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बीसीसीआई से शुरुआत, अब बाकियों की बारी

खेलों में गंदगी खत्म करने का काम करेगा अदालत का फैसला

Kirti Azad Updated On: Jan 03, 2017 01:20 PM IST

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बीसीसीआई से शुरुआत, अब बाकियों की बारी

वर्षों से बीसीसीआई ने खुद को बिगड़ैल बच्चे जैसा बना लिया था. उन्हें हमेशा जड़हीन और गैर जिम्मेदार राजनेताओं का साथ मिला. रणनीतिक कुटिलता वाले वकीलों का साथ मिला. बहुत पहले वे समझने लगे थे कि देश के कानून से ऊपर हैं. कुछ वकील और नेता उन्हें उकसा रहे थे कि देश की सर्वोच्च अदालत से भी भिड़ जाएं. लेकिन शुक्र है कि उनकी उद्दंडता पर लगाम लग गई.

पिछली जनवरी और 18 जुलाई 2016 को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई को मौके दिए. उनसे कहा कि लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों को मानने में आ रही अड़चनों पर अपनी बात रखें. एक-एक सुनवाई के लाखों रुपये वसूल रहे वकीलों ने एक ही राग अलापा– हम स्वतंत्र संघ हैं और संविधान के सेक्शन 19 (1) (सी) के तहत हमें अधिकार मिले हैं. इसलिए आप हमें मजबूर नहीं कर सकते.

आम आदमी हैरत में था कि इस तरह बीसीसीआई अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मानने से कैसे इनकार कर सकते हैं. आखिरकार माननीय सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई की अवमानना के सिलसिले का अंत किया है. लोढ़ा पैनल और बीसीसीआई के बीच चल रहा यह दौर आखिर खत्म हुआ है. अदालत ने देश में क्रिकेट प्रशासन को लेकर फैसला किया है. एक झटके में बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर को हटा दिया गया है.

आदेश न मानने की मिली सजा

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश के तहत कहा कि अनुराग ठाकुर और अजय शिर्के आदेश का पालन नहीं कर रहे हैं, इसलिए उन्हें हटाया जाता है. यह भी ताज्जुब की बात नहीं थी कि अनुराग ठाकुर को अदालत की अवमानना का नोटिस जारी किया गया. उन पर गलत हलफनामा दायर करने का आरोप था. दिलचस्प है कि चार बार के सांसद को अगर नहीं पता कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान करना होता है, तो किसको पता होगा.

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कीर्ति आज़ाद

आदेश न मानने वाले राज्य यूनिट और बीसीसीआई के पदाधिकारियों को अब लोढ़ा पैनल की बात माननी होगी या अपना पद छोड़ना होगा. फैसले को लागू करने में सीता और गीता के डबल रोल की वजह से दिक्कत हो रही थी. एक रोल राज्य संघ में और दूसरा बीसीसीआई में. बीसीसीआई असहाय दिखते हुए दावा कर रहा था कि राज्य यूनिट बीसीसीआई की बात सुनने को तैयार नहीं हैं. बीसीसीई में टॉप पर ज्यादातर वो लोग हैं, जो किसी न किसी राज्य संघ में भी बॉस हैं. इसके बावजूद माननीय सुप्रीम कोर्ट को ये भरोसा दिलाने की कोशिश करते रहे कि वे असहाय हैं.

अब बीसीसीआई के हर पदाधिकारी और राज्य संघ को सुनिश्चित करना पड़ेगा कि लोढ़ा कमेटी की सिफारिशें लागू करें. माननीय सुप्रीम कोर्ट अब दो सप्ताह के भीतर ऑब्जर्वर नियुक्त करेगा. तब तक दो बोर्ड के दो सीनियर उपाध्यक्ष सारा कामकाज चलाएंगे. सबसे सीनियर उपाध्यक्ष बीसीसीआई अध्यक्ष के तौर पर काम करेगा और संयुक्त सचिव को सचिव की तरह काम करना होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि प्रशासकों की कमेटी बीसीसीआई का कामकाज देखेगी. प्रशासकों के नाम फली नरीमन और गोपाल सुब्रमण्यम सुझाएंगे, जिनके बारे में 19 जनवरी को अदालत फैसला करेगी.

बाकी खेलों में भी सुधार की जरूरत

खेल प्रेमी भारतीय जनता और खिलाड़ी खेल में भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं. 27 ओलिंपियन, अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी और अर्जुन अवॉर्डी एक साथ आए हैं. मेजर ध्यानचंद के सुपुत्र  और दिग्गज हॉकी खिलाड़ी अशोक कुमार के नेतृत्व में माननीय सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है कि लोढ़ा पैनल की सिफारिशें सभी खेल संघों में लागू की जाएं. हमने भारतीय संविधान के आर्टिकल 14, 21, 19 (1) (जी) के तहत खिलाड़ियों के मौलिक अधिकारों की गारंटी मांगी है.

 

2001 में राष्ट्रीय खेल नीति बनी थी. खेलों से जुड़े तमाम बाधाओं को समझा गया था. उसके बाद 2007 में पॉलिसी बनी. इनमें कमियों की वजह से 2011 में केंद्र सरकार ने नेशनल स्पोर्ट्स डेवेलपमेंट कोड बनाया. माननीय दिल्ली उच्च न्यायल ने भारतीय ओलिंपिक संघ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में कहा कि मान्यता, मदद और भारत शब्द का इस्तेमाल करने के लिए कोड का पालन करने के लिए दोनों पक्ष बाध्य हैं. अदालत ने यह भी कहा कि भारत को विश्व स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है, ताकि एथलीट सही तैयारी कर पाएं. सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना ही काफी नहीं, इसकी सही देखभाल भी होनी चाहिए.

क्रिकेट के बहाने हमें पूरे खेल संस्कृति पर ध्यान देने की जरूरत है. खेल को बढ़ावा देने को लेकर मानव संसाधन विकास की संसदीय स्थायी समिति ने 185वीं रिपोर्ट में जिक्र किया है कि कैसे हमारे इंफ्रास्ट्रक्चर का सही इस्तेमाल नहीं हो पाता. हम बड़े-बड़े स्टेडियम और बाकी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करते हैं, जो सिर्फ राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय इवेंट कराने में इस्तेमाल होते हैं. बाकी समय ये स्टेडियम खाली पड़े रहते हैं या सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए इनका इस्तेमाल किया जाता है.

आमतौर पर लोगों को स्टेडियम में घुसने की इजाजत तक नहीं होती. इनकी देखभाल और सुरक्षा पर बहुत खर्चा होता है. नेशनल गेम्स के लिए भी शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाता है. साल में ज्यादातर समय वे बेकार पड़े रहते हैं. राज्यों के लिए उनकी देखभाल मुश्किल होती है.

खेल फेडरेशनों पर नहीं है लगाम

इसके अलावा, राष्ट्रीय खेल फेडरेशनों पर किसी तरह की लगाम नहीं है. चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होतीं. इसकी वजह से तमाम विवाद होते हैं, जो खेल के विकास में बाधा बनते हैं और भ्रष्टाचार का कारण होते हैं. मैंने कॉमनवेल्थ खेलों में भ्रष्टाचार का मुद्दा संसद में उठाया था. इसके बाद सीबीआई जांच हुई. कलमाडी को गिरफ्तार किया गया और दस महीने वह जेल में रहे. बैडमिंटन फेडरेशन ऑफ इंडिया में तमाम विवाद हैं. कबड्डी, कुश्ती, मुक्केबाजी, बास्केटबॉल, हॉकी जैसे फेडरेशन में भी विवाद रहे हैं.

मुझे भरोसा है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जो फैसला सुनाया है, वो खेलों में गंदगी को पूरी तरह खत्म करने का काम करेगा. मैं माननीय सुप्रीम कोर्ट का धन्यावाद करता हूं. उन्होंने बीसीसीआई की कार्यप्रणाली में में निष्पक्षता, पारदर्शिता और अखंडता लाने के लिए काम किया है. बाकी खेल फेडरेशनों को भी जल्दी ही इस तरफ आना होगा.

(लेखक कीर्ति आज़ाद 1983 की विश्व कप विजेता क्रिकेट टीम के सदस्य थे. वह लोकसभा सांसद हैं.)

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