तर कोरिया पर कड़े प्रतिबंध लगाने की रणनीति पर काम किया था. जबकि ट्रंप ने कड़े प्रतिबंधों के साथ कड़ी धमकी और जुबानी जंग को हथियार बनाया.

किम को बातचीत की टेबल पर लाने के लिए ट्रंप अपने कड़े रुख और आर्थिक प्रतिबंधों को श्रेय देते हैं. निश्चित तौर पर अमेरिका के लिए इसे ट्रंप की नायाब कूटनीतिक जीत माना जा सकता है. जिस चुनौती को दूसरे राष्ट्रपति प्रतिबंधों के प्रहार से दूर करने की कोशिश करते रहे उसे ट्रंप परमाणु बटन की टेबल से बातचीत की टेबल पर ले आए हैं. हालांकि बातचीत को लेकर खुद ट्रंप भी ये सोचते हैं कि या तो वो ऐतिहासिक होगी या फिर बेनतीजा रहेगी.

Trump And Nikki Haley

दरअसल उत्तर कोरिया की कथनी-करनी का अंतर ही अमेरिका को 'वेट एंड वॉच' के लिए मजबूर कर रहा है. इससे पहले क्लिंटन प्रशासन के वक्त उत्तर कोरिया ने साल 1994 में अंतर्राष्ट्रीय सहायता के बदले प्लूटोनियम हथियार कार्यक्रमों को बंद करने का समझौता किया था. लेकिन बाद में चोरी छिपे यूरेनियम संवर्धन में जुटा रहा. इसी तरह साल 2005 में उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु कार्यक्रमों को बंद करने का वादा किया लेकिन उसने अपने परमाणु कार्यक्रमों को बंद नहीं किया.

ट्रंप के व्हाइट हाउस आने के बाद से ही उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों में अचानक तेजी भी देखी गई. उत्तर कोरिया ने आईसीबीएम मिसाइलों का परीक्षण कर दावा किया कि उसकी मिसाइलें अमेरिकी शहरों को निशाना बना सकती हैं.  साथ ही सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन बम का परीक्षण कर दुनिया को दहला भी दिया.

तभी से ट्रंप इस कोशिश में हैं कि अगर उत्तर कोरिया के मुद्दे पर वो किसी अंजाम तक पहुंच पाते हैं तो उनके लिए वो ऐतिहासिक उपलब्धि होगी. लेकिन शर्तों का ‘ट्रंप’ कार्ड चलने वाला अमेरिका ये भूल रहा है कि उत्तर कोरिया ने अभी अपने पत्ते खोले नहीं हैं. वैसे भी किम जोंग के मुलाकात के लिए राजी होने को दुनिया सशंकित नजरों से देख रही है. खुद जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे भी इसमें गहरी चाल देख रहे हैं.

North Korean leader Kim Jong Un guides the launch of a Hwasong-12 missile in this undated photo released by North Korea's Korean Central News Agency (KCNA) on September 16, 2017. KCNA via REUTERS ATTENTION EDITORS - THIS PICTURE WAS PROVIDED BY A THIRD PARTY. REUTERS IS UNABLE TO INDEPENDENTLY VERIFY THIS IMAGE. NO THIRD PARTY SALES. SOUTH KOREA OUT. - RC15DD9B8C40

कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि किम जोंग जो चाहते थे वो उन्होंने हासिल कर लिया है. पहले अपने देश को दुनिया के सबसे ताकतवर परमाणु राष्ट्रों की कतार में खड़ा कर राष्ट्रीय गौरव दिया. तो अब एक मंजे हुए कूटनीतिज्ञ की तरह परमाणु निरस्त्रीकरण के मुद्दे पर ट्रंप को न्योता भी दे दिया. भले ही किम के नए अवतार को सभी संदेह से देख रहे हैं. लेकिन किम ने उनको प्रति तमाम पूर्वाग्रहों और अनुमानों को गलत साबित करने का काम किया है.

किम जोंग का शिखर वार्ता से पहले ही एजेंडा बिल्कुल साफ है. अब किम जोंग भी ट्रंप से बातचीत के बदले में शांति समझौता या फिर सुरक्षा की गारंटी मांगने की स्थिति में हैं. साथ ही ये शर्त भी रख सकेंगे कि उनके देश पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को हटाया जाए और दक्षिण कोरिया की जमीन से अमेरिकी सैनिकों की वापसी हो.

लेकिन अब सबकुछ उत्तर कोरिया के रुख पर निर्भर करता है. दोनों ही देश गेंद को एक दूसरे के पाले में फेंकने में माहिर हैं. सोचना अब ट्रंप को होगा कि अगर किम जोंग ने शर्त नामंजूर कर दी तो फिर उनके कूटनीतिक दांव को दुनिया और खुद अमेरिका किस तरह देखेगा.

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