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एक खास संप्रदाय के 40 लाख लोग नहीं डाल पाएंगे पाकिस्तान आम चुनाव में वोट

अहमदी खुद को मुस्लिम कहते हैं पर पाकिस्तान का संविधान इससे इनकार करता है, इसका नतीजा यह हुआ है कि वह अपने ही मुल्क की राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हैं

Updated On: Jul 04, 2018 09:52 AM IST

Nazim Naqvi

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एक खास संप्रदाय के 40 लाख लोग नहीं डाल पाएंगे पाकिस्तान आम चुनाव में वोट
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इस धरती पर जो इंसानी-सभ्यता है उसमें एक बड़ी तादाद उन लोगों की है जो खुद को आस्थावान कहलवाना ज्यादा पसंद करते हैं. लेकिन क्या कभी हमने यह जाने की कोशिश की है कि ‘आस्था’ का मतलब क्या है? इसके लिए किसी कोश का सहारा लेंगे तो वह बताएगा कि ‘यह एक तरह की स्वीकृति है उस ‘सच’ या ‘अस्तित्व’ के बारे में जिसका कोई सुबूत मौजूद नहीं है’.

अलग-अलग आस्थाओं के इस जंगल में खुद को आस्थावान के खाने में रखकर गुजर-बसर करना दरअसल वह कबीलाई या आदिवासी सोच है जिसे हम सदियों से ढोते चले आ रहे हैं. चूंकि यह हमारी व्यक्तिगत पसंद या नापसंद का मामला है इसलिए किसी को भी इस पर एतराज़ करने की आजादी नहीं है, फिर भी यही एक सोच है जो अनगिनत संघर्षों और लातादाद खून-खराबे की वजह साबित होती रही है.

मुस्लिम-जगत में आस्था को टटोलने निकलिएगा तो आपको एक तूफ़ान का एहसास होगा. एक ऐसे सैलाब से आपका सामना होगा जो सिर्फ सर से ऊंचा नहीं हो चुका है बल्कि एक ऐसे सूचकांक तक पहुंच चुका है जिसके बाद तबाही को रोक पाना खुद सैलाब के बस में भी नहीं रह जाता. हद यह हो गई है कि 21वीं सदी का मुस्लिम नौजवान अब अपने बुजुर्गों से पूछने लगा है कि ‘क्या हमारा मुस्लिम-जगत या हमारा कुरान इतना दुर्बल है कि कुछ लोग इसका दुरूपयोग कर रहे हैं और लोगों को आतंकवाद फैलाने के लिए तैयार कर रहे हैं?’ उन्हें अफ़सोस भी होता है कि जिस मजहब की छत्रछाया में उनकी परवरिश हुई है ‘उस सुंदर धर्म का इस तरह दुरूपयोग क्यों किया जा रहा है?’.

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करीब 14 सौ साल पुराने इस मजहब में कई फिरके (सम्प्रदाय) बन गए हैं. हर फिरका दूसरे को काफ़िर समझता है. यानी सब एक डोर से बंधे हुए हैं और एक दूसरे को देखना भी पसंद नहीं करते. देखना तो छोड़िए, एक दूसरे के जान के प्यासे हैं. इन्हीं में एक समुदाय है अहमदी समुदाय. इसका नाता हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से है. अहमदी समुदाय भारत में भी है और शान से अपनी आस्था के अनुसार जीता है लेकिन जिस जिल्लत और शर्मिंदगी के साथ वह पाकिस्तान में रहता है उसकी मिसाल दुनिया में कहीं और नहीं है.

अहमदियों पर अत्याचार का सिलसिला आज भी कायम

सारांश में कहें तो मुसलामानों के बीच से निकला हुआ एक सम्प्रदाय है, अहमदिया सम्प्रदाय. पंजाब प्रान्त की धरती से उपजा यह सम्प्रदाय, विभाजन के बाद पकिस्तान के हिस्से में चला गया और तभी से शुरू हुआ अहमदियों पर अत्याचार का सिलसिला जो बदस्तूर आज भी कायम है. और इस सिलसिले का सबसे बदसूरत पहलू यह है कि पकिस्तान ने कानून बनाकर उन्हें खुद को मुस्लिम कहने पर पाबन्दी लगा दी है.

 

अहमदी खुद को मुस्लिम कहते हैं पर पकिस्तान का संविधान इससे इनकार करता है. इसका नतीजा यह हुआ है कि वह अपने ही मुल्क की राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हैं. 1974 (जब उन्हें ग़ैर-मुस्लिम घोषित किया गया) से लेकर आजतक वह अपने ऊपर हुई नाइंसाफ़ी का विरोध कर रहे हैं, जलील किए जा रहे हैं, शोषित किए जा रहे हैं, मारे जा रहे हैं लेकिन अपने अस्तित्व को कायम रखने की इस जंग को छोड़ देने के इरादे से कोसों दूर हैं.

40 लाख अहमदी नहीं डाल पाएंगे वोट

अब एक हकीकत पर और नज़र डालिए. करीब 22 दिन बाद (25 जुलाई को) होने वाले पाकिस्तान के आम चुनावों में अगले पांच साल के लिए एक सरकार चुनी जाएगी मगर इसमें अहमदियों की राय शामिल नहीं होगी. इसी के मद्देनज़र एक स्वाभाविक सवाल उभरता है कि आखिर अहमदी सम्प्रदाय की पाकिस्तान में जनसंख्या क्या है?

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इसके जवाब में अधिकारिक तौर पर 1998 की पकिस्तानी जनगणना को सामने लाया जा सकता है जिसके मुताबिक़ पाकिस्तान में 2 लाख 91 हज़ार अहमदी रहते हैं जो पाकिस्तान की कुल जनसंख्या का महज़ 0.22% है. लेकिन यह तादाद शक के दायरे में है क्योंकि अहमदियों का कहना है कि ‘हुकूमत इसलिए हमारी जनसंख्या का सही आंकड़ा नहीं पेश करती है क्योंकि उसी आधार पर उसे संसद में हमें प्रतिनिधित्व देना पड़ेगा’.

दूसरी स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा जनसंख्या का जो आंकड़ा पेश किया गया है उसके मुताबिक पाकिस्तान में अहमदियों की संख्या 2 मिलियन से 5 मिलियन के बीच है. अगर इस अनुपात के बीच से कोई रास्ता निकला जाय तो यह कहा जा सकता है कि पाकिस्तान में 4 मिलियन (40 लाख) अहमदी रहते हैं. यही वह आंकड़ा है जिसे ज्यादातर लोग अपने विश्लेषणों में प्रयोग में लाते हैं. एक सच यह भी है कि चूंकि इनपर सरकारी प्रतिबन्ध लगा हुआ है इसलिए जब जनगणना अधिकारी आते हैं तो यह उनके सामने नहीं आते क्योंकि ऐसा हुआ तो उन्हें अपना धर्म बताना पड़ेगा और उनके नजदीक यह ‘आ बैल मुझे मार’ जैसे मुहावरे जैसा है.

ज़रा सोचिए, इस धरती पर एक देश ऐसा भी है जहां एक पूरा का पूरा समप्रदाय वर्षों से, सियासी और चुनावी प्रक्रिया से बाहर रहने पर मजबूर है और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के मुंह पर ताला पड़ा हुआ है. बहुत हुआ तो वह बस इतना कहकर अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर लेते हैं, जैसा की उनके एक संगठन ‘ह्यूमन राइट्स वाच’ ने आगामी चुनावों को देखते हुए एक अपील जारी की है कि ‘आम चुनावों में अहमदी सम्प्रदाय के सदस्यों को पूर्ण और समान भागीदारी की इजाजत देने के लिए पाकिस्तानी हुकूमत को तुरंत कार्यवाही करनी चाहिए. सरकार को अपने भेदभावपूर्ण चुनावी प्रावधान को निरस्त करना चाहिए जो अहमदियों को उनकी मजहबी मान्यताओं के कारण प्रभावी रूप से बहिष्कृत करता है’.

हमारे जो पाठक अहमदी समुदाय के बारे में नहीं जानते उनके लिए

अहमदी समुदाय अपने संप्रदाय के संस्थापक मिर्जा गुलाम अहमद को भी पैग़म्बर का दर्जा देते हैं जिसे प्रमुख मुस्लिम धर्म और पाकिस्तानी कानून अस्वीकार करता है. पाकिस्तानी कानून के अनुसार, मतदाताओं के रूप में पंजीकरण करने के लिए अहमदियों को या तो अपने विश्वास को त्यागना होगा या एक अलग चुनावी सूची में शामिल होने के लिए सहमत होना होगा और अपनी स्थिति को 'गैर-मुस्लिम' के रूप में स्वीकार करना होगा. लेकिन मुसलमानों के रूप में अपनी पहचान को कायम रखना ही अहमदिया धार्मिक विश्वास का आधार है और इसलिए वे इस कानून के रहते चुनावी सूची में खुद को पंजीकृत नहीं कराते हैं.

ह्यूमन राईट वाच के एशिया निदेशक ब्रैड एडम्स कहते हैं कि ‘पाकिस्तान में चुनावों को 'स्वतंत्र और निष्पक्ष' कैसे कहा जा सकता है अगर वह अपने एक संपूर्ण समुदाय को चुनावी प्रक्रिया से प्रभावी रूप से बाहर रखता हो’. ‘धार्मिक असहमति का यह मतलब कतई नहीं है कि लोगों से उनके वोट देने का अधिकार ही छीन लिया जाए’.

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लेकिन जिस तर्ज पर पाकिस्तान का चुनावी माहौल आगे बढ़ रहा है. जिस तरह से अतिवादी और आतंकवादी चुनावी प्रक्रिया में सेंध लगाकर देश की संसद को अपनी मुट्ठी में ले लेना चाहते हों, जिन चालबाजियों के साथ पकिस्तान की फ़ौज लोकतंत्र का नकाब ओढ़कर अराजक और निरंकुश व्यवस्था का चाबुक इस्तेमाल कर रही हो, ऐसे माहौल में पहले से ही हाशिए पर पड़े एक समुदाय की परवाह किसी को होगी ऐसी सोच रखने वाले पकिस्तान की संरचना को या तो समझते ही नहीं हैं या कम समझते हैं.

अंत में शिम्बोर्स्का विस्वास की कविता से चंद लाइनें

क्या भाई-चारे के नाम पर भी किसी ने भीड़ जुटाई है? क्या करुणा से भी कोई काम पूरा हुआ है? क्या संदेह कभी किसी फ़साद की जड़ बन सका है? यह ताक़त सिर्फ़ नफ़रत में है। ओह! इसकी प्रतिभा! इसकी लगन! इसकी मेहनत!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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