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संकट और बुरे दौर में घाटी के फुटबॉल की असली कहानी है ‘रियल कश्मीर’

भारत में पेशेवर फुटबॉल लीग के 22 साल के इतिहास में पहली बार कश्मीर की कोई टीम टॉप डिवीजन के लिए खेलेगी

Jasvinder Sidhu Jasvinder Sidhu Updated On: May 31, 2018 04:08 PM IST

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संकट और बुरे दौर में घाटी के फुटबॉल की असली कहानी है ‘रियल कश्मीर’

कश्मीर भारतीय अखबारों में किन कारणों से रहता है, हम सभी जानते हैं. इन दिनों वहां के युवाओं का फिर से एके-17 थामना संकट को और गहरा कर रहा है. लेकिन इस बुरे दौर के बीच फुटबॉल ने वहां के युवाओं के सुकून देने वाली राह दिखाई है.

इस बुधवार कुछ ऐसा हुआ है जो सोचा नहीं जा सकता. भारत में पेशेवर फुटबॉल लीग के 22 साल के इतिहास में पहली बार कश्मीर की कोई टीम टॉप डिवीजन के लिए खेलेगी. अभी चार-पांच साल पहले ही अपने अस्तित्व में आई रियल कश्मीर का बेंगलुरु में हिंदुस्तान क्लब को आई-लीग के आखिरी दिन 3-2 से हराना यादगार इतिहास बना है.

मैच जीतने के बाद रियल कश्मीर के मिडफिल्डर ने कहा कि टॉप डिवीजन में जाना पूरे कश्मीर के फुटबॉल का नक्शा बदल देगा. यह बिलकुल सही है क्योंकि क्रिकेट के जुनून के बीच यह खेल इतना लोकप्रिय है कि अंदाजा लगाना मुश्किल है और यह उपलब्धि इस खेल को और मजबूती देगी.

यह सही है कि कई दशकों के कश्मीर में संकट है, लेकिन इसने इस खेल को बड़ा होने ने नहीं रोका. मौजूदा दौर में मेहराजुद्दीन वाडू के कश्मीर से निकल कर वहां की फुटबॉल को हिंदुस्तान के पेशेवर खेल सिस्टम से अवगत करवाया.

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वाडू बताते हैं, ‘मैं श्रीनगर की रैनावाड़ी में बड़ा हुआ. मेरे घर के सामने मैदान था और आस पड़ोस में कश्मीरी पंडित भी थे. यह खेल हमें जोड़ता था. मुझे याद नहीं कि कभी बुरे हालात के बीच एक भी दिन हमारी प्रैक्टिस पर बुरा असर पड़ा हो. कई दशकों के बुरे दौर में भी यह खेल कभी खराब नहीं हुआ.’

वाडू कश्मीर की युवा पीढ़ी के फुटबॉलरों में हैं, लेकिन कई दशकों के बुरे दौरे के बावजूद देश का नाम रोशन करने वाले जम्मू-कश्मीर के खिलाड़ियों की सूची काफी लंबी है. कश्मीर से इशफाक, अब्दुल माजिद काकरू और जम्मू के कमलजीत व अरुण मल्होत्रा जैसे खिलाड़ियों ने यहां के खेल को पहचान दी. काकरू भारतीय फुटबॉल टीम के कप्तान भी रहे.

पिछले अगस्त में इस लेखक को घाटी के फुटबॉल से रु-ब-रु होने का मौका मिला. श्रीनगर को पोलो ग्राउंड से सटे स्टेट स्पोर्टस काउंसिल के सिंथेटिक फुटबॉल ग्राउंड पर अंडर-13 टीम के लिए ट्रायल जारी था. करीब तीन सौ बच्चे ट्रायल के लिए थे और उनके माता-पिता से बातचीत में पता लगा कि कोई न कोई उनके परिवार में कभी फुटबॉल का खिलाड़ी रहा है.

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कश्मीर के फुटबॉल को रियल कश्मीर जैसी ही खबर का इंतजार था और यकीनी तौर पर इसका असर आने वाले सालों में इस खेल को चाहने वालों को मिलेगा. देश के जिस हिस्से में युवाओं की पूरी जद्दोजहद किसी नौकरी को हासिल करने में सिमटी हो और जिदंगी हर दिन का संघर्ष हो, वहां रियल कश्मीर यकीनन बड़ी खबर है.

कश्मीर से निकलने वाले अखबार कश्मीर मॉनिटर की यह टीम अपने पहले ही साल में स्टेट लीग की चैंपियन थी और इसके बाद बेहद ही कम समय में इसने प्रोफेशनल क्लब के तौर पर लाइसेंसिंग के लिए जरुरी योग्यताएं मैदान पर साबित कीं.

टीम की अब तक की यात्रा का श्रेय उनके स्कॉटिश कोच डेविड रॉबर्टसन को भी जाता है जिन्होंने  2017 में चीन और युगांडा में कोचिंग के ऑफर छोड़ कर रियल कश्मीर से करार पर साइन किए.

जाहिर है कि किसी विदेशी के लिए कश्मीर जैसी जगह में रह कर कोचिंग का फैसला बहादुरी भरा था. लेकिन यह सुखद है कि बेहतरीन खिलाड़ियों से भरी इस टीम ने उनके इस फैसले के साथ पूरा न्याय किया है.

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