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प्रो कबड्डी लीग ऑक्‍शन : कबड्डी की ये बोली आईपीएल में खेलने वाले कई क्रिकेटर्स को भी ईर्ष्या करवा सकती है

अभी तक मोनू गोयत सबसे महंगे खिलाड़ी रहे, छह खिलाड़ियों को एक करोड़ से अधिक रकम देकर खरीदा गया

Updated On: May 31, 2018 11:46 AM IST

Sunil Taneja Sunil Taneja

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प्रो कबड्डी लीग ऑक्‍शन : कबड्डी की ये बोली आईपीएल में खेलने वाले कई  क्रिकेटर्स को भी ईर्ष्या करवा सकती है

साल 2014 की बात है. भारतीय कबड्डी टीम के तत्कालीन कप्तान राकेश कुमार अपने पैत्रिक गाँव निजामपुर में दोपहर के भोजन के बाद आराम फरमा रहे थे. अचानक से उनके एक मित्र उन्हें बड़ी हड़बड़ी में उठा देते हैं. नींद टूटने की वजह से राकेश झल्ला गए और हरियाणवी में पूछा कि क्या आफत आ गई. मित्र ने जवाब दिया कि कबड्डी की जिस नई प्रतियोगिता के बारे में आप बता रहे थे, उसमें पटना की टीम ने आपको 12 लाख 80 हजार में खरीदा है. मित्र को फिर से हरियाणवी भाषा में डांट पड़ी. इस बार ऐसा बेहूदा मजाक करने के लिए पड़ी. पर ये मजाक नहीं था. कुछ सप्ताह बाद राकेश कुमार, 2 बार के एशियन गेम्स गोल्ड मेडलिस्ट और अर्जुन अवार्डी खिलाड़ी, पटना पाइरेट्स की कप्तानी कर रहे थे.

ठीक 4 साल बाद, 2018 के मई महीने में नितिन तोमर मुझे मैसेज करके हाल-चाल पूछते हैं. फिर पूछते हैं कि 2 दिन बाद होने वाली प्रो-कबड्डी ऑक्शन के बारे में मेरे क्या विचार हैं. वे बातचीत से थोड़े नर्वस लग रहे थे. एक साल पहले हुई प्रो-कबड्डी की ऑक्शन में यूपी योद्धा ने उनके लिए 93 लाख रूपए खर्च किए थे और शायद वे सोच रहे होंगे कि इस बार उतनी बड़ी बोली ना लगे. खैर, कल रात मैसेज करके मैंने उन्हें 1 करोड़ 15 लाख की राशि के लिए बधाई दी. एक बधाई मोनू गोयत को भी, जिनके खाते में 1 करोड़ 51 लाख रुपए (टी.डी.एस. और जी.एस.टी. का झमेला छोड़ दें) आने वाले हैं. उतनी ही बधाई दीपक हुड्डा, रिशंक देवाडिगा, राहुल चौधरी और फजल अत्राचली को भी, जो प्रो-कबड्डी के करोड़पतियों की फेहरिस्त में शुमार हो गए हैं. राकेश कुमार से मोनू, 12.8 लाख से 1.51 करोड़ का सफ़र इन खिलाड़ियों ने महज़ 4 साल में तय किया है. यह राशि आईपीएल में खेलने वाले अनेक क्रिकेट खिलाड़ियों को भी ईर्ष्या करवा सकती है. बात सिर्फ़ रकम की नहीं है. बात है उस रुतबे की, जो भारतीय खेलों की दुनिया में सिर्फ क्रिकेट को प्राप्त था और जिस के बाद दूसरा स्थान हासिल करने के लिए हॉकी, फ़ुटबॉल इत्यादि अनेक खेलों पर आधारित लीग्स ने कोशिश की, लेकिन प्रो-कबड्डी (और काफी हद तक प्रो-रेसलिंग) ही कामयाब रही.

स्‍टारडम कमाया है ना कि पैसे देकर जुटाया है

‘कैप्टन कूल’ अनूप कुमार हरियाणा पुलिस में इंस्पैक्टर हैं. प्रो-कबड्डी के सीजन-1 के बाद वे एक मर्तबा अपनी टीम के साथ कहीं रिकवरी के लिए गए. वहां पहुँच कर अधिकारिक काम बाद में हुआ, पहले लोगों ने और उनके परिवार वालों ने अनूप के साथ सेल्फी खिंचवाने की जिद ठान ली. सीज़न-1 के दौरान ही, जब दिल्ली में मैच थे, मैं अपनी बेटी को छोड़ने स्कूल बस के स्टॉप तक गया. वहां मौजूद एक और बच्चे की माँ ने पूछा, सुनील जी, अनूप की टीम का अगला मैच कब है? अनूप अकेले नहीं है जो इस स्टारडम का आनंद उठा रहे हैं. राहुल चौधरी एक एल्बम के गाने में एक्टिंग करते दिखते हैं. पिछले 3 सीज़न के सुपरस्टार प्रदीप नरवाल लड़कियों की गुज़ारिश पर सेल्फी खिंचवाते हुए, उन मुस्कुराते हुए चेहरों के बीच शर्माते हुए नजर आते हैं. रिशंक देवाडिगा के जन्मदिन पर उनके टीम होटल के बाहर फूल और केक हाथ में लिए प्रशंसकों की भीड़ जमा हो जाती है.

ये सब इनके अपने कमाए हुए प्रशंसक हैं, पैसे देकर सोशल मीडिया पर खरीदे हुए नहीं. ये प्रशंसक कमाए गए हैं इनकी कड़ी मेहनत से, जिसे देखने कोई प्रशंसक निजामपुर या सोनीपत के अखाड़ों में नहीं जाता. फैन्‍स के हाथ से अपना बर्थडे केक खाने का पात्र बनने के लिए रिशंक ने कई वर्ष मुंबई में गुमनामी में रहकर, छोटे-मोटे टूर्नामेंट खेल कर गुज़ारा किया है. दीपक हुड्डा को अपनी ट्रेनिंग का खर्चा चलाने के लिए स्कूल में पढ़ाना पड़ा था. पिताजी की डांट खाते हुए अनूप कुमार ये तय नहीं कर पा रहे थे कि अपना भविष्य कबड्डी में देखें या एथलेटिक्स में? एक टीनेजर प्रदीप नरवाल को किसी गाँव में खेलता देख कर यदि रंधीर सिंह सेहरावत उन्हें बेंगलुरु बुल्स में ना लाते, तो वहां से उनका पटना पाइरेट्स और फिर भारतीय टीम का स्टार बनने का सफ़र शायद शुरू ही ना होता.

कबड्डी की इस लीग ने बदल डाली खिलाडि़यों की जिंदगी 

प्रो-कबड्डी ने इनकी और इनके जैसे सैंकड़ों खिलाड़ियों की जिन्‍दगी ही नहीं बदली, बल्कि हम सब की ज़िन्दगी भी बदली है. हमें एक नया खेल दिया है, जो पहले 4 साल के अंतराल पर एशियन गेम्स में खेला जाता था और जिसे देखकर मन में यह सवाल उठता था कि एक रेडर ने किसी विरोधी को छुआ तक नहीं, फिर भी अम्पायर ने अंगूठा क्यों उठा दिया और रेडर की टीम को एक अंक क्यों मिल गया? ऐसे ही अंक जुटाते-जुटाते भारतीय पुरुष टीम 1990 से 2010 तक लगातार एशियन गेम्स में कबड्डी के स्वर्ण पदक लाती रही, और अधिकांश लोग तब भी यही सोचते रहे कि ये खेल भारत के गाँव-देहात में लंगोट पहने पहलवान खेलते होंगे.

फिर अपने पैत्रिक गाँव निजामपुर में दोपहर का भोजन करने के बाद आराम फरमा रहे राकेश कुमार को उनके दोस्त जगा देते हैं. और कुछ सप्ताह बाद स्टार स्पोर्ट्स पर आने वाली प्रो-कबड्डी हमारी पुरानी सोच को जगा देती है और हमें बताती है कि ये खेल मॉडल्स की तरह खूबसूरत दिखने वाले, चीते की तरह फुर्तीले, बाज जैसी पैनी नजर रखने वाले उन अद्भुत खिलाड़ियों का खेल है जो आज मुस्कुराते हुए इन्स्टाग्राम पर फोटो अपलोड कर के नीचे लिखते हैं Watch me in Abhishek Bachchan’s team. Got 1.15 crores. Cool, isn’t it

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