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हॉलीवुड की स्क्रिप्ट सरीखा है हिमालय के इस शिवा का बर्फानी ओलिंपिक में अलविदा कहना

20 साल से विंटर ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले शिवा केशवन ने 2018 विंटर ओलिंपिक के बाद संन्यास ले लिया है

Updated On: Feb 24, 2018 01:53 PM IST

Jasvinder Sidhu Jasvinder Sidhu

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हॉलीवुड की स्क्रिप्ट सरीखा है हिमालय के इस शिवा का बर्फानी ओलिंपिक में अलविदा कहना

यह कहानी फिल्मी है. एक चरित्र है जो तमाम मुश्किलों से उबर कर खुद को साबित करता है. कुछ ऐसा करने में भी सफल हो जाता है जिसके बारे में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता और अंत में नाकामी के बावजूद एक विजेता की मुस्कान उसके चेहरे पर कब्जा कर लेती है.

16 साल का एक दुबला-पतला सा लड़का जापान के शहर नागानों में 1998 के विंटर ओलिंपिक  के अधिकारियों को समझाने की कोशिश कर रहा था कि वह वहां क्यों है और वह कहां से है!

उस दिन शिवा केशवन विंटर ओलिंपिक के अधिकारियों को मनाने में कामयाब हुआ कि वह एक ल्यूज पायलट है और वह भारत से ओलिंपिक में हिस्सा लेने आया है. विंटर ओलिंपिक की ल्यूज स्पर्धा के आयोजकों के लिए यह एक खबर थी लेकिन शिवा के उत्साह ने इसे मौके में बदलने में सफलता हासिल की.लेकिन जब मौका मिला तो एक दिक्कत सामने थी.

बर्फ के पाइपनूमा ट्रेक पर एक तख्तेनुमा स्लेड पर लेट कर 160-170 किलोमीटर से ज्यादा की स्पीड से दूरी तय करने के खेल ल्यूज के लिए जरूरी स्लेड शिवा के पास नहीं थी.

किसी फिल्मी कहानी की तरह उस दिन एक कोरियाई खिलाड़ी शिवा की मदद के लिए आगे आया और उसने अपनी स्लेड शिवा को क्वालिफाई दौर के लिए दी.

शिवा ने उस स्लेड से क्वालिफाई किया और जिंदगी में सबसे बड़े उतार-चढ़ाव का वह दिन हिमाचल प्रदेश में बर्फिले पहाड़ों की गोद में पैदा हुए शिवा का भविष्य हो गया. मनाली के शिवा की 20 साल की यह यात्रा इसी महीने प्योंगचांग विंटर ओलिंपिक में थमी है.

Shiva Keshavan leads the Indian delegation 08 February 2002 during the opening ceremonies of the 2002 Winter Olympics at the Rice Eccles Stadium in Salt Lake City, Utah. AFP PHOTO Robert SULLIVAN / AFP PHOTO / ROBERT SULLIVAN

बेशक शिवा की रिटायरमेंट बड़ी खबर नहीं बनी लेकिन इससे उनकी छह विंटर ओलिंपिक में हिस्सेदारी की उपलब्धि भारत की ऐसी प्रतिस्पर्धा में मौजूदगी का सर्टिफिकेट है जिसका खुद अपने घर में कोई वजूद नहीं है.

भारत में कोई ल्यूज ट्रेक नहीं है. शिवा मनाली की सांप की चाल जैसी घूमावदार सड़कों पर पहिंए लगे स्लेड पर अभ्यास करते थे.

प्योंगचांग विंटर ओलिपिक में शिवा का करियर पुरुषों की ल्यूज इवेंट में 34वें स्थान पर खत्म हुआ.

यकीनन रिकॉर्ड के लिहाज से यह उपलब्धि नहीं कही जा सकती लेकिन शिवा की यहां तक पहुंचने की पूरी यात्रा प्रेरित करने वाली है.

शिवा को सिर्फ छह बार के विंटर ओलिंपियन के तौर पर ही नहीं याद रखा जाएगा. शिवा खेलों में खराब व्यवस्था के खिलाफ एक विद्रोही भी रहे हैं. मनाली के खूबसूरत वशिष्ट में रहने वाले शिवा ने 2006 विंटर ओलिंपिक की उद्घाटन समारोह का बहिष्कार कर दिया था क्योंकि ओलिंपिक संघ के अधिकारी उस बड़े इवेंट को सैर-सपाटे की तरह ले रहे थे और बतौर धावक शिवा की अनदेखी हो रही थी. शिवा को इस खिलाफत का नतीजा भुगतना पड़ा.

विंटर ओलिंपिक में हर धावक को हिस्सेदारी का एक पदक मिलता है. शिवा के विरोध के कारण अधिकारियों ने वह पदक उन्हें नहीं दिया. बताया गया कि पदक चोरी हो गया है लेकिन दो साल बाद वह मेडल न जाने कहां से बाहर आ गया. शिवा की जिंदगी कहानियों से भरी है. कुछ परेशान करने वाली हैं, कई प्रेरित करती हैं और बहुत सी हौसला बढ़ाती हैं.

Shiva Keshavan

एक बार उन्होंने मुश्किल के समय किसी ओर को नहीं बल्कि सीधे प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यलाय में फोन लगा दिया था. शिवा के विश्वकप में हिस्सा लेने जाना था लेकिन ऑस्ट्रियन एयरलाइंस ने उन्हें प्लेन में स्लेड ले जाने की इजाजत नहीं दी. दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर शिवा को कुछ समझ नहीं आया तो उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय में फोन करने अपनी दिक्कत बताई.प्रधानमंत्री कार्यालय ने तेजी से कार्रवाई करके शिवा को मुश्किल से निकाला.

असल में इस घटना के कुछ साल पहले वाजपेयी मनाली में शिवा के माता-पिता के इटेलियन रेस्टोरेंट आए थे. तब उन्हें बताया गया कि रेस्टोरेंट के मालिक का बेटा विंटर ओलिंपियन है.

यह जानने के बाद प्रधानमंत्री ने शिवा को अपने ऑफिस का नंबर दिया और कहा कि जिंदगी में कभी दिक्कत हो तो वह उन्हें फोन कर सकते हैं.

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