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अलविदा 2017: साइंस के क्षेत्र की 5 सबसे बड़ी उपलब्धियां

साइंस के क्षेत्र में अर्जित हर सफलता किसी एक देश, वर्ग या संप्रदाय की नहीं बल्कि संपूर्ण मानव जाति की उपलब्धि मानी जाती है

Updated On: Dec 28, 2017 08:13 AM IST

Sandeep Nigam

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अलविदा 2017: साइंस के क्षेत्र की 5 सबसे बड़ी उपलब्धियां

साल 2017 हमें साइंस फिक्शन जैसे भविष्य के एक कदम और करीब ले आया है. साइंस के क्षेत्र में अर्जित हर सफलता किसी एक देश, वर्ग या संप्रदाय की नहीं बल्कि संपूर्ण मानव जाति की उपलब्धि मानी जाती है. साइंस की सीमाएं नहीं होतीं, ये तथ्य किसी अंतरराष्ट्रीय रिसर्च कार्यक्रम में विभिन्न देशों के बीच सहयोग में साफ नजर आता है.

हम दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रहे और सब कुछ भूलकर अपने शोध में डूबे वैज्ञानिकों के ऋणी हैं. क्योंकि ये पिछले पीढ़ी द्वारा अर्जित ज्ञान में अपना योगदान देते हुए आने वाली पीढ़ी के भविष्य को आकार देने का काम कर रहे हैं. प्रस्तुत है साल 2017 में साइंस के क्षेत्र में हुई पांच सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों का संक्षिप्त विवरण-

1. Gene editing

(1) जेनेटिकली मॉडिफाइड मानव

अमेरिका के पोर्टलैंड में वैज्ञानिकों ने मानव भ्रूण को मॉडीफाई या उन्नत करने में पहली बार सफलता प्राप्त की है. ये 2017 की सबसे बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धियों में से एक है. इससे जीन सुधार की नई तकनीक ‘क्लस्टर्ड रेगुलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिन्ड्रोमिक रिपीट्स’ या सीआरआईएसपीआर के प्रति भरोसा बढ़ा है और पहले जेनेटिकली मॉडीफाइड मानव के जन्म का रास्ता खुला है.

जीएम मानव को संभव बनाने की चाबी है अपार संभावनाओं से भरी नई जीन तकनीक सीआरआईएसपीआर. जिसकी मदद से अब जीवन के सोर्स कोड डीएनए को ही बदल देना संभव हो गया है.

ऑरेगोन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने हाइपरट्रोफिक कार्डियोमायोपैथी की जेनेटिक बीमारी को ठीक करने के लिए पहली बार मानव भ्रूण के डीएनए में ही सुधार कर उसे मॉडीफाई करने की कोशिश की है. एक अन्य जेनेटिक बीमारी ‘ह्युमन पैपिलोमावायरस’ या एचपीवी को ठीक करने के मानव परीक्षण के तहत 60 महिलाओं के गर्भाशयों की ग्रीवा पर एक विशेष जेली लगाई गई है.

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इस जेली में आवश्यक डीएनए कोडिंग है जो ट्यूमर बनने और बढ़ने की प्रक्रिया को ही खत्म कर देती है. उत्साह से भरे वैज्ञानिक बताते हैं कि अब वो दिन दूर नहीं जब सीआरआईएसपीआर तकनीक की मदद से ज्यादातर खतरनाक बीमारियों को समूल नष्ट किया जा सकेगा.

2. Reinforcement learning

(2) मानव की तरह सोचने वाली कंप्यूटर तकनीक

गैरी कॉस्पोरोव और कंप्यूटर डीप ब्लू के बीच शतरंज की बाजी की खबर मानो अब किसी और युग की बात लगती है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तब से कई अहम पड़ावों को पार कर नई ऊंचाइयों को छू रही है.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के ज्यादातर विशेषज्ञ मानते थे कि किसी विशेषज्ञ या चैंपियन मानव खिलाड़ी की तरह खेलने वाला कंप्यूटर बनाने में दस साल से ज्यादा का वक्त लग जाएगा, लेकिन 2013 में एक विशेष रिपोर्ट छपी जिसमें एक ऐसे प्रोग्राम का विवरण था जो कई सारे वीडियो गेम्स को सुपरह्यूमन के स्तर पर सीखने में सक्षम था.

इससे प्रेरित होकर गूगल ने 2014 में 500 मिलियन डॉलर से भी ज्यादा की लागत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की एक कंपनी को खरीद लिया. 2017 के जुलाई महीने में गूगल की इसी सहयोगी कंपनी ‘डीप माइंड’ ने एक शोध पत्र में उन तरीकों के बारे में विस्तार से बताया जिनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के प्रयोग से कंप्यूटर को जटिल और विपरीत परिस्थितियों में रास्ता निकालने के बारे में सिखाया जाता है. हाल में विकसित इस तरीके को ‘रीइन्फोर्समेंट लर्निंग’ कहते हैं.

‘रीइन्फोर्समेंट लर्निंग’ मानव जाति का विशेष गुण है, यानी प्रयोग करके देखना और अपने अनुभवों से सीखना. ये सारी किताबी बातें उस वक्त मूर्त रूप में सामने आईं जब ‘डीप माइंड’ ने ‘रीइन्फोर्समेंट लर्निंग’ के विशेष गुण से सज्जित एक अनोखा कंप्यूटर तैयार कर लिया, जिसका नाम है ‘अल्फा-गो.’

कंप्यूटर ‘अल्फा-गो’ नाम के एक जटिल बोर्ड गेम का चैंपियन है. पिछले साल एक हाई-प्रोफाइल मैच में ‘अल्फागो’ ने गो नाम के इस खेल में विश्व के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी को भी आसानी से मात दे दी.

‘रीइन्फोर्समेंट लर्निंग’ का प्रयोग अब गेमिंग से कहीं आगे किया जा रहा है. सेल्फ ड्राइविंग कार और रोबोटिक्स भी उनमें से एक है. सेल्फ ड्राइविंग कार लंबे समय से परीक्षण की स्थिति में ही है, लेकिन अब ‘रीइन्फोर्समेंट लर्निंग’ के प्रयोग से उम्मीद बढ़ी है कि ये जल्दी ही सड़कों पर आम कारों के साथ दौड़ती नजर आएंगी. गूगल और उबर ने घोषणा की है कि 2018 में दुनियाभर के प्रमुख और मुश्किल हालात वाली सड़कों और इसके बाद ट्रैफिक में सेल्फ-ड्राइविंग कार का परीक्षण किया जाएगा और ये परीक्षण ही ‘रीइन्फोर्समेंट लर्निंग’ का भविष्य तय करेगा.

3. Metalic Hydrogen

(3) मैटेलिक हाइड्रोजन उत्पन्न करने में सफलता मिली

ब्रह्माण की उत्पत्ति के बाद जो चीज सबसे पहले बनी वो है हाइड्रोजन. इस संपूर्ण सृष्टि के नींव की पहली ईंट. अपने आस-पास की दुनिया में देखें तो हाइड्रोजन हवा में गैस के रूप में और पानी में तरल द्रव के रूप में मौजूद है. जरा सूरज को देखिए, ये कुछ और नहीं बल्कि एक बहुत विशाल भट्ठी है, जहां अपार हाइड्रोजन ईंधन के रूप में हर पल दहक रहा है.

ऊर्जा की कमी से जूझती हमारी दुनिया की इस समस्या के समाधान के लिए भी वैज्ञानिक हाइड्रोजन की ओर ही देख रहे हैं, लेकिन समस्या ये कि पानी से चलने वाले हाइड्रोजन इंजन को पानी की लगातार आपूर्ति करने वाली टंकी साथ में कैसे ढोई जाए? बस यहीं से शुरू हुई कोशिश ठोस या मैटेलिक हाइड्रोजन बनाने की. 80 साल पहले किताबों में संभावना जताई गई थी कि मैटेकिल हाइड्रोजन मुमकिन है. अब तक इस विशुद्ध किताबी ज्ञान को हकीकत में बदला नहीं जा सका था.

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इस साल यानी 2017 में हावर्ड यूनिवर्सिटी के फिजिसिस्ट इसाक सिल्वेरा और श्रीलंकाई मूल के वैज्ञानिक रंगा डायस और उनकी टीम ने दो डायमंड्स के बीच तरल हाइड्रोजन को रखकर उन्हें एक के ऊपर एक रखकर दबाना शुरू किया. 4.95 मिलियन एटमॉस्फियरिक प्रेशर पर हाइड्रोजन मैटेलिक स्थिति पर पहुंच गया. ये उच्च दबाव पृथ्वी के केंद्र पर पड़ने वाले दबाव से कई गुना ज्यादा है. अब तक ऐसा करना संभव नहीं हो सका था, क्योंकि इस दबाव की स्थिति पर आने से पहले ही डायमंड्स टूट जाते थे.

पहली बार समुद्र की सतह पर पड़ने वाले दबाव से करीब 50 लाख गुना ज्यादा और समुद्र के तल पर पड़ने वाले दबाव से करीब 4,500 गुना अधिक की स्थिति में सिल्वेरा की प्रयोगशाला में मैटेलिक हाइड्रोजन उत्पन्न किया गया है. पूरी पृथ्वी में इस रूप में हाइड्रोजन कहीं और नहीं है. मैटेलिक यानी धात्विक स्थिति में हाइड्रोजन एक सुपरकंडक्टर की तरह बर्ताव करने लगता है, जिसका इस्तेमाल हमारे घरों तक बिना नुकसान के बिजली पहुंचाने से लेकर दूसरे ग्रहों को भेजे जाने वाले स्पेस मिशन तक में है. लेकिन उपयोग की स्थिति तक लाने से पहले अभी कई और परीक्षण बाकी हैं.

4. Alien planet

(4) एलियन ग्रह की खोज जहां जीवन की संभावना सबसे ज्यादा है

19 अप्रैल 2017 को यूरोपियन ऑर्गेनाईजेशन फार एस्ट्रोनॉमिकल रिसर्च (ईएसओ) ने जीवन की संभावना वाला ग्रह खोज निकाला. ये एलियन ग्रह हमारी पृथ्वी से 40 प्रकाश साल दूर स्थित एक सितारे के हैबिटेट जोन में है. हमारी पृथ्वी अपने सूरज से एक सुरक्षित दूरी पर है जहां जीवन फल-फूल सकता है, इसे हेबिटेट जोन कहते हैं. वैज्ञानिकों ने इस नए ग्रह का नाम एलएचएस 1140 रखा है.

हावर्ड स्मिथसोनियन सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स के जैसन डिटमान ने ईएसओ की तरफ से जारी आधिकारिक बयान में कहा है, ‘इस नए सुपरअर्थ की तरह जीवन को सहारा देने की संभावनाओं से भरा कोई ग्रह पूरे दशक में नहीं खोजा जा सका है. पृथ्वी के अलावा किसी अन्य ग्रह पर जीवन की खोज साइंस की सबसे बड़ी तलाशों में से एक है और हमें उम्मीद है कि ये तलाश शायद यहां पूरी हो सकती है.’

5. Regenerative Medicine

(5) मानव कोशिकाओं और अंगों के रीप्रोडक्शन में सफलता

रीजेनेरेटिव मेडिसिन के क्षेत्र में मानव कोशिकाओं और अंगों को प्रयोगशाला में उत्पन्न करने की दिशा में इस साल अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल की गई है. दरअसल स्टेम सेल के क्षेत्र में चल रहे रिसर्च में शानदार प्रगति हुई है और इसका सीधा फायदा रीजेनेरेटिव मेडिसिन को मिला है. अब मेडिकल साइंस उस दौर में प्रवेश कर रही है जब हम किसी दुर्घटना से क्षतिग्रस्त हुईं नर्व कोशिकाओं को रिपेयर करने या पूरे अंगों का रीप्रोडक्शन कर सकने में सक्षम होंगे.

अमेरिका की नॉर्थ कैरोलाइना स्थित वेक फॉरेस्ट इंस्टीट्यूट फॉर रीजेनेरेटिव मेडिसिन (डब्लूएफआईआरएम) 20 मिलियन डॉलर के रीजेनेरेटिव मेडिसिन के एक बेहद खास प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहा है.

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अस्पताल द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार इस प्रोजेक्ट का लक्ष्य रीजेनेरेटिव मेडिसिन में पहली बार अत्याधुनिक 3डी प्रिंटिंग तकनीक का सफल प्रयोग किया जा रहा है. हमारा लक्ष्य है कि रोगियों में प्रत्यारोपण के लिए प्रयोगशाला में निर्मित मानव कोशिकाओं और अंगों की उपलब्धता सुनिश्चित करना.

डब्लूएफआईआरएम के निदेशक एंथनी अटाला एमडी बताते हैं, ‘हमें बेहद खुशी है कि हम रीजेनेरेटिव मेडिसिन के अग्रिम मोर्चे पर काम कर रहे हैं. जिस तरह से सचल एसेंबली लाइन के आ जाने से कारों की कीमतों में भारी कमी आ गई थी और वो आम आदमी की जेब की सीमा में आ गईं थीं, इसी तरह हम रीजेनेरेटिव मेडिसिन में एक मानक उत्पादन प्रक्रिया को विकसित कर रहे हैं ताकि प्रत्यारोपण के लिए मानव कोशिकाएं और अंग व्यापक रूप से उपलब्ध हो सकें.’

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