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भारतीय हॉकी कोच कौन आया, कौन गया (पार्ट 2) : करीब डेढ़ दशक में कोच की 'पराजय एकादश'

पार्ट 2 में जाने टेरी वॉल्श, माइकल नॉब्स, जोकिम कारवाल्हो से लेकर श्योर्ड मरीन्ये के आने और जाने की कहानी

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi Updated On: May 02, 2018 09:06 AM IST

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भारतीय हॉकी कोच कौन आया, कौन गया (पार्ट 2) : करीब डेढ़ दशक में कोच की 'पराजय एकादश'

पहले पार्ट में हमने राजिंदर सिंह सीनियर से वासुदेवन भास्करन की बात की. उसके बाद की कहानी के लिए दूसरा पार्ट

जोकिम कारवाल्हो

जोकिम का नाम भी घरेलू हॉकी में बहुत सम्मान से लिया जाता रहा है. धनराज पिल्लै के वो कोच रहे हैं. उनके साथ भारत ने चेन्नई में एशिया कप जीता. दिलचस्प था कि वहां हुए फाइनल को देखने के जितने लोग स्टेडियम के अंदर थे, उतने ही बाहर थे, जो अंदर घुसने की कोशिश कर रहे थे. ऐसा लगा, जैसे भारतीय हॉकी सही रास्ते पर आ रही है. ओलिंपिक क्वालिफाइंग आया. इसमें जोकिम ने अर्जुन हलप्पा और संदीप सिंह जैसे खिलाड़ियों को नहीं चुना. भारतीय टीम ओलिंपिक इतिहास में पहली बार क्वालिफाई करने में नाकाम रही. जोकिम को हटाने का श्रेय आईएचएफ को नहीं मिलेगा, क्योंकि इससे पहले ही भारतीय ओलिंपिक संघ ने आईएचएफ को सस्पेंड कर दिया.

होजे ब्रासा

स्पेन के ब्रासा को लाने का श्रेय एडहॉक कमेटी को जाता है, जो आईओए ने बनाई थी. ब्रासा को पहला प्रोफेशनल विदेशी कोच कहा जा सकता है. उस दौर में खेला हर खिलाड़ी अपने करियर में उनके योगदान को अच्छी तरह याद करता है. ब्रासा के समय खिलाड़ियों ने हड़ताल की. उसमें वो खिलाड़ियों के साथ खड़े दिखाई दिए. लेकिन एक बार एडहॉक कमेटी हटी और हॉकी इंडिया बनी, तो ब्रासा के लिए कोई जगह नहीं थी. ब्रासा के भारतीय खेल प्राधिकरण यानी साई के साथ भी रिश्ते कभी अच्छे नहीं रहे. यह भी उनके बाहर होने की वजह बना.

माइकल नॉब्स

जून 2011 में माइकल नॉब्स को कोच बनाया गया. बाकायदा इंटरव्यू हुए. इसमें रोलंट ओल्टमंस और जैक ब्रिंकमैन को पीछे छोड़कर ऑस्ट्रेलियाई नॉब्स कोच बने. उनके समय में भारतीय खिलाड़ियों की फिटनेस बेहतर हुई. लेकिन इसका श्रेय नॉब्स के बजाय फिजियो डेविड जॉन को जाता है, जो अभी भारतीय हॉकी में हाई परफॉर्मेंस डायरेक्टर हैं. खिलाड़ियों ने खाने-पीने, एक्सरसाइज को लेकर प्रोफेशनल रवैया अपनाया. लेकिन नॉब्स की कोचिंग को लेकर टीम और टीम के बाहर, ज्यादातर लोगों की राय अच्छी नहीं रही.

भारतीय टीम 2012 लंदन ओलिंपिक में 12वें नंबर पर आई. इसके बाद तय हो गया कि नॉब्स जाएंगे. हालांकि वो अगले साल जुलाई तक पद पर बने रहे. उन्हें हटाए जाने की वजह स्वास्थ्य से जुड़ी बताई गई. लेकिन सब जानते थे कि उन्हें प्रदर्शन के आधार पर हटाया गया है. खास बात यह रही कि नॉब्स ने उस तरह भारतीय सिस्टम की आलोचन नहीं की, जिस तरह बाकी विदेशी कोच करते रहे हैं.

टेरी वॉल्श

अक्टूबर 2013 में टेरी वॉल्श को लाया गया, जो दुनिया भर में बहुत सम्मानित कोच माने जाते रहे हैं. वॉल्श ने भारतीय हॉकी को बदलने का भी काम किया. टीम ने आक्रामक रुख अपनाना शुरू किया, जो भारतीय हॉकी की पहचान रही है. भारतीय टीम बेहतर होती नजर आ रही थी, जिस वक्त वॉल्श का हॉकी इंडिया के साथ विवाद शुरू हुआ. साई के साथ पैसों को लेकर भी विवाद हुआ. वॉल्श के साथ भारत ने एशियाई खेलों में स्वर्ण जीता. लेकिन विवादों के बाद वॉल्श को हटाए जाने का फैसला किया गया. अक्टूबर 2014 में वॉल्श बाहर हो गए. उन्होंने भी जाते-जाते कहा कि भारत में ऐसे लोग खेल चला रहे हैं, जिन्हें खेलों के बारे में कुछ नहीं पता है.

पॉल वान आस

जनवरी 2015 में डच कोच पॉल वान आस भारतीय टीम के साथ जुड़े. लेकिन चंद महीनों में ही उन्हें हटाए जाने का फैसला हुआ. कहा जाता है कि हॉकी वर्ल्ड लीग सेमीफाइनल के दौरान उनका हॉकी इंडिया के अध्यक्ष नरिंदर बत्रा से झगड़ा हुआ था. एंटवर्प में हुए उस झगड़े के बाद उन्हें हटाए जाने का फैसला किया गया. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि रोलंट ओल्टमंस ने उन्हें फोन करके हटाए जाने की जानकारी दी.

रोलंट ओल्टमंस

पॉल वान आस को हटाए जाने के बाद सवाल था कि अब कौन कोच बनेगा. जुलाई आ चुका था. यानी ओलिंपिक में महज एक साल बचा था. उस वक्त तय किया गया कि ओल्टमंस, जो 2013 से हाई परफॉर्मेंस डायरेक्टर थे, उन्हें चीफ कोच बनाया जाए. ओल्टमंस के बारे में कहा जाने लगा कि वो काफी हद तक भारतीय सिस्टम में ढल गए हैं.

जिस वक्त टेरी वॉल्श और पॉल वान आस के साथ हॉकी इंडिया और साई का विवाद बढ़ रहा था, ओल्टमंस ने सिस्टम के साथ होने का फैसला किया. हालांकि वॉल्श और वान आस को लाने में उनका बड़ा रोल था. उसके बावजूद वो हॉकी इंडिया और साई के साथ खड़े दिखाई दिए. ओलिंपिक में भारतीय टीम ने कुछ खास नहीं किया. लेकिन माना जाना चाहिए कि जिस प्रोसेस को बेहतर करने की बात ओल्टमंस करते रहे, उसमें जरूर सुधार हुआ.

आखिर ओल्टमंस के दिन भी पूरे हुए, जब डेविड जॉन को हाई परफॉर्मेंस डायरेक्टर बनाया गया. डेविड जॉन के साथ विवाद हुआ. यहां तक कि यूरोपियन टुअर के लिए टीम चुनते वक्त उनसे सलाह तक नहीं ली गई. यही पर ओल्टमंस की विदाई तय हो गई थी. कहा जा रहा है कि नरिंदर बत्रा के साथ भी उनका विवाद हुआ. हालांकि बत्रा अब हॉकी इंडिया से जुड़े नहीं हैं. वो एफआईएच यानी इंटरनेशनल हॉकी फेडरेशन के अध्यक्ष हैं.

श्योर्ड मरीन्ये

मरीन्ये को महिला टीम का कोच बनाया गया था. उसके बाद जब तय हुआ कि ओल्टमंस को जाना होगा, तब मरीन्ये को लाने का फैसला हुआ. इस फैसले में मरीन्ये की काबिलियत पर साई को तरजीह मिली. साई ही कोच की सैलरी देता है. ऐसे में उनके सामने यह पक्ष रखा गया कि मरीन्ये को लाने से कितने पैसे बचाए जा सकते हैं. मरीन्ये कभी स्तरीय कोच नहीं थे. यह क के बाद एक टूर्नामेंट में साबित हुआ. आखिर कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक न जीत पाने का ठीकरा उन पर फूटा. उन्हें पुरुष टीम से हटाकर फिर से महिला टीम दे दी गई.

इस तरह भारतीय हॉकी के डेढ़ दशकों ने 11 कोच का आना और जाना देखा है. अगर इनमें स्टॉप गैप अरेंजमेंट वाले लोगों को भी जोड़ें, तो नंबर और बढ़ जाते हैं.

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