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धार से हांगकांग तक, आसान नहीं रहा वर्मा का सफर

बार-बार लगी चोटों से उबरकर यहां तक पहुंचे हैं समीर वर्मा

Updated On: Nov 28, 2016 06:35 PM IST

Shirish Nadkarni

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धार से हांगकांग तक, आसान नहीं रहा वर्मा का सफर

वो 2012 का साल था, जब समीर वर्मा ने भारतीय अंडर-19 नेशनल चैम्पियनशिप जीत कर बैडमिंटन की दुनिया में अपनी मौजूदगी का अहसास कराय़ा था. लेकिन अगले तीन साल तक गोपीचंद का यह शिष्य तमाम ऐसी चोटों से जूझता रहा, जो करियर को खत्म करने का माद्दा रखती थीं. अपनी इन चोटों को याद करते हुए समीर बताते हैं कि किस तरह से साल 2012 में पीठ में एक भयानक चोट लगी, जिससे उबर कर जब उन्होंने फिर से खेलना शुरू किया तो फिर अगले ही साल ये चोट फिर उभर आई.

उसके बाद साल 2014 में समीर को टखने में एक नई चोट से दो-चार होना पड़ा. चोटें लगती गई और समीर उनसे लड़ते रहे. इन तमाम चोटों को धता बताते हुए समीर ने इस साल बैडमिंटन की दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित 12 चैम्पियनशिप्स में से एक हांगकांग ओपन में पुरुष सिगल्स के फाइनल तक का सफर तय किया. फाइनल तक के इस सफर में 43वीं विश्व रैंकिंग के खिलाड़ी समीर ने अपने से कहीं ज्यादा वाली रैंकिंग के खिलाड़ियों को मात दी जिनमें तीसरी रैंकिंग के खिलाड़ी योर्गेंसन भी शामिल हैं.

और भी कामयाबियां हैं समीर के नाम 

समीर की ये कोई पहली उपलब्धि नहीं है। इससे पहले वो इसी साल दुनिया के 11 वें नंबर के खिलाड़ी को मात देकर उन्होंने ऑल इंग्लैंड चौम्पियनशिप के प्री क्वार्टर तक का सफर भी तय किया। समीर बताते है कि इसके बाद अपने गुरु पुलेला गोपीचंद की सलाह पर वो नेशनल चैम्पियनशिप खेलने उतरे जहां अपने ही भाई और साल 2012 के नेशनल चैम्पियन रहे सौरभ को मात तक पुरुष सिंगल्स के नेशनल चैम्पियन बने.

मध्य वर्गीय परिवार से हैं समीर

22 साल के समीर और उनसे दो साल बड़े उनके भाई सौरभ इंदौर के पास एक छोटी सी जगह धार के रहने वाले है. मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले इन दोनों भाइयों ने अपना पिता के कहने पर ही बैडमिंटन को अपनाया है।

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साल 2012 में अंडर 19 चैम्पियन बनने से पहले ही समीर कॉमनवेल्थ यूथ गेम्स में गोल्ड मेडल जीत चुके थे. समीर के आदर्श उनके भाई सौरभ ही है. और समीर अपने भाई को तीन बार मात भी दे चुके हैं जिसमें इस साल की नेशनल चैम्पियनशिप के अलावा 2015 के बांग्लादेश ओपन और टाटा ओपन भी शामिल है. भाई के साथ अपनी ट्यूनिंग के लेकर समीर बताते हैं कि वो दोनों हर मुकाबले के बाद गेम के हर पहलू पर एक साथ चर्चा करते हैं.

गोपीचंद से मिली प्रेरणा

चोटों से जूझने के बाद समीर की इस वापसी में उनके कोच गोपीचंद की भूमिका भी खास है. साल 1996 में घुटने की चोट से उबर कर गोपीचंद ने 2001 में ऑल इंग्लैंड चैम्पियनशिप का खिताब अपने नाम किया था और और इसी बात ने समीर को सबसे ज्यादा प्रेरित किया.

लगातार लग रही चोटों के बाद समीर ने साल 2015 में 262 वीं रैंकिंग के साथ शुरुआत की थी. 2016 में समीर 35 से 45 के बीच की रैंकिंग वाले खिलाड़ी बन चुके हैं. इस दौरान उन्होंने कई नामचीन खिलाड़ियों को पटखनी दी है, जिनमें  वियतनाम के निग्वेन थिएन मिन्ह,चीन की वैंग जियेंगमिन, जापान के शो सासाकी और हंगकॉग के हू युन बी शामिल हैं. लेकिन अपने करियर के इस छोटे से सफर में समीर को  सबसे यादगार जीत हांगकांग ओपने में मिली जब उन्होंने दुनिया के नंबर तीन खिलाड़ी डेनमार्क के जॉन ओ योर्गेंसन को सीधे गेमों में 21-19, 24-22 से शिकस्त दी.

समीर के खेल से प्रभावित हैं गुरु गोपी

इस एक साल में समीर के शानदार प्रदर्शन से उनके कोच गोपीचंद भी खासे प्रभावित हैं. समीर के साथ-साथ उनके भाई सौरभ के खेल की प्रशंसा करते हुए गोपीचंद बताते हैं कि दोनों भाइयों का खेल बेहद उम्दा है. उनका मानना है कि समीर बहुत जल्दी सीखने वाले खिलाड़ी है और उनमें बड़े स्तर पर खेलने की क्षमता है और आने वाले सालों में वह और आगे जाएंगे.

समीर का हांगकांग ओपन के फाइनल में पहुंचना इसलिए भी बेहद खास हैं क्योंकि वह बीते 34 सालों में ये कारनामा करने वाले भारत के पहले पुरुष खिलाड़ी हैं. इससे पहले 1982 में प्रकाश पादुकोण ने फाइनल में पहुंचकर ये खिताब अपने नाम किया था.

सुपर सीरीज फाइनल में पहुंचने वाले दूसरे भारतीय पुरुष

समीर किसी भी सुपर सीरीज के फाइनल में पहुंचने वाले दूसरे भारतीय पुरुष खिलाड़ी बने हैं. उनसे पहले किदांबी श्रीकांत ने साल 2014 में चाइना ओपन और बीते साल इंडियन ओपन जीतकर ये मुकाम हासिल किया था.

नेट पर अपनी कलाइयों, चपलता और अपने आक्रामक खेल के साथ समीर अपनी विरोधी को गेम में गलतियां करने को मजबूर करते हैं. हालांकि समीर गोपीचंद आकादमी के अपने कई साथियों की तरह उतने ताकतवर स्मैश नहीं मार पाते.

गौर करने वाली बात ये है कि महज 22 साल के समीर शुरुआत में हांगकांग ओपन का हिस्सा नहीं थे. जब कुछ बड़े खिलाड़ियों ने अपने नाम वापस लिए तो समीर की इस चौम्पियनशिप में खेलने का मौका मिला. समीर ने लगातार चार जीत दर्ज करके फाइनल में अपनी जगह पक्की की. इनमें सेमीफाइनल में योर्गेंसन पर मिली जीत भी शामिल है.

फाइनल में समीर हांगकांग के एनजी का लोंग अंगस से हार गए. हार के बाद समीर ने अपने फेसबुक पेज पर  विरोधी खिलाड़ी की तारीफ भी की. साथ ही लिखा कि ये नतीजा उन्हें और ज्यादा मेहनत करने के लिए प्रेरित करेगा.

हांगकांग ओपन के फाइनल में भले ही समीर हार गए हों लेकिन इस पूरे हफ्ते अपने शानदार खेल से समीर ने ये साबित कर दिय़ा हैं कि अब बैडिमिंटन के फलक पर उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

 

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