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आसान नहीं था मीराबाई चानू का चैंपियन बनने का सफर !

मीराबाई चानू ने वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में रिकॉर्ड प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल जीता है

Riya Kasana Riya Kasana Updated On: Dec 01, 2017 03:04 PM IST

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आसान नहीं था मीराबाई चानू का चैंपियन बनने का सफर !

2016 रियो ओलिंपिक में भारत की और से भेजे गए सभी खिलाड़ियों से बहुत उम्मीदें थी. जिन खिलाड़ियों से देश पदक की उम्मीदें कर रहा था उनमें से एक थी मीराबाई चानू. वेटलिफ्टिंग में भारत का कई टूर्नामेंट्स में प्रतिनिधित्व करने वाली मीराबाई चानू को खुद पर भी भरोसा था कि वह भारत को पदक दिलाने में सफल होगी. लेकिन इसके बाद जो हुआ वह किसी ने नहीं सोचा था. स्नैच में वह तीन में से एक ही बार लिफ्ट कर पाई वहीं क्लीन एंड जर्क में वह तीनों प्रयासों में असफल रही. मीराबाई उन दो खिलाड़ियों में से थी इवेंट पूरा नहीं कर पाई. इस हार का भार चानू ने लंबे समय तक खुद पर महसूस करती रही.

बुधवार की रात जब भारत के लोग सो रहे थे तब चानू ने आखिरकार अपने जीवन की वह सुबह देखी जिसके लिए उन्होंने दो साल मेहनत की थी. वर्ल्ड वैटलिफ्टिंग चैंपियनशिप के 48 किग्रा वर्ग में चानू ने गोल्ड मेडल जीतकर दिखा दिया कि नामकामयाबी आपकी सफलता में एक रोड़ा हो सकती है लेकिन वह आपको कामयाब होने से नहीं रोक सकती.

कैसा रहा था बचपन

चानू मणिपुर की राजधानी इंफाल से करीब 200 किमी दूर एक गांव मे पैदा हुई. 14 साल की उम्र में वह इंफाल आ गई जहां उन्होंने खुमान लंपक स्पोर्ट्स कॉमप्लेक्स में अपनी ट्रेनिंग की शुरुआत की. लोहे के बार से पहले वह बांस उठाकर प्रेक्टिस किया करती थी.  चानू को अपनी इस ट्रेनिंग के समय बहुत संघर्षों का सामना करना पड़ा. वह कई घंटो का सफर साइकिल से तय किया करती थी. महीनों तक घर नहीं जा पाती थी. पर उन्हें इसका अफसोस नहीं था क्योंकि उनका लक्ष्य साफ था वह देश के लिए मेडल लाना चाहती थी.

उम्र से बढ़कर प्रदर्शन

चानू की मेहनत ही थी कि 23 साल की उम्र में उन्होंने वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड जीतने की उपलब्धी हासिल की. 11 साल की उम्र में ही चानू अंडर 15 चैंपियन थी. 17 साल की उम्र में वह जूनियर चैंपियन थी. इसी समय उन्हें राष्ट्रीय टीम के लिए बुलावा आया जहां वह अपनी रोल मॉडल कुंजुरानी से मिले जिन्होंने उन्हें आगे के टूर्नामेंटों के लिए लिए तैयार किया. उन्होंने  2017 रिया ओलिंपिक से पहले एशियन चैंपियनशिप में  कुल 192 किग्रा उठाकर कुंजुरानी का रिकॉर्ड तोड़ दिया था.

MIRABAI CHANU_CV

रियो ओलिंपिक के बाद भी नहीं छोड़ी उम्मीद

रियो ओलिंपिक में मिली हार के बाद चानू पांच दिनों के लिए अपने घर गईं और फिर ट्रेनिग के लिए पटियाला लौट आई. इसके बाद से गोल्ड मेडल जीतने तक वह वापस नहीं गई. हर रोज वह उसी मेहनत से प्रेक्टिस करती थी. उनके कोच यह जानते थे कि प्रेक्टिस के साथ साथ जरूरी है कि चानू मानसिक तौर पर भी मजबूत हो. वह पिछला सब भूल कर आने वाले टूर्नामेंट पर ध्यान दें. चानू ने हर तरह से खुद को उस हार की यादों से दूर किया और पूरा ध्यान सिर्फ वर्ल्ड चैंपियनशिप पर लगाया.

पिछले साल दिसंबर में नागरकोइल में हुई नेशनल चैंपियनशिप में उन्होंने 186 किग्रा उठाकर चैंपियनशिप जीती जिससे उनमें आत्मविश्वास बढ़ा. इसके बाद ऑस्ट्रेलिया में हुई कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में भी उन्होंने 85 किग्रा का वजन उठाकर चैंपियनशिप में गोल्ड जीता. लेकिन शायद चानू के दिल में अब भी इंटरनेशनल स्तर पर खुद को साबित करने की इच्छा बाकी थी जो वर्ल्ड चैंपियनशिप से ही पूरी हो सकती थी.

वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप

चानू जानती थी कि कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में उन्होंने 189 किग्रा उठाया ता यहां उन्हें उससे बेहतर करना होगा अमेरिका के आनाहिम में हुई वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में उन्होंने स्नैच में 85 किग्रा उटाने के बाद क्लीन एंड जर्क में उन्होंने पहले प्रयास में 103 किग्रा और दूसरे में 109 किग्रा का भारत उठाया. इसके बावजूद वह थाईलैंड की सुकचारोन तुनिया से एक किग्रा पीछे. अपने आखिरी प्रयास में उन्होंने 109 किग्रा उठाने की ठानी और इसे पूरा किया.

चानू ने नया वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाते हुए वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीत लिया. उन्होंने कुल 194 किग्रा भार उठाया- 85 किग्रा स्नैच और क्लीन एंड जर्क में 109 किग्रा वजन उठाकर वर्ल्ड चानू वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता. कर्णम मल्लेश्वरी के बाद गोल्ड मेडल जीतने वाली दूसरी भारतीय वेटलिफ्टर बन गई हैं. कर्णम मल्लेश्वरी ने साल 1995 में देश को पहला गोल्ड मेडल दिलाया था.

पोडियम पर खड़ी चानू के गले में सोने का तमगा चमक रहा था और आंखें खुशी के आंसु. यह आंसु दिका रेह थे कि जीत की खुशी अलग होती है और हार के बाद उस हार को जीत में बदल देने की खुशी कुछ और.

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