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क्या वाकई खेल रत्न के लिए ‘जीरो’ हैं विराट कोहली?

पहलवान बजरंग पूनिया ने एक सवाल उठाया है, जिसका जवाब उन्हें दिया ही जाना चाहिए

Updated On: Sep 21, 2018 02:45 PM IST

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi

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क्या वाकई खेल रत्न के लिए ‘जीरो’ हैं विराट कोहली?

हर साल खेल रत्न अपने साथ विवादों की पोटली लेकर आता है. हर साल पोटली भारी होती जा रही है. अवॉर्ड के लिए कमेटी अपना फैसला करती है. उसके बाद प्रेस कांफ्रेंस से लेकर अदालत तक इस फैसले को चुनौती दी जाती है. इस बार भी कुछ अलग नहीं है. पहलवान बजरंग पूनिया ने एक सवाल उठाया है, जिसका जवाब उन्हें दिया ही जाना चाहिए. उन्होंने पूछा है कि मुझे सिर्फ इतना बता दीजिए कि मुझमें क्या कमी है. उन्होंने अपने सवाल में विराट कोहली या मीराबाई चानू को लेकर नाराजगी नहीं जताई. हालांकि मीडिया में अवॉर्ड के लिए क्राइटीरिया और पॉइंट सिस्टम पर काफी बात हुई है.

यह सही है कि विराट कोहली को जीरो पॉइंट मिले हैं. लेकिन यह भी सही है कि क्रिकेट के लिए अंक नहीं हैं. क्या इसमें विराट कोहली की गलती है कि क्रिकेट के लिए अंक निर्धारित नहीं हैं? या दूसरा सवाल, क्या क्रिकेट बहुत अमीर खेल है, बहुत लोकप्रिय है, क्या इस वजह से उसकी अनदेखी होनी चाहिए? बीसीसीआई ने यकीनन खेल पुरस्कारों को लेकर कई बार असम्मान दिखाया है. लेकिन इसके बाद ऐसा कोई फैसला नहीं किया गया कि क्रिकेटर्स को अवॉर्ड नहीं दिया जाएगा. अगर क्रिकेटर्स को अवॉर्ड दिया जाता है और विराट कोहली का नाम है, तो यकीनन परफॉर्मेंस के हिसाब से ही वो खेल रत्न के बड़े दावेदार थे.

कुछ ऐसा है अंकों का खेल

बजरंग ऐसा कह भी नहीं रहे कि विराट कमजोर दावेदार हैं. वो सिर्फ अपने बारे में जानना चाह रहे हैं. बजरंग के 80 अंक हैं. एशियन गेम्स के 30 और कॉमनवेल्थ के 25 के साथ इन दो इवेंट में ही 55 अंक हैं. अब जरा अंकों के लिहाज से देखा जाए. कुश्ती में कॉमनवेल्थ खेलों के मेडल का कतई वो मतलब नहीं, जो एशियन गेम्स का है. एशियन गेम्स का मेडल ओलिंपिक्स के आसपास माना जा सकता है. खासतौर पर महिलाओं में.

इसे कुछ यूं समझें कि पिछली बार रियो ओलिंपिक में महिला वर्ग के छह गोल्ड मेडल में चार जापान को मिले थे. जापान के इस दबदबे के बीच इस एशियाड में विनेश ने गोल्ड जीता है. पुरुष वर्ग में ऐसा दबदबा तो नहीं होता, लेकिन एशियन पहलवान दुनिया में बड़ा नाम कमाते हैं. ऐसे में इस खेल का ओलिंपिक और एशियाड में सिर्फ पांच अंकों का फासला समझ से बाहर है.

एक और उदाहरण, कॉमनवेल्थ खेलों में एथलेटिक्स का स्तर एशियाई खेलों के मुकाबले खासा ऊपर होता है. लेकिन अंक जाहिर तौर पर एशियन गेम्स में ज्यादा मिलते हैं. इसीलिए नीरज चोपड़ा के कॉमनवेल्थ के प्रदर्शन को एशियन गेम्स के प्रदर्शन पर तरजीह मिलनी चाहिए. इसी वजह से वो अर्जुन के साथ खेल रत्न के भी दावेदार थे.

इससे उल्टा फर्क बैडमिंटन में समझा जाता है, जहां उंगली पर गिने जाने लायक नामों को छोड़कर बाकी सभी चैंपियन एशिया के होते हैं. ऐसे में क्या वाकई अंकों के लिहाज से फैसला होना चाहिए? अगर फैसला अंकों के लिहाज से ही होना है, तो फिर कमेटी की जरूरत ही नहीं है. अंक तो सीधे कंप्यूटर में डालकर देखे जा सकते हैं. उसी लिहाज से नाम तय किए जा सकते हैं.

कमेटी बनती ही इसलिए है, ताकि अंकों से अलग गेम की अहमियत समझकर फैसला किया जाए. नियम नंबर 11 में साफ है कि मैकेनिकल तरीके से किसी डिसिप्लिन में सबसे ज्यादा अंकों के लिहाज से अवॉर्ड नहीं दिया जा सकता. हां, अगर किसी एक खेल में दो दावेदार हैं, तो ज्यादा अंक वाले को पुरस्कार दिया जाएगा. इसी वजह से कमेटी में हॉकी को लेकर खासी बहस हुई थी. अर्जुन पुरस्कार के लिए मनप्रीत सिंह के अंक ज्यादा थे. लेकिन कमेटी के कुछ सदस्य सविता पूनिया को चुनना चाहते थे. आखिर में दोनों को अवॉर्ड के लिए चुना गया.

क्या वाकई बजरंग हकदार हैं?

Wrestling - 2018 Asian Games – Men's Freestyle 65 kg Gold Medal Final - JCC – Assembly Hall - Jakarta, Indonesia – August 19, 2018 – Bajrang Bajrang of India celebrates after winning gold medal. REUTERS/Issei Kato - HP1EE8J13A248

यकीनन बजरंग हकदार हैं. लेकिन जिन दो लोगों को खेल रत्न चुना गया है, वो भी हकदार हैं. वेटलिफ्टिंग ओलिंपिक इवेंट है. उसमें वर्ल्ड चैंपियनशिप का गोल्ड जीतना बहुत बड़ी बात है. वो भी 194 किलो वजन उठाकर, जो अगर उन्होंने रियो ओलिंपिक में उठाया होता, तो सिल्वर मेडल जीत सकती थीं. ऐसे में मीराबाई चानू के प्रदर्शन को कतई नजरअंदाज नहीं कर सकते. ऐसे में संभव था कि तीसरा नाम जोड़ते. लेकिन पहले दो के लिए विराट कोहली और मीराबाई चानू को चुना जाना गलत नहीं माना जा सकता. हालांकि तीसरा नाम जोड़ने पर विनेश सवाल पूछ सकती थीं कि वो हकदार क्यों नहीं हैं. खासतौर पर यह देखते हुए कि महिला कुश्ती में एशियन गेम्स का गोल्ड ओलिंपिक्स में भी गोल्ड के ही आसपास है. ऐसे में सवालों का सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा.

क्या खेल मंत्रालय ने ही अवॉर्ड की गरिमा को कम किया है

दरअसल, इस तरह के सवालों की वजह यह है कि कई बार नियमों और तर्कों को खारिज करते हुए अवॉर्ड दिए गए हैं. अदालत ने कमेटी के फैसले को गलत करार दिया. अपने ही नियमों को मंत्रालय ने तोड़ा-मरोड़ा. इस बार का ही उदाहरण लें. ऐसी क्या हड़बड़ी थी, जिससे जकार्ता एशियन गेम्स की वजह से अवॉर्ड समारोह टाला जाए.

क्या हर बार की तरह इस बार भी 29 अगस्त को खेल दिवस पर समारोह नहीं कराए जा सकते थे? खेलों के साथ मजाक करना एक बार शुरू होने के बाद उसे रोका नहीं जा सकता.

ताजा प्रदर्शन पर ही ज्यादा ध्यान होता है

होता यही है कि ताजा परफॉर्मेंस हमारे दिमाग पर इस कदर हावी हो जाते हैं कि कुछ महीने पहले हुआ प्रदर्शन हट जाता है. मीरा बाई चानू के साथ भी यही हुआ है. उनका प्रदर्शन नवंबर 2017 का है. 2 सितंबर को एशियन गेम्स खत्म हुए, तो उसी का प्रदर्शन दिल-ओ दिमाग पर है. इसीलिए हमारे दिमाग में श्रीकांत का प्रदर्शन भी नहीं होगा, जो 2017 में किए कमाल की बदौलत विश्व नंबर दो हो गए थे. उन्होंने साल में चार सुपर सीरीज खिताब जीते थे. लेकिन चमक-दमक के मामले में सुपर सीरीज को एशियन गेम्स या कॉमनवेल्थ गेम्स के सामने जगह नहीं मिलती, इसलिए उनका नाम भी सामने नहीं आया.

Palembang: Indian tennis players Rohan Bopanna and Divij Sharan (unseen) play against China's Cheng Peng Hsles and Tsung Hua Yang during men's doubles R16 match at the 18th Asian Games at Palembang, in Indonesia on Wednesday, Aug 22, 2018. (PTI Photo/Vijay Verma) (PTI8_22_2018_000238B)

रोहन बोपन्ना को अब जाकर अर्जुन अवॉर्ड मिला है, जबकि ग्रैंड स्लैम में उनका प्रदर्शन हम सब जानते हैं. जीव मिल्खा सिंह का नाम कहीं नहीं आ पाता, क्योंकि उनका प्रदर्शन आम जनता को पता नहीं चलता. बल्कि कुछ समय पहले एक कमेटी सदस्य ने ही जानना चाहा था कि आखिर जीव ने ऐसा किया क्या है कि उन्हें अवॉर्ड दिया जाए. अगर कमेटी सदस्य का यह सवाल है, तो समझ सकते हैं कि आम जनता इस बारे में कैसे सोचती होगी.

खिलाड़ियों के लिए अपनी निराशा जाहिर करना आम बात है. इसमें उनकी कोई गलती भी नहीं. खेल जीवन ऐसा होता है, जहां एक चोट आपका करियर खत्म कर सकती है. जिस साल सायना नेहवाल को खेल रत्न मिला था, पहलवान रमेश कुमार भी थे, जिन्होंने 42 साल बाद भारत को वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल जिताया था. वो सिल्वर जीतकर आए थे. क्या अब कभी वो दावेदार हो सकते हैं? यही वजह है कि खिलाड़ी परेशान, निराश, हताश होता है. ये हताशा तब और ज्यादा होती है, जब अवॉर्ड दिए जाने के तरीके पर उन्हें भरोसा नहीं होता. ...और उस भरोसे को तोड़ने का काम पिछले कुछ सालों में लगातार हुआ है.

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