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ट्रैजेडी का खेल: जब मैदान के खौफ का हुआ खौफनाक अंत

मैदान के खौफ और शॉर्ट कॉर्नर के बादशाह पृथीपाल सिंह की कहानी

Updated On: Jan 29, 2017 01:45 PM IST

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi

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ट्रैजेडी का खेल: जब मैदान के खौफ का हुआ खौफनाक अंत

उन्हें खौफ कहा जाता था. उन्हें पेनल्टी कॉर्नर का बादशाह कहा जाता था. ओलिंपियन कर्नल बलबीर सिंह कहते हैं कि अगर गेंद उनके पास हो, तो किसी की छीनने की हिम्मत नहीं होती थी. कुछ ऐसा खौफ था पृथीपाल सिंह का. 28 जनवरी का दिन उनकी यादें लेकर आता है. उन यादों के साथ उनकी मौत की ट्रैजेडी भी याद आती है.

पृथीपाल सिंह, जिन्होंने ओलिंपिक में गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज तीनों जीते. जिन्होंने एशियाई खेलों में भारत को गोल्ड दिलाया. तीन ओलिंपिक खेले. अर्जुन पुरस्कार पाने वाले पहले हॉकी खिलाड़ी बने. पद्म श्री बने. नानक की धरती ननकाना साहब में उनका 28 जनवरी 1932 को हुआ था. एम.एससी. किया था उन्होंने. टीम के सबसे पढ़े-लिखे खिलाड़ियों में थे.

ओलिंपिक पदकों की कहानी

1960 में पहला ओलिंपिक खेला, जहां दो बार हैट्रिक जमाई. भारत ने यहां रजत पदक जीता था. 1964 में दूसरा ओलिंपिक था. यहां पृथीपाल ने 11 गोल किए. भारत ने कुल 22 गोल किए थे. इससे टीम पर उनका असर समझा जा सकता है. जिस गोल पर भारत जीता था, वो पेनल्टी कॉर्नर उन्होंने ही लिया था. पाकिस्तान के फुल बैक मुनीर दार के पांव पर गेंद लगी थी. पेनल्टी स्ट्रोक मिला, जिसे मोहिंदर लाल ने गोल में बदला.

उसके बाद 1968 आया. यहां पर पृथीपाल और गुरबख्श सिंह दोनों को कप्तान बनाया गया. उस टीम का हिस्सा रहे कर्नल बलबीर सिंह कहते हैं कि भारतीय हॉकी को नीचे लाने में वो कदम बेहद अहम था. वह कहते हैं, ‘पृथीपाल कम बोलते थे. कप्तान के लिए यह अच्छी क्वालिटी नहीं है. लेकिन दो कप्तान ले जाना अच्छा नहीं था.’

बलबीर कहते हैं कि उस समय कई खिलाड़ी उम्रदराज थे. इनमें पृथीपाल भी शामिल थे. लेकिन तब भी किसी की हिम्मत नहीं होती थी उनसे गेंद छीनने की. भारत ने वहां कांस्य पदक जीता. यह उनके खेलों की दास्तान थी. लेकिन उसके बाद उन्होंने पंजाब के छात्रों के लिए काफी कुछ किया.

यारों के यार थे पृथीपाल

कर्नल बलबीर कहते हैं, ‘वो चाहते थे कि अनुशासन आए. अनुशासनहीनता उन्हें पसंद नहीं थी. यारों के यार थे वो. आप उनसे मदद मांगने जाएं, तो खाली हाथ नहीं लौट सकते थे. लेकिन अगर आपमें अनुशासन नहीं है, तो आप उनके सबसे बड़े दुश्मन हैं.’

उसी दौर में पंजाब में आतंकवाद भी पनप रहा था. वह लुधियाना में पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के डायरेक्टर ऑफ स्पोर्ट्स हो चुके थे. उनके खिलाफ साजिश हो रही है, ये बात उन्हें भी पता थी. उनका कुसूर यह था कि यूनिवर्सिटी में अनुशासनहीनता, यूनियनबाजी जैसी चीजें रोकने के लिए वो सबसे आगे थे. छात्रों को ये बात पसंद नहीं आ रही थी कि उन पर कोई अंकुश लगाने की कोशिश करे. जिस समय आतंकवाद पनप रहा हो, वहां पृथीपाल का विरोध करने के लिए आतंक का ही सहारा लिया गया. हर रोज की तरह 20 मई 1983 की सुबह भी वो अपनी बाइक से ऑफिस पहुंचे.

कहा जाता है कि दो युवा आए, जिनके हाथ में रिवॉल्वर थी. चार गोलियां दागी गईं. सिर और सीने में. दोनों ने जाकर देखा कि मिशन कामयाब हुआ है या नहीं. कोई भी सामने नहीं आया. वे आराम से मोटर साइकिल से निकल गए. जिस हट्टे-कट्टे शख्स से दुनिया थर्राती थी, वो खून में लथपथ था.

कहा जाता है कि हत्यारे  उनके ही छात्र थे. बलबीर कहते हैं, ‘मैंने जो कहानी सुनी, उसके मुताबिक 4-5 लोग थे. इन्होंने तय किया था कि पृथीपाल को बाइक से नहीं उतरने देना है. एक बार वो  बाइक से उतर गए, तो 2-3 लोग उन्हें संभाल नहीं सकते. इसलिए बाइक पर ही दो लोगों ने उन्हें पकड़ा और बाकियों ने गोली दागी.’ नहीं पता कि सच्चाई क्या है. 34 साल हो गए. कुछ लोग पकड़े गए, लेकिन सबूतों के अभाव में बरी हो गए. हॉकी दुनिया की जो कहानी मैदान पर खौफ से शुरू हुई थी, तो खून से लथपथ खत्म हुई.

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