S M L

नामुमकिन है EVM को हैक करना, जानिए क्यों?

विदेशी ईवीएम से अलग हैं भारत की मशीनें क्योंकि विदेशी ईवीएम जहां नेटवर्क से जुड़ी होती हैं वहीं भारतीय मशीनें बिल्कुल ऑफलाइन कार्य करती हैं

Updated On: Mar 11, 2018 03:47 PM IST

FP Tech

0
नामुमकिन है EVM को हैक करना, जानिए क्यों?
Loading...

चुनावों के नतीजे आते ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है. सवाल है क्या एवीएम के साथ छेड़छाड़ संभव है? चुनाव आयोग इस आशंका को हमेशा खारिज करता रहा है. द हिंदू में छपी एक रिपोर्ट में आइए जानते हैं क्या है इस मशीन की पूरी सच्चाई, वह भी सिस्टम की पूरी जानकारी के साथ.

क्या संभव है ईवीएम से छेड़छाड़?

विदेशी ईवीएम से जुदा हैं भारत की मशीनें क्योंकि बाहर की ईवीएम जहां नेटवर्क से जुड़ी होती हैं तो भारतीय मशीनें बिल्कुल ऑफलाइन चलती हैं. ईवीएम नेटवर्क से जुड़ी नहीं होगी तो उसमें छेड़छाड़ की संभावना नहीं बनती.

क्या चिप या ब्लूटूथ से जोड़ सकते हैं?

ऐसा अगर होता है तो ईवीएम के सुरक्षा मानकों का यह उल्लंघन माना जाएगा. एम3 मशीनों में चिप या ब्लूटूथ नहीं जोड़ सकते क्योंकि ऐसा करते ही मशीनें अपने आप बंद हो जाती हैं.

ईवीएम दो सरकारी कंपनियां-भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लि. और इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया बनाती हैं. जबकि माइक्रोचिप बनाने वाली कंपनियों को मशीन देने से पहले उसमें सॉफ्टवेयर प्रोग्राम को कोड भाषा में डाल दिया जाता है. बाद में डाले गए सॉफ्टवेयर की पूरी निगरानी में जांच होती है. चुनावी इलाकों में मशीनें भेजी जाती हैं जिसमें अल्फाबेट क्रम में उम्मीदवारों के नाम और चिन्ह डाले जाते हैं. मशीन बनाने के स्तर पर गड़बड़ी तभी होगी जब ईवीएम में पहले से कोई ट्रोजन हो जो किसी खास उम्मीदवार को वोट ट्रांसफर कर दे. ऐसा होना संभव नहीं है क्योंकि कौन सी मशीन किस इलाके में भेजी जाएगी और वहां किस उम्मीदवार का नाम किस क्रम में होगा, यह तय नहीं होता. अब तो वीवीपैट मशीनें भी आने लगी हैं जिससे वोटर अपना वोट कहां दिया, इसे जान सकते हैं.

बैलट पेपर के बदले ईवीएम क्यों

बैलट पेपर से कई मामलों में अच्छी हैं ईवीएम मशीनें खासकर बात जब बोगस वोटों की हो. द हिंदू में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि देश में लगभग 36 हजार सीटों में 300 ऐसी हैं जहां पड़े बोगस वोट पूरे जनादेश की तस्वीर बिगाड़ सकते थे, लेकिन ईवीएम मशीनों से यह सिलसिला रुका है. इतना ही नहीं, इन मशीनों ने वोटों की हेराफेरी रोक कर मतदान को ज्यादा सुरक्षित और पारदर्शी बनाया है.

मशीनों का कब, कैसे उपयोग

मशीनों को मतदान में भेजने से पहले कई काम होते हैं. आईए जानते हैं तफ्तीश से.

- मशीनों को साफ किया जाता है, रिजल्ट क्लियर किए जाते हैं, स्विच, बटन और केबल की पूरी जांच होती है.

- मशीनें जाने से पहले मॉक मतदान किया जाता है. 16 कैंडिडेट के बटन को दबाकर एक-एक वोट की जांच होती है. अगर वीवीपैट का प्रयोग हुआ है तो हरेक कैंडिडेट के लिए छह वोट दिए जाते हैं और रिजल्ट की जांच होती है.

- रैंडम टेस्ट के तहत 5 फीसद मशीनों की जांच की जाती है. लगभग एक हजार वोट देकर रिजल्ट के प्रिंटआउट अलग-अलग पार्टियों के प्रतिनिधियों को भेजे जाते हैं.

- मशीन के बैलट पेपर स्क्रिन में उम्मीदवारों के नाम, चुनाव चिन्ह, पार्टी के नाम आदि डालकर बैलट यूनिट को बंद कर दिया जाता है.

- बैलट यूनिट को कंट्रोल यूनिट से जोड़ दिया जाता है. कंट्रोल यूनिट को खोलकर कैंडिडेट सेट बटन दबाया जाता है. उसके बाद अंतिम कैंडिडेट के बटन को दबाया जाता है. इससे पता चलता है कि इस मशीन में कितने उम्मीदवारों के नाम दर्ज हैं.

- मतदान शुरू होने से पहले छद्म मतदान (मॉक पोल) होता है. कैंडिडेट या उसके एजेंट के सामने कम से कम 50 वोट डालकर देखे जाते हैं. मॉक पोल बंद कर नतीजे दिखाए जाते हैं.

- मतदान के दिन पोलिंग एजेंट, पर्यवेक्षक और अर्धसैनिक बल के अधिकारियों के सामने मशीन की चेकिंग की जाती है.

- मतदान समाप्त होने के बाद कंट्रोल यूनिट पर क्लोज का बटन दबा देते हैं. कुल वोटों की गिनती नोट की जाती है. मोहर लगाने के बाद उनका नंबर नोट किया जाता है.

- मशीनों को उनके बक्से में रखा जाता है. पुलिस बल की मौजूदगी में मशीनें रिसेप्शन सेंटरों को भेजी जाती हैं और स्ट्रॉन्ग रूम में रखी जाती हैं.

EVM-Election

मशीन के तीन अलग-अलग मॉडल

एम1

- 1989-2006 मे बनाई गई

- इसका पिछला उपयोग 2014 के चुनाव में

- वीवीपैट नहीं

एम2

- 2006-2012 में बनाई गई

- इनक्रिप्शन, की प्रेस के साथ टाइम स्टैंपिंग

एम3

- 2013 के बाद बनाई गईं मशीनें

- 2018 तक 9 लाख नई मशीनें उपयोग में ली जाएंगी

- किसी भी छेड़छाड़ में अपने आप बंद हो जाती है और उसे खुद सही करती है.

0
Loading...

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
फिल्म Bazaar और Kaashi का Filmy Postmortem

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi