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अमेरिका: अपने त्याग पत्र में मैटिस ने नए रक्षा मंत्री के चुनौतियों का भी जिक्र किया

अपने त्यागपत्र में मैटिस ने लिखा कि वह अमेरिकी विदेश नीति के बारे में ट्रंप के रवैये को सहन नहीं कर सकते

Updated On: Dec 22, 2018 03:52 PM IST

Bhasha

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अमेरिका: अपने त्याग पत्र में मैटिस ने नए रक्षा मंत्री के चुनौतियों का भी जिक्र किया

अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस के इस्तीफे को ट्रंप के साथ दो साल के कामकाज की कुंठा के नतीजे के तौर पर देखा जा रहा है. इसके साथ ही मैटिस के उत्तराधिकारी के सामने आने वाली चुनौतियों पर भी चर्चा शुरू हो गई है.

पत्र में मैटिस ने न सिर्फ देश बल्कि भावी रक्षा मंत्री के सामने आने वाली चुनौतियों का भी जिक्र किया है.

अमेरिकी सीनेट में विदेश संबंधों की समिति के सदस्य बॉब मेनेनडेज़ का कहना है कि मैटिस का इस तरह इस्तीफा बड़ा नुकसान है और और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नाकाम और अराजकता में उलझी हुई विदेश नीति का वास्तविक संकेत है.

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गौरतलब है कि मैटिस ने गुरुवार को इस्तीफा देने का एलान किया था. माना जा रहा है मैटिस ने यह फैसला ट्रंप के हाल ही में लिए गए उस फैसले से असहमति के चलते लिया है जिसमें ट्रंप ने सीरिया में इस्लामिक स्टेट से लड़ रहे करीब 2 हजार अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने की बात कही थी.

इसके अलावा उनके त्यागपत्र से स्पष्ट होता है कि मैटिस अफगानिस्तान में सैनिकों की संख्या में कटौती और डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नाटो की उपेक्षा किए जाने और एशिया में सैनिकों की तैनाती पर शक करने से भी खफा थे.

अपने त्यागपत्र में मैटिस ने लिखा कि वह अमेरिकी विदेश नीति के बारे में ट्रंप के रवैये को सहन नहीं कर सकते.

अपने त्यागपत्र में मैटिस ने वजह बताई:

मैटिस ने अपने त्यागपत्र में न सिर्फ इस्तीफा देने की वजह बताई है बल्कि आने वाले खतरों से भी आगाह कराया है. उन्होंने रूस का सामना करने और चीन के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार करने में ट्रंप की अनिच्छा की भी आलोचना की है.

मैटिस ने लिखा, 'मुझे लगता है कि हमें उन देशों के प्रति अपने दृष्टिकोण को दृढ़ और स्पष्ट करना चाहिए, जिनके सामरिक हित हमारे साथ तनाव को बढ़ा रहे हैं.'

मैटिस ने लिखा, चीन और रूस जैसे देश अपने अधिकारवादी मॉडल के अनुरूप दुनिया को एक आकार देना चाहते हैं ताकि वे अपने पड़ोसियों, अमेरिका और हमारे सहयोगियों की कीमत पर अपने हितों को बढ़ावा दे सकें.

उन्होंने लिखा, 'अमेरिका स्वतंत्र विश्व में अपरिहार्य बना हुआ है. हम अपने मजबूत गठबंधनों को बरकरार रखे बिना और उन सहयोगियों को सम्मान दिए बगैर अपने हितों की रक्षा नहीं कर सकते हैं.'

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