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ग्लोबल वॉर्मिंग रोकने के लिए सूरज की रोशनी कम करने का आइडिया कैसा है?

वैज्ञानिक धरती पर ग्लोबल वॉर्मिंग के प्रभाव को कम करने के लिए सूरज की रोशनी कम करने की संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं

FP Staff Updated On: Apr 04, 2018 04:54 PM IST

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ग्लोबल वॉर्मिंग रोकने के लिए सूरज की रोशनी कम करने का आइडिया कैसा है?

दुनिया के कुछ देश भले ही ग्लोबल वॉर्मिंग को काल्पनिक समस्या समझते हों लेकिन ये विश्वव्यापी समस्या है. इस समस्या को थामने के लिए कोशिशें जारी हैं लेकिन अब वैज्ञानिक एक बिल्कुल लीक से हटकर या लीक का उल्टा कह लीजिए, समाधान के बारे में सोच रहे हैं. वैज्ञानिक धरती पर ग्लोबल वॉर्मिंग के प्रभाव को कम करने के लिए सूरज की रोशनी कम करने की संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं.

एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, विकासशील देशों के वैज्ञानिक क्लाइमेट चेंज की रोकथाम करने के लिए ये रिसर्च शुरू करने की योजना बना रहे हैं कि ग्लोबल टेंपरेचर को कम करने के लिए सूरज की रोशनी करने कम करने के लिए मानव-निर्मित केमिकल का इस्तेमाल हो सकता है या नहीं.

अमीर देशों, हार्वर्ड और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में सोलर जियो इंजीनियरिंग के तहत बड़ी ज्वालामुखी जैसे विस्फोट करने और सूरज को राख से ढंककर उसकी रोशनी को कम करने की हाइपोथिसिस पर रिसर्च कर रहे हैं.

सोलर जियो इंजीनियरिंग पर अमीर देशों की ही प्रभुता बनी हुई है. भारत, बांग्लादेश, ब्राजील, थाईलैंड, इथियोपिया, जमैका और चीन के 12 विशेषज्ञों ने बुधवार को जर्नल नेचर में लिखा कि चूंकि ग्लोबल वॉर्मिंग से सबसे ज्यादा विकासशील देश प्रभावित होते हैं तो उन्हें भी इस रिसर्च में शामिल किया जाना चाहिए.

इन विशेषज्ञों ने बताया कि विकासशील देशों को इस प्रोजेक्ट के लिए ओपेन फिलॉन्थ्रोपी प्रोजेक्ट की ओर से 40,000 हजार डॉलर दिए जाएंगे. बांग्लादेश सेंटर फॉर एडवांस्ड स्टडीज के हेड अतीक रहमान ने कहा कि अभी इस बारे में कुछ नहीं कहा जा रहा कि जियो इंजीनियरिंग काम करेगी या नहीं. इस संबंध में कई तरह के विचार दिए जा रहे हैं. इनमें से एक है कि प्लेन से धरती के वातावरण में रिफ्लेक्टिव सल्फर कणों के बादल बनाए जाएं, लेकिन ये कितना मददगार या कितना नुकसान पहुंचाने वाला होगा, इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता.

लेकिन इस संबंध में यूएन के विचार भी नकारात्मक ही हैं. एक लीक रिपोर्ट में यूएन ने आशंका जताई थी कि ये काफी नुकसान पहुंचा सकता है. इससे मौसम के पैटर्न में बदलाव आ सकता है, एक बार शुरू होने के बाद रोकना मुश्किल हो सकता है. और साथ ही देश जीवाश्म ईंधन छोड़कर दूसरे विकल्पों पर विचार भी करना छोड़ देंगे.

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