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Zuckerberg Testify: Facebook का कमजोर होना दुनिया के लिए राहत है

mark zuckerburg testifies में सीनेट के सामने जिस तरह से सहमे और डरे हुए नजर आए उससे पता चलता है कि कुछ समय पहले तक हर किसी को बद्तमीज़ी से जवाब देने वाली फेसबुक टीम इस बार कितनी बड़ी मुश्किल में है

Updated On: Apr 11, 2018 07:59 PM IST

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee

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Zuckerberg Testify: Facebook का कमजोर होना दुनिया के लिए राहत है
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mark zuckerburg testifies.दुनिया भर की खबरों में ये मुद्दा छाया रहा है. मंगलवार को मार्क अमेरिका में पूछताछ के लिए पेश हुए. उनके चेहरे पर वो कूलनेस नहीं थी. ज्यादातर सवालों के गोलमोल जवाब दे रहे थे. लेकिन पहली बार कोट-टाई पहन कर गंभीर दिखने की कोशिश कर रहे ज़करबर्ग सामान्य तो नहीं थे. लेकिन मार्क ज़करबर्ग के साथ ये होना ज़रूरी था.

चोरी और बुनियाद पर खड़ी कंपनी

मार्क ज़करबर्ग कलर ब्लाइंड हैं. इसका मतलब हुआ कि उन्हें लाल और हरे रंग में अंतर नहीं दिखता है. लेकिन मार्क ज़करबर्ग जीवन में भी लाल और हरे रंग में फर्क नहीं कर पाते हैं. कहां रुकना चाहिए, कहां तक जाने की इजाज़त है मार्क ज़करबर्ग और फेसबुक को कभी नहीं समझ आया.

फेसबुक की नींव में ही चोरी और निजी जानकारियां चुराने का आईडिया है. अपने हार्वर्ड के दिनों में मार्क ने दो चोरियां कीं. पहली फेसमैश बनाते समय. मार्क ने एक शौकिया वेबसाइट बनाई. इसमें दो लोगों की तस्वीरें साथ-साथ आती थीं. यूज़र एक को हॉट सिलेक्ट करता था एक को नॉट. अपने कॉलेज के साथियों को इस तरह से सार्वजनिक रूप से जलील करने का आइडिया तो जलील था ही, मार्क ने ये तस्वीरें किसी भी छात्र की इजाज़त लेकर नहीं ली थी. साइट इतनी चली कि हार्वर्ड का सर्वर बैठ गया. इसके बाद मार्क को सस्पेंड भी होना पड़ा.

मार्क की दूसरी चोरी आइडिया के लेवल पर थी. विंकलवॉस भाइयों और दिव्य नरेंद्र ने मिलकर एक वेबसाइट की कल्पना की. हार्वर्ड कनेक्शन नाम की इस साइट में सबकुछ फेसबुक जैसा था. बस फर्क इतना था कि ये वेबसाइट सिर्फ हार्वर्ड के छात्रों के लिए थी. मार्क लंबे समय तक विंकलवॉस भाइयों से उनकी वेबासाइट बनाने के नाम पर डिस्कशन करते रहे और आइडिया को अपनी वेबसाइट 'द फेसबुक' के लिए इस्तेमाल करते रहे. बाद में मार्क को 6.5 करोड़ डॉलर का हर्जाना भी देना पड़ा.

सबसे पहले साथी को बाहर किया

मार्क ने द फेसबुक बनाया. इसमें उनके साथ थे उनके रूममेट, एडुआर्डो लुइज़ सैवेरिन. मार्क के इस वेबसाइट के सपने को फाइनेंस करने और उसके पैसों का हिसाब किताब देखने की जिम्मेदारी एडुआर्डडो ने संभाली. दोनों ने साथ मिलकर फेसबुक को डेवलप किया. 2004 में शुरू हुई ये कंपनी 2012 में काफी बड़ी बन गई. सैवरिन इसके सीएफओ थे. मार्क ने 2012 में सैवरिन के लगभग सभी शेयर कंपनी से खत्म कर दिए और उनका योगदान मानने से इनकार कर दिया. इसके बाद सैवरिन ने फेसबुक पर मुकदमा किया. इस केस में उन्हें कितना पैसा मिला नहीं पता लेकिन फेसबुक ने माना कि सैवरिन फेसबुक के को फाउंडर और पहले इनवेस्टर हैं.

बदतमीज़ी

फेसबुक की बदतमीज़ी कई स्तर पर रही है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाले बॉट्स को लेकर टेस्ला के सीईओ एलन मस्क ने शक जाहिर किया था. फेसबुक की पूरी टीम ने उनका मज़ाक उड़ाया. ये हरकत शर्मनाक थी इससे भी बड़ी बात थी कि बाद में मस्क सही साबित हुए और फेसबुक को वो प्रोजेक्ट बंद करना पड़ा. फेसबुक पर जब ब्लैकबेरी ने उसके फीचर चोरी करने का आरोप लगाया. किसी जिम्मेदार कंपनी की तरह जवाब देने की जगह फेसबुक ने ब्लैकबेरी के कम बिज़नेस का ही मजाक उड़ा दिया.

इन सबके अलावा भी फेसबुक के मॉडल में कई समस्याएं हैं. ज़करबर्ग सीनेट के सामने तोते की तरह रट रहे थे कि वो फेसबुक सबको फ्री में उपलब्ध करवाते हैं. इसके लिए वो ऐड लेते हैं. लेकिन सच ये है कि फेसबुक फ्री कंटेंट की रीच जानबूझकर कम करता है. आप किसी भी पेज को लाइक करें, सेटिंग में जाकर सी फर्स्ट करते हैं मगर फिर भी उस पेज की पोस्ट आपको न दिखें, ये संभव है. फेसबुक फ्री नहीं है बस फर्क इतना है कि आपको अपना डेटा देना पड़ता है और कंपनियों को अपना बिज़नेस. फेसबुक में फ्री में किसी बिज़नेस को रीच न दे इसमें तकनीकी रूप से कोई गलती नहीं. लेकिन समस्या ये है कि न लाइक करने वाले और न कंपनी को ये पता होता है कि उसके ग्राहकों तक उसकी ये सूचना पहुंच रही है या नहीं. और ये सारा गड़बड़ झाला 'फेसबुक सबके लिए फ्री है' के नाम पर होता है.

फेसबुक जिस तेजी से ताकतवर हो रहा है. ताकतवर से ज्यादा ज़ोर-जबरदस्ती पर उतरा है उसमें इस तरह का ब्रेक लगना जरूरी था. फेसबुक इससे कैसे निपटेगा और निपट पाएगा भी नहीं, कहा नहीं जा सकता. लेकिन अगर फेसबुक की रफ्तार इसी तेजी से बढ़ती. ये भ्रम बना रहता कि आज की तारीख में बिना फेसबुक बिज़नेस नहीं चल सकता तो फेसबुक किसी भी तानाशाह और ड्रग एडिक्शन के मिलेजुले असर से ज्यादा मुश्किलें पैदा करता.

टेक की दुनिया बहुत तेजी से बदलती है. 2008 में नोकिया तकनीकी दुनिया की सबसे ताकतवर कंपनी थी. कहा जा रहा था कि इस जायंट कंपनी की बादशाहत को कोई चुनौती नहीं दे सकता. आज नोकिया का अपना कोई वजूद नहीं बचा. यही हाल ब्लैकबेरी का हुआ. इसी दिशा में माइक्रोसॉफ्ट बढ़ रहा है, जिसकी ऑपरेटिंग सिस्टम की बादशाहत को गूगल ने देखते ही देखते खत्म कर दिया. आने वाले समय में क्या होगा पता नहीं मगर मार्क ज़करबर्ग को याद रखना चाहिए कि karma is a bitch.

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