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बांग्लादेश पर एकछत्र शासन मिलने के बाद शेख़ हसीना के सामने चुनौतियों का पहाड़

बांग्लादेश में ग्यारहवीं जातीय संसद (नेशनल असेंबली) के चुनाव पिछली बार की तुलना में कम खून-खराबे के साथ संपन्न हो गए

Updated On: Jan 05, 2019 03:38 PM IST

Abhishek Ranjan Singh Abhishek Ranjan Singh
स्वतंत्र पत्रकार

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बांग्लादेश पर एकछत्र शासन मिलने के बाद शेख़ हसीना के सामने चुनौतियों का पहाड़

बांग्लादेश में ग्यारहवीं जातीय संसद (नेशनल असेंबली) के चुनाव पिछली बार की तुलना में कम खून-खराबे के साथ संपन्न हो गए. देश के चुनावी इतिहास में यह दूसरा मौका है जब अवामी लीग इतने बहुमत से सरकार बनाने में सफल हुई. पाकिस्तान के खिलाफ नौ महीने तक चले मुक्ति युद्ध के बाद बांग्लादेश का उदय हुआ. दुनिया के मानचित्र पर उभरे इस नए देश में 7 मार्च 1973 को पहला संसदीय चुनाव हुआ. शेख मुजीबुर्रहमान की अगुवाई में 293 सीटें जीतकर अवामी लीग की पहली सरकार बनी. साढ़े चार दशक बाद वही अवामी लीग प्रधानमंत्री शेख हसीना के नेतृत्व में 257 सीटें जीतकर लगातार तीसरी बार सरकार बनाने में कामयाब हुई.

चुनाव में अवामी लीग की सहयोगी पार्टियां 31 सीटों पर विजयी हुईं जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री एच.एम.इरशाद की जातीय पार्टी ने 22 सीटों पर सफलता पाई. वहीं 300 सदस्यीय वाली बांग्लादेश नेशनल असेंबली में बीएनपी की अगुवाई वाली जातीय ओइक्को फ्रंट महज सात सीटों पर कामयाब हुईं. जिनमें बीएनपी को पांच और डॉ.कमाल हुसैन की पार्टी गण फोरम को दो सीटें हासिल हुईं. वहीं युद्ध अपराध में दोषी करार दिए जाने के बाद और जमात-ए-इस्लामी की मान्यता रद्द किए जाने के बाद उसके 22 उम्मीदवारों ने बीएनपी के निशान पर चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें कोई कामयाबी नहीं मिली. कई मीडिया सर्वे और राजनीतिक विश्लेषक सत्ताधारी अवामी लीग की वापसी का अनुमान लगा रहे थे. लेकिन नतीजे पूरी तरह एकतरफा होंगे यह अनुमान से परे था.

बीएनपी सांसदों ने किया शपथ ग्रहण का बहिष्कार

बांग्लादेश के चुनाव में बतौर पर्यवेक्षक कई देशों के प्रतिनिधि ढाका में मौजूद थे. उन्होंने चुनाव को निष्पक्ष करार दिया. लेकिन बीएनपी की अगुवाई वाली ‘जातीय ओइक्को फ्रंट’ (नेशनल यूनिटी फ्रंट) ने जनादेश को खारिज करते हुए दोबारा चुनाव कराने की मांग की है. चुनाव आयोग की अधिसूचना जारी होने के बाद सभी नव निर्वाचित सांसदों ने 3 जनवरी को शपथ ग्रहण की. हालांकि ‘बीएनपी’ और ‘गण फोरम’ के निर्वाचित सातों सांसद शपथ ग्रहण में शामिल नहीं हुए. प्रधानमंत्री शेख हसीना की अगुवाई में नई कैबिनेट को 7 जनवरी (सोमवार) को शपथ दिलाई जाएगी.

बेगम खालिदा जिया ( रॉयटर्स )

बेगम खालिदा जिया ( रॉयटर्स )

इसके बरक्स ‘बांग्लादेश इलेक्शन रेगुलेशन 2008’ के तहत इन दोनों पार्टियों ने हाईकोर्ट में चुनावी नतीजे को चुनौती दी है. नियमों के मुताबिक, चुनाव परिणाम से असंतुष्ट पार्टियां ‘गजट प्रकाशन’ के 45 दिनों के भीतर ही अपनी आपत्तियां दर्ज करा सकती हैं. उनकी याचिका पर अदालत जल्द ही अपना फैसला सुनाएगी. लेकिन विपक्षी पार्टियों को इससे कोई फायदा मिलने की उम्मीद नहीं है. विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने चुनाव में सत्ता कर दुरुपयोग कर नतीजे अपने पक्ष में कराए. लेकिन अदालत में सिर्फ आरोप से काम नहीं चलेगा बल्कि इसे साबित करने के लिए उसे साक्ष्य भी पेश करने होंगे. लेकिन अभी तक ‘जातीय ओइक्को फ्रंट’ की तरफ से ऐसा कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है, जिससे यह साबित हो सके कि चुनाव में धांधली हुई है.

चुनाव के दौरान न तो किसी मतदान केंद्र से मतपत्रों के लूटने की तस्वीरें आई हैं और न ही किसी संसदीय क्षेत्र से फर्जी मतदान का कोई वीडियो जारी हुआ. बांग्लादेश की सिविल सोसायटी ने भी इन नतीजों के खिलाफ कोई आपत्ति जाहिर नहीं की है. ऐसे में विपक्षी दलों का चुनावी नतीजों पर शक जाहिर करना समझ से परे है. खासकर बीएनपी तो मानो जैसे सियासी खुदकशी पर आमादा है. 2014 में उसने चुनाव का बहिष्कार किया था लेकिन इसे अपनी राजनीतिक भूल मानने के बजाय बीएनपी अपने उस फैसले को जायज करार दे रही है.

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इसलिए बेहतर तो यही होता कि बीएनपी समेत बाकी विपक्षी पार्टियां भी इस जनादेश का सम्मान करें. बीएनपी के महासचिव मिर्जा फखरूल इस्लाम आलमगीर की इस दलील को मान भी लिया जाए कि 2014 के चुनाव का बहिष्कार करना पार्टी का सही फैसला था. तो सवाल यह उठता है कि बीते पांच वर्षों में बीएनपी की सांगठनिक तैयारी कैसी रही. उसके पास पांच वर्षों का समय था कि वह जनता के बीच अपनी पैठ बना सके. लेकिन बीएनपी गांव-गांव तक अपने कार्यकर्ताओं को खड़ा करने में नाकाम रही.

पार्टी प्रमुख एवं पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया और उनके बेटे तारिक रहमान को अदालत ने क्रमशः दस साल और आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. बेगम खालिदा फिलहाल जेल में बंद हैं जबकि उनके बेटे तारिक रहमान अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए लंदन में हैं. सच्चाई यह है कि इस बार भी बीएनपी नेशनल असेंबली के चुनाव में हिस्सा लेना नहीं चाहती थी. लेकिन पार्टी मान्यता खारिज होने के डर से उसे चुनाव में शामिल होना पड़ा. क्योंकि चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक लगातार दो चुनावों का बहिष्कार करने पर पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद्द किया जा सकता था.

बीएनपी प्रमुख खालिदा जिया की गैर मौजूदगी की वजह से पार्टी ने आधे-अधूरे मन से चुनाव लड़ा. अब तक के चुनावों में जमात-ए-इस्लामी बीएनपी की सबसे बड़ी मददगार रही है. लेकिन इस बार चुनाव से पहले जमात को प्रतिबंधित किए जाने से बीएनपी की उम्मीदों को तगड़ा झटका लगा. बांग्लादेश के दूसरे जातीय संसद के चुनाव 18 फरवरी 1979 में हुए थे. उस चुनाव में बीएनपी को 207 सीटें मिली थीं और अवामी लीग 39 सीटों पर सिमट गई थी.

बांग्लादेश में चुनाव के दिन की तस्वीर

बांग्लादेश में चुनाव के दिन की तस्वीर

उस चुनाव में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी. चुनावी गड़बड़ियों की जो आशंका आज बीएनपी की अगुवाई वाली ‘जातीय ओइक्को फ्रंट’ लगा रही है. कमोबेश इसी तरह के आरोप अवामी लीग ने भी लगाए थे. इसके बावजूद मई 1986 में हुए चुनाव में अवामी लीग ने हिस्सा लिया लेकिन बीएनपी उसमें शामिल नहीं हुई. उस चुनाव में जातीय पार्टी को 153 और अवामी लीग को 76 सीटें मिलीं थी.

बीएनपी के चुनावी वादे

अगर देखा जाए तो इस चुनाव में बीएनपी अपनी मान्यता बचाने के लिए लड़ रही थी. उसकी अगुवाई वाले ‘जातीय ओइक्को फ्रंट’ के पास सत्ताधारी अवामी लीग की सरकार को घेरने के कोई ठोस मुद्दे नहीं थे. दस वर्षों में हसीना सरकार में बांग्लादेश ने जिस तरह आर्थिक तरक्की की उसकी प्रशंसा दुनिया भर में हो रही है. इस बार बीएनपी को लेकर जनता में कई तरह के भ्रम भी पैदा हुए.

मसलन, अपने घोषणा-पत्र में बीएनपी ने पृथक अल्पसंख्यक मंत्रालय बनाने की घोषणा की और पहली बार अल्पसंख्यकों खासकर हिंदुओं को अधिक टिकट भी दिए. वहीं उसने जमात-ए-इस्लामी के बाइस उम्मीदवारों को अपने निशान पर चुनाव लड़ाया. इस दोहरे रवैये को बांग्लादेश की जनता ने पसंद नहीं किया, क्योंकि बांग्लादेशियों के जेहन में मुक्ति युद्ध के दौरान जमात-ए-इस्लामी की बर्बरता आज भी कायम है.

इस बार के चुनाव में जमात-ए-इस्लामी समेत लगभग सभी कट्टरपंथी पार्टियों की जमानत जब्त हो गई. ‘जातीय ओइक्को फ्रंट’ के संयोजक व ‘गण फोरम’ के अध्यक्ष डॉ. कमाल हुसैन की बांग्लादेश में काफी प्रतिष्ठा है, लेकिन बीएनपी के साथ चुनाव लड़ने का उनका फैसला लोगों को पसंद नहीं आया. धर्मनिरपेक्ष राजनीति के पैरोकार समझे जाने वाले डॉ.कमाल शेख मुजीब के काफी करीबी लोगों में रहे हैं.

लेकिन उनके गठबंधन में बीएनपी समर्थित जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवारों की मौजूदगी बांग्लादेशी अवाम को रास नहीं आई. 81 वर्षीय डॉ. कमाल की पार्टी ने गठबंधन के तहत सात सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें दो उम्मीदवारों की जीत हुई लेकिन वे खुद चुनाव नहीं लड़े. बांग्लादेश की राजनीति में इतने प्रतिष्ठित माने जाने वाले डॉ. कमाल अब दोबारा चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं. लेकिन उन्हें यह जरूर सोचना चाहिए कि अपने आखिरी समय में उनका बीएनपी को साथ देना क्या सही फैसला था?

जनता की कसौटी पर खरी उतर पाएगी अवामी लीग

बांग्लादेश में ज्यादातर रेलमार्ग अब भी मीटर गेज में हैं. ( तस्वीर: अभिषेक रंजन सिंह )

बांग्लादेश में ज्यादातर रेलमार्ग अब भी मीटर गेज में हैं. ( तस्वीर: अभिषेक रंजन सिंह )

अवामी लीग ने अपने घोषणा-पत्र में कई वादे किए जिसमें कुछ लोक लुभावन भी हैं. मसलन-देश में हाई-स्पीड ट्रेन का परिचालन. जबकि बांग्लादेश में अभी तक रेलगाड़ियों का विद्युतिकरण नहीं हो सका है. यहां तक कि ज्यादातर रेलमार्गों को अभी तक मीटर गेज से ब्रॉड गेज में परिवर्तित भी नहीं किया जा सका है. शेख हसीना सरकार ने अगले पांच वर्षों में 1.5 करोड़ नई नौकरी देने का वादा किया है. लेकिन बांग्लादेश में बेरोजगारी से जूझ रहे युवाओं को अगले पांच वर्षों में कितना रोजगार मिलता है यह देखने वाली बात होगी.

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म्यामांर से आए दस लाख रोहिंग्या शरणार्थियों को दक्षिणी बांग्लादेश के कॉक्स बाजार में शरण दी गई है. अवामी लीग सरकार के इस फैसले के बाद शेख हसीना की छवि ‘मदर ऑफ ह्यूमेनिटी’ की बनी है. लेकिन दो वर्ष बाद भी रोहिंग्याओं की वापसी का रास्ता साफ नहीं हो पाया है. ऐसे में बांग्लादेश के ऊपर जो जनदबाव बढ़ा है, वह आने वाले समय में सरकार के लिए चुनौती होगी. इस चुनाव में रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर पैदा हुई सहानुभूति का लाभ अवामी लीग को मिला है. लेकिन उनकी सकुशल वापसी का रास्ता निकालना शेख हसीना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी.

भारत और बांग्लादेश के आपसी संबंध

बांग्लादेश में अवामी लीग सरकार की वापसी भारत के लिए काफी मायने रखती है. भारत में चाहे जिस पार्टी की सरकार रही हो लेकिन अवामी लीग के साथ दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध हमेशा से बेहतर रहे हैं. 2014 में एनडीए की सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने जून 2015 में भूमि सीमा समझौता (एल.बी.ए) को मजूरी दी. इसके तहत दोनों देशों के बीच भूमि की अदला-बदली और 70 वर्षों से स्टेटलेस दोनों देशों के 51,000 लोगों को नागरिकता मिली.

बहुप्रतीक्षित इस समझौते की दुनिया भर में प्रशंसा हुई. 2014 से 2018 के दौरान भारत और बांग्लादेश के बीच कई और अहम समझौते हुए. जिनमें दोनों देशों के बीच बसों, रेलगाड़ियों का परिचालन भी शामिल है. कलकत्ता से ढाका होते हुए अगरतला तक यात्री बस और ट्रकों के परिचालन से दोनों देशों को फायदा मिला. खासकर भारत को, क्योंकि कलकत्ता से ढाका होते हुए अगरतला जाने वाली ट्रकों की दूरी में काफी कमी आई है. फिलहाल कलकत्ता और ढाका कैंट के बीच मैत्री एक्सप्रेस नामक रेलगाड़ी चल रही है.

पिछले साल प्रधानमंत्री मोदी और हसीना ने कलकत्ता और खुलना के बीच भी रेलगाड़ी के परिचालन को मंजूरी दी. इसी साल 2019 में अगरतला और अखौरा (बांग्लादेश) के बीच रेलगाड़ियों का परिचालन शुरू हो जाएगा. नए अखौरा रेल मार्ग के बनने से अगरतला और कलकत्ता का सफर महज 10 घंटे में पूरा होगा. इस रेलमार्ग के बनने से 21 घंटे समय की बचत होगी. यह नई रेल लाइन गुवाहाटी के जरिए राजधानी ढाका के रास्ते जाएगी. इस तरह अगरतला और कलकत्ता के बीच की दूरी 1650 किलोमीटर से घटकर करीब 550 किलोमीटर रह जाएगी.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कलकत्ता से नोआखाली और चटगांव तक रेल परिचालन शुरू करने का भी निर्णय लिया है. साल 2016 में भारत और बांग्लादेश के बीच सामुद्रिक यातायात संबंधी भी एक करार हुआ है,जिसके तहत चटगांव बंदरगाह को विशाखापत्तनम से जोड़ने की बात हुई है. इसी साल अप्रैल-मई में भारत में भी आम चुनाव होने हैं.

जाहिर है बांग्लादेश की नजर भी भारत में होने वाले चुनावों पर है, क्योंकि पिछले पांच वर्षों में भारत और बांग्लादेश के बीच कई व्यापारिक, सरहदी और सामरिक समझौते हुए हैं. नतीजतन बांग्लादेश में अवामी लीग की अगुवाई वाली सरकार यह जरूर चाहेगी कि भारत की मौजूदा सरकार की वापसी हो क्योंकि हालिया कुछ वर्षों में दोनों देशों की सरकारों में कई उल्लेखनीय समझौते हुए हैं. लेकिन तीस्ता जल बंटवारे समेत कुछ विवादित मुद्दे अभी भी सुलझाने बाकी हैं.

शेख हसीना से हिंदू अल्पसंख्यकों की उम्मीदें

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वैसे तो अवामी लीग की सरकार में अल्पसंख्यक हिंदू स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हैं. लेकिन वेस्टेड प्रॉपर्टी एक्ट (पूर्व में शत्रु-संपत्ति कानून) वहां रहने वाले हिंदुओं के लिए मुसीबत का सबब बन चुका है. बीएनपी और जमात के शासन में अल्पसंख्यकों की जमीनों पर कब्जे हुए. 1996 में अवामी लीग के सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 2001 में इस कानून में बदलाव कर इसका नाम 'वेस्टेड प्रॉपर्टी रिटर्न एक्ट' कर दिया. ताकि बांग्लादेश में रहने वाले अल्पसंख्यकों को उनकी अचल संपत्तियों का लाभ मिले.

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कानून के तहत अल्पसंख्यकों की जब्त की गई जमीनों को 180 दिनों के भीतर वापस करने की मियाद तय की गई थी, लेकिन 2001 में बीएनपी की सरकार में अल्पसंख्यकों पर जुल्म और बढ़ गए. 2008 में अवामी लीग सत्ता में आई और उसने 'वेस्टेड प्रॉपर्टी रिटर्न एक्ट' को प्रभावी बनाने का फैसला किया. लेकिन सरकार के उस फैसले का लाभ अभी तक बांग्लादेश में रहने वाले अल्पसंख्यकों को नहीं मिल सका है. इस बार चुनाव में अवामी लीग ने ‘राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग’ बनाने का वादा किया है. इसे लेकर अल्पसंख्यकों में काफी खुशी देखी जा रही है. ऐसे में अल्पसंख्यकों खासकर हिंदुओं को उनकी जमीनों पर मालिकाना हक दिलाने की बड़ी चुनौती नई सरकार के समक्ष होगी.

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