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साउथ एशिया सैटेलाइट: भारत के लिए क्यों जरूरी है 'स्पेस डिप्लोमेसी'?

साउथ एशिया सैटेलाइट लॉन्च से क्या सच में चीजें बदलेंगी?

Tulika Kushwaha Updated On: May 06, 2017 03:43 PM IST

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साउथ एशिया सैटेलाइट: भारत के लिए क्यों जरूरी है 'स्पेस डिप्लोमेसी'?

भारत ने 5 मई को पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र को अपनी तरफ से एक बड़ा तोहफा दिया और स्पेस डिप्लोमेसी में खास जगह हासिल कर ली.

इसरो ने श्रीहरिकोटो प्रक्षेपण केंद्र से साउथ एशिया सैटेलाइट लॉन्च किया. इस प्रोजेक्ट से पाकिस्तान को छोड़कर बाकी सभी सार्क देशों नेपाल, मालदीव, अफगानिस्तान, श्रीलंका, भूटान, बांग्लादेश को फायदा पहुंचेगा.

 जरूरी बातें

पीएम ने 2014 में नेपाल में हुए सार्क सम्मेलन में ही इस प्रोजेक्ट की घोषणा कर दी थी. तब इस प्रोजेक्ट से पाकिस्तान को छोड़कर बाकी सभी देश जुड़े थे. इस प्रोजेक्ट में SAARC (साउथ एशियन असोसिएशन फॉर रीजनल को-ऑपरेशन) देश शामिल हैं.

भारत इस प्रोजेक्ट पर पिछले 3 सालों से लगा हुआ था. इस प्रोजेक्ट पर अब तक 235 करोड़ खर्च हुए हैं. 2,230 किलो का यह उपग्रह पूरी तरह संचार उपग्रह है और इसके लिए भारत किसी भी देश से कोई शुल्क नहीं लेगा. इसे जीसैट-9 रॉकेट से लॉन्च किया गया.

ये सेटेलाइट नेचुरल रिसोर्स मैपिंग, टेलीमेडिसिन, एजुकेशन, कम्यूनिकेशन, पीपुल टू पीपुल कॉन्टैक्ट पर बहुत सारी जानकारी और सुविधाएं देगा. साउथ एशिया सेटेलाइट का अंतरिक्ष में जीवन लगभग 12 सालों का होगा.

भारत के लिए क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

ऐसे दौर में जब साउथ एशिया में चीन का प्रभुत्व बढ़ रहा है, ऐसे में भारत का उपमहाद्वीप के दूसरे देशों से गहरे कूटनीतिक रिश्ते बढ़ाना जरूरी हो जाता है.

पिछले फरवरी की 15 तारीख को भारत ने एक साथ 104 सेटेलाइट लॉन्च करके इतिहास रचा था. पूरी दुनिया ने इस बात की तारीफ की थी. अब तक सबसे ज्यादा सेटेलाइट (37) एक साथ लॉन्च करने का रिकॉर्ड रूस के नाम था.

चीन की मौजूदगी है चिंता का विषय

हालांकि, साउथ एशिया सैटेलाइट की घोषणा से पहले ही इस गेम में एंट्री कर चुका है. चीन और अफगानिस्तान के बीच भी एक समझौता हुआ है. चीन अफगानिस्तान की इंटरनेट कनेक्टिविटी सुधारने के लिए काम कर रहा है. इसके लिए चीन 4,800 किमी लंबा फाइबर ऑप्टिक लाइन बिछाएगा. ये चीन के काशगर से अफगानिस्तान के फैजाबाद तक फैला होगा.

इसके साथ ही चीन ने अफगानिस्तान के सामने अप्रत्याशित रूप से एक सैटेलाइट लॉन्त का प्रस्ताव भी रखा. उन्होंने कहा कि वो अफगानसैट-2 नाम का सैटेलाइट बनाएंगे और लॉन्च करेंगे.

हालांकि ये बात याद रखने वाली है कि अफगानसैट-2 को इसरो और यूरोपियन एयरोनॉटिक डिफेंस एंड स्पेस कंपनी ने मिलकर तैयार किया था और ये 2020 तक काम करेगा.

साउथ एशिया सैटेलाइट के जरिए भारत ने अफगानिस्तान को बस कुछ ट्रांसपोंडर दिए हैं लेकिन चीन उन्हें पूरा का पूरा एक सैटेलाइट दे रहा है. तो साफ है कि चीन किसी भी तरह से अपनी मौजूदगी को कम नहीं होने देना चाहता.

ऐसे में हमारा असली मुकाबला तो चीन से ही है. और जिस तरह हर राजनैतिक, कूटनीति और आर्थिक मोर्चे पर चीन ने भारत के खिलाफ जिद्दी रुख अपना रखा है उसके लिए हमारी हर छोटी से छोटी कोशिश मायने रखती है.

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