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अमेरिका ने महिला राष्ट्रपति चुनने का एक मौका और गंवाया

भारत ने पहली महिला प्रधानमंत्री के इंदिरा गांधी को 1966 में ही चुन लिया था.

Updated On: Nov 21, 2016 08:53 AM IST

Krishna Kant

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अमेरिका ने महिला राष्ट्रपति चुनने का एक मौका और गंवाया

विश्व की अगुवाई करने वाले देशों में सबसे ताकतवर देश अमेरिका ने एक ऐतिहासिक मौका फिर से खो दिया है.

अमेरिका के 240 लोकतांत्रिक साल के इतिहास में पहली महिला राष्ट्रपति बनने का सपना देख रहीं डेमोक्रेट प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन चुनाव हार गईं. वह भी एक ऐसे प्रत्याशी से जो महिलाओं, अश्वेतों और मुसलमानों को लेकर घृणास्पद भाषणों के कारण चर्चा में रहा है.

इसके पहले बराक ओबामा पहले ऐसे राष्ट्रपति चुने गए थे जो अश्वेत समुदाय से थे. इसके उलट दुनिया भर में कई ऐसे देश हैं जो बेहद अविकसित, पिछड़े और तीसरी दुनिया के माने जाते हैं, लेकिन उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों व महिलाओं को देश के सर्वोच्च पदों पर चुना है.

भारत ने पहली महिला प्रधानमंत्री के इंदिरा गांधी को 1966 में ही चुन लिया था. भारत में महिला और अल्पसंख्यक वर्ग के लोग सर्वोच्च पद पर राष्ट्राध्यक्ष के रूप में चुने जा चुके हैं.

पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे आतंकग्रस्त और रूढ़िवादी देशों में भी महिलाएं राजनीति के शिखर तक जा चुकी हैं. लेकिन अमेरिका इस मामले में अब भी काफी पीछे है.

हालांकि, अमेरिका में कई बार ऐसा हुआ है जब महिलाएं राष्ट्रपति जैसे सम्मानजनक पद के करीब पहुंची हैं, लेकिन अमेरिकी जनता ने बार बार यह मौका खोया है कि वह किसी महिला को सर्वोच्च पद के लिए चुने.

इससे पहले शर्ली चिजम भी राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार बनी थीं, लेकिन उन्हें भी हिलेरी क्लिंटन की तरह मात खानी पड़ी.

शर्ली पहली अफ्रीकी-अमेरिकी महिला थीं जो 1968 में अमरीकी कांग्रेस के लिए चुनी गईं. 1969 से 1983 के दौरान उन्होंने न्यूयॉर्क का प्रतिनिधित्व किया. 1972 में शर्ली अमरीका के राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन हासिल करने वालीं पहली अश्वेत मूल की महिला थीं.

इसके अलावा शर्ली डेमोक्रेटिक पार्टी से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की दौड़ में शामिल होने वाली पहली महिला थीं.

हिलेरी की स्वीकार्यता नहीं

हिलेरी के विरोध में ट्रंप के होने से ज्यादातर लोग यह मान बैठे थे कि हिलेरी की जीत तय है. चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप की महिलाओं के बारे में अभद्र टिप्पणी की काफी चर्चा हुई थी.

मुसलमानों के बारे में उनको सांप्रदायिकता की हद तक कट्टर माना जा रहा था, क्योंकि उनके मुताबिक 'अमेरिका में मुसलमानों के घुसने पर पाबंदी लगा देनी चाहिए.' अश्वेतों को लेकर ट्रंप की सोच काफी प्रतिगामी है.

HillaryClinton

चुनाव संपन्न होने के ठीक एक दिन पहले अमेरिका के लगभग सभी अखबारों ने अपील की थी कि ट्रंप को हराएं क्योंकि उनके चुनाव जीतने से अमेरिका पीछे जाएगा.

गौरतलब है कि ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के कई नेता भी ट्रंप के विरोध में रहे. पूर्व राष्ट्रपति सीनियर बुश, जूनियर बुश, पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडलीसा राइस आदि ट्रंप के विरोध में थे और उनका मानना था कि ट्रंप को अमेरिका का राष्ट्रपति नहीं बनना चाहिए.

ट्रंप की उम्मीदवारी को लेकर भी रिपब्लिकन पार्टी में दो फाड़ हो गई थी. एक धड़े का मानना था कि ट्रंप को अपनी उम्मीदवारी वापस ले लेनी चाहिए.

ट्रंप को उस अनुदारवादी तबके का जबरदस्त समर्थन मिल रहा था जो मुसलमानों को लेकर बहुत आक्रामक हैं. लेकिन बाकी बातें ट्रंप के खिलाफ जा रही थीं. बावजूद इसके उनके चुनाव जीत जाने से दुनिया भर में एक तबके के लोग स्तब्ध हैं.

हालांकि, हिलेरी क्लिंटन कोई ऐसी शख्स नहीं हैं जिनकी सर्वस्वीकार्यता है. हाल ही में एक अमेरिकी सर्वे में कहा गया था कि सर्वे में शामिल होने वाले एक चौथाई युवाओं ने कहा कि हिलेरी या ट्रंप में से किसी एक को राष्ट्रपति देखने से अच्छा होता कि कोई ग्रह इस धरती से टकरा जाता और यह नष्ट हो जाती. यह दर्शाता है कि इन दोनों उम्मीदवारों की स्वीकार्यता की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं रही.

इसके बाद भी कहना होगा कि अगर हिलेरी चुनाव जीततीं तो अमेरिका को अपेक्षाकृत एक प्रगतिशील विचारों वाली राष्ट्रपति तो मिलती ही, साथ में अमेरिकी इतिहास में पहली बार महिला राष्ट्रपति भी चुनी जाती.

आज जब यह कहा जा रहा है कि नई सदी महिलाओं की है, अमेरिकी रिकॉर्ड में यह बात एक तरह का धब्बा है कि उसके इतिहास में एक भी महिला राष्ट्रपति नहीं बन सकी है. यकीनन, अमेरिका ने एक मौका और गवां दिया.

 

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