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इस 'भगवान' से थोड़ा डरना भी चाहिए

यूजर्स के डेटा का अपार भंडार गूगल के पास है, उसके साथ थोड़ी भी छेड़खानी करोड़ो लोगों की जिंदगी परेशानी में डाल सकती है

Piyush Pandey Updated On: Jun 28, 2017 06:59 PM IST

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इस 'भगवान' से थोड़ा डरना भी चाहिए

दुनिया के सबसे बड़े सर्च इंजन गूगल की तुलना अब भगवान से की जाने लगी है, जिसके पास हर सवाल का जवाब है. लेकिन ये भगवान ही एक बार फिर कठघरे में है.

यूरोपियन यूनियन ने गूगल पर इंटरनेट सर्च इंजन का दुरुपयोग कर उसकी नई शॉपिंग सर्विस को फायदा पहुंचाने के आरोप में 1.1 बिलियन यूरो यानी लगभग 120 करोड़ डॉलर का जुर्माना लगाया है.

समाचारपत्र 'द गार्जियन' के मुताबिक, यूरोपीय संघ के अधिकारी आगामी हफ्तों में गूगल को बाजार पर आधिपत्य जमाने का दोषी होने की घोषणा कर सकते हैं. इतना ही नहीं, ईयू गूगल से उसके सर्च इंजन में बदलाव की मांग भी कर सकता है, जिससे सर्च रिजल्ट में वह अपनी सेवा के लिए पक्षपाती न दिखे.

लेकिन सवाल सिर्फ इस घटना की वजह से गूगल से डरने का नहीं है. आज गूगल के पास यूजर्स की इतनी अधिक जानकारी है कि उनके दुरुपयोग की कोई भी घटना एक साथ करोड़ों लोगों के जीवन में उथल-पुथल मचा सकती है.

खास बात यह कि सिर्फ 20 साल के भीतर गूगल दुनिया की सबसे शक्तिशाली इंटरनेट कंपनियों में एक हो गई है, और आज इसे पछाड़ता कोई नहीं दिखता.

सर्च इंजन के बाजार में गूगल का आज कोई मुकाबला नहीं. जुलाई 2016 में गूगल का सर्च इंजन के 89.38 फीसदी हिस्से पर कब्जा था, जबकि याहू महज 3.37 फीसदी हिस्सा ही ले पाया था. गूगल सर्च इंजन के गर्भ में हर सवाल का जवाब दिखता है.

यूं देखने का एक नजरिया लेखक निकोलर कार जैसे लेखकों का भी है. निकोलस ने 2008 में 'द एटलांटिक मंथली' में 'क्या गूगल हमें बुद्धू बना रहा है' शीर्षक से एक लेख लिखा था. उन्होंने लिखा था कि गूगल के जरिए हमें सूचनाएं तो बहुत तेजी से मिल जाती हैं, लेकिन यह हमें इस बात के लिए उकसाता है कि हम किसी बात पर ज्यादा न सोचें.

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नि:संदेह निकोलस के तर्क बिलकुल गलत नहीं है. इसकी पुष्टि करते हैं गूगल से पूछे जाने वाले अजीबोगरीब प्रश्न. मसलन-भारत में 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जैसे ही 500 और 1000 के पुराने नोट पर पाबंदी का ऐलान किया, वैसे ही गूगल से हजारों लोगों ने एक ही सवाल पूछना शुरू किया-काले धन को सफेद कैसे किया जाए. मानो गूगल न हो-आपका चार्टेड एकाउंटेंट हो.

इसमें कोई दो राय नहीं कि गूगल ने सर्च तकनीक को लगातार विकसित किया और इस स्थिति में पहुंचा दिया कि पलक झपकते ही 90 फीसदी तक सटीक जानकारी हासिल की जा सके. सर्च इंजन पर लगातार प्रयोग हो रहे हैं और गूगल इस कोशिश में है कि आपको सीधे सवाल के जवाब तक ले जाए ना कि पेजों तक.

प्रयोगधर्मिता और बाजार की नब्ज समझने की विशेषज्ञता का लाभ भी गूगल को मिल रहा है. गूगल की आय 2001 में महज 7 मिलियन अमेरिकी डॉलर थी, जो 2015 में बढ़कर 16.35 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई. लेकिन मुद्दा आय या मुनाफे का नहीं इंटरनेट की दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी की विश्वसनीयता का है. मुद्दा गूगल की महात्वाकांक्षाओं का है और मसला गूगल के एकाधिकार का है.

दुनिया भर की कई कंपनियों और संगठनों को गूगल की सर्च प्रणाली पर शक है. सीनेट भी गूगल से सवाल कर चुका है. गूगल सर्च इंजन के नतीजे लोगों के फैसले लेने में इतने अधिक अहम हो गए हैं कि उन कंपनियों की चिंता स्वाभाविक है, जो कभी रैंकिंग में जगह नहीं बना पातीं.

निश्चित तौर पर गूगल सर्च के नतीजे एक झटके में छोटी कंपनी को बड़ी बना सकते हैं, और बड़ी को करारा झटका दे सकते हैं. यानी नतीजों का खेल बहुत खतरनाक है. गूगल के कुछ दूसरे फैसले लगातार उसे सवालों के घेरे में खड़ा कर रहे हैं. कनाडा फार्मेसियों के विज्ञापनों को संयुक्त राज्य अमेरिका में उपभोक्ताओं को दिखाए जाने के मामले में भी गूगलइंक पर 500 मिलियन डॉलर का जुर्माना लगाया गया था.

गूगल की कारोबारी महात्वाकांक्षा बाजार में उसके प्रभुत्व को बनाए रखने में मददगार है, लेकिन चिंताजनक भी है. इसकी एक झलक इंटरनेट पर वेब पतों का प्रबंधन देखने वाली संस्था इंटरनेट कॉर्पोरेशन फॉर असाइंड नेम्स एंड नंबर यानी आईसीएएनएन द्वारा जारी उच्च स्तरीय डोमेन नामों की सूची में भी दिखी. सूची से साफ हुआ था कि इंटरनेट की जमीन को जोतने के लिए गूगल सबसे ज्यादा बेचैन है यानी गूगल सबसे ज्यादा डोमेन अपने नाम करना चाहता है.

इंटरनेट पर गूगल का वर्चस्व साफ दिखाई देता है. सर्च इंजन गूगल और ईमेल सेवा 'जीमेल' से लेकर वीडियो शेयरिंग साइट यूट्यूब और सोशल नेटवर्किंग साइट गूगल प्लस जैसी तमाम प्रमुख साइटों पर गूगल का कब्जा है. लोकप्रिय मोबाइल ऑपरेटिंग सॉफ्टवेयर एंड्रॉयड गूगल का है. इंटरनेट पर अलग-अलग क्षेत्रों की कई कंपनियों को हाल में गूगल ने खरीदा है. आलम यह है कि गूगल के बारे में कहा जा रहा है कि वो हर दिन दुनिया की किसी एक इंटरनेट/सॉफ्टवेयर कंपनी को खरीद रहा है. इंटरनेट और टीवी की सुविधा देने वाला गूगल टीवी बाजार में लॉन्च हो चुका है.

नई इंटरनेट अर्थव्यवस्था में तमाम बड़ी कंपनियों के लिए यूजर्स से जुड़ी सूचनाएं ही सबसे बड़ी पूंजी है. फेसबुक, गूगल, याहू सभी को इस श्रेणी में रखा जा सकता है. गूगल के पास तो इतना डाटा है कि उसका दुरुपयोग लगभग तबाही मचा सकता है और गूगल ही निजता के हनन का सवाल भी खड़ा करता है.

निजता का सवाल अचानक बहस के केंद्र में तब आया, जब एक अमेरिकी कंज्यूमर वाचडॉग ने एक मुकदमे के दौरान गूगल के बयान को आधार बनाते हुए यह दावा किया था. इस मामले में गूगल पर आरोप लगाया गया था, ' गूगल गैरकानूनी तरीके से लोगों के निजी मेल खोलता, पढ़ता और उसका कंटेंट संग्रहित करता है.'

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इस मुकदमे में दावा किया गया था, 'करोड़ों लोगों की जानकारी से बाहर, नियमित तौर पर गूगल ने कई साल से लोगों के निजी संदेशों को जानबूझकर एवं दक्षतापूर्वक पढ़ने की अपनी लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन किया है. वो संदेश, जिन्हें लोग किसी तीसरे व्यक्ति के साथ बांटना नहीं चाहते.'

गूगल ने इस मामले को खारिज करने की अपील करते हुए कहा था, 'ईमेल के सभी यूजर्स को पूरी तरह यह विश्वास करना चाहिए कि उनके मेल ऑटमेटेड प्रोसेसिंग से गुजरते हैं.' लेकिन गूगल ने यह भी कह दिया, 'जिस तरह अपने किसी कारोबारी साथी को खत लिखते हुए लेखक को हैरान नहीं होना चाहिए कि उसका खत कारोबारी साथी के सहायक भी पढ़ सकते हैं, उसी तरह जो लोग वेब मेल उपयोग में लाते हैं, उन्हें इस बात से हैरान नहीं होना चाहिए कि उनका मेल प्राप्तकर्ता के इलेक्ट्रॉनिक कम्यूनिकेशंस सर्विस प्रोवाइडर द्वारा प्रोसेस किया जाए.' इस जवाब का सीधा मतलब भले कुछ ना निकाला जाए लेकिन कंज्यूमर वाचडॉग का कहना है कि अगर आप जी-मेल पर अपनी निजता को लेकर चिंतित हैं तो जी-मेल का इस्तेमाल बंद कीजिए.

जाहिर है गूगल का एकाधिकार महत्वपूर्ण प्रश्न है. लेकिन, इस लड़ाई के बीच हम क्या करें? बड़ा सवाल यही है कि क्या हमारे पास दूसरे बेहतर विकल्प हैं?

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