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जब दस डॉलर में पिज्जा खा-खाकर बने थे वर्ल्ड चैंपियन

जूनियर हॉकी वर्ल्ड कप काउंटडाउन : 2001 में चैंपियन बनी टीम की कहानी

Updated On: Dec 06, 2016 02:25 PM IST

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi

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जब दस डॉलर में पिज्जा खा-खाकर बने थे वर्ल्ड चैंपियन

आठ दिसंबर से लखनऊ में जूनियर वर्ल्ड कप हॉकी शुरू हो रही है. जैसे ही वर्ल्ड कप आता है, यादें 2001 की तरफ जाती हैं, जब भारतीय टीम ने एकमात्र बार कप जीता था. भारत ने अर्जेंटीना को फाइनल में 6-1 से हराकर कप जीता था. उस वर्ल्ड कप में सबसे ज्यादा गोल दागने वाले दीपक ठाकुर के लिए यादें मैच से होती हुई तैयारियों तक जाती हैं, ‘उस वक्त पहली बार लगा था कि जिंदगी में कुछ खास कर दिया. लेकिन अब सोचता हूं तो यकीन नहीं होता कि जिन हालात में हम थे, उसमें रहते हुए वर्ल्ड चैंपियन बन गए.’

कैंप की कहानी

वर्ल्ड कप ऑस्ट्रेलिया में था. अक्टूबर में इवेंट होना था. इससे पहले कैंप हैदराबाद में लगा था. अक्टूबर में होबार्ट का अधिकतम तापमान 15-16 और न्यूनतम 6-7 डिग्री होता है. जबकि हैदराबाद का अधिकतम तापमान सितंबर में 30 के करीब होता है. ठाकुर कहते हैं, ‘हम जब गए, तो समझ नहीं आ रहा था कि कैसे रिएक्ट करें. यहां गर्मी थी, उमस थी. वहां जम जाने जैसी ठंड थी.’ कैंप में भारतीय टीम अपना खाना खुद बनाती थी, ‘इतना खराब खाना था कि हमने तय किया कि बादाम वगैरह डालकर दलिया बनाएंगे और खाएंगे. तो प्रैक्टिस के साथ हमें हमेशा चिंता होती थी कि खाने का क्या करें. हालत यह थी कि अच्छा खाना मांगते थे, तो हमें कहा जाता था कि पहले मेडल जीतकर लाओ.’

खाने की दिक्कत ऑस्ट्रेलिया में भी

टूर्नामेंट ऑस्ट्रेलिया में था. भारतीय खिलाड़ियों को कोई फीस तो मिलती नहीं थी. उस समय भारतीय हॉकी फेडरेशन यानी आईएचएफ के अध्यक्ष केपीएस गिल थे. गिल कभी खिलाड़ियों को मैच फीस दिए जाने के पक्षधर नहीं थे. हर रोज खिलाड़ियों को दस डॉलर मिलते थे. ठाकुर के अनुसार, ‘हम एक मॉटेल में रुके थे. खाना वहां बहुत खराब था. पास में पिज्जा हट था, तो हमारे लिए पौष्टिक खाने का मतलब वही था. एक वक्त हमें ठीक खाना मिल जाता था, क्योंकि एक भारतीय रेस्त्रां था, जहां हम रात में खाते थे. दिन पिज्जा खाकर निकलता था. पिज्जा खा-खा के हालत ये थी कि पेट में दर्द रहने लगा था.’

प्रैक्टिस में हुआ था भांगड़ा

उस वर्ल्ड कप का फॉर्मेट आज के फॉर्मेट से अलग था. 16 टीमों को 4-4 के पूल में बांटा गया था. इसमें टॉप 2-2 टीमें यानी आठ टीमों को पहले आठ के लिए और बाकी आठ को 9-16 की पोजीशन के लिए ग्रुपों में बांटा गया. टॉप आठ टीमों में 4-4 के ग्रुप से टॉप दो टीमों को सेमीफाइनल के लिए क्वालिफाई करना था. भारतीय टीम ने पहली बाधा आराम से पार की. दूसरी में, यानी सेमीफाइनल के लिए उसे खुद भी जीतना था और ये उम्मीद करनी थी कि अर्जेंटीना अपने मैच में ऑस्ट्रेलिया से ड्रॉ खेल ले. ठाकुर कहते हैं, ‘उनका मैच चल रहा था, तो हम प्रैक्टिस कर रहे थे. अर्जेंटीना पीछे थी. लेकिन आखिर में ड्रॉ करने में कामयाब रही. हमारा ध्यान उस पर ही था. जैसी ही नतीजा आया, हमने प्रैक्टिस छोड़ दी और भांगड़ा शुरू कर दिया. उसके बाद हमें याद आया कि अरे अभी तो हॉलैंड से जीतना है, तब सेमीफाइनल में पहुंचेंगे.’

jr world cup

खैर, टीम हॉलैंड से जीती और पूल में दूसरे नंबर पर रहकर सेमीफाइनल में पहुंच गई. सेमीफाइनल में उसने जर्मनी को 3-2 से हराकर फाइनल में जगह बनाई. फाइनल में अर्जेंटीना से मुकाबला था. ठाकुर के अनुसार, ‘मैंने गगन (अजीत सिंह) से कहा कि यार, फाइनल जैसी फीलिंग ही नहीं आ रही है. कोई प्रेशर नहीं लग रहा. हमने इतनी बड़ी टीमों को हराया था कि लग रहा था कि अर्जेंटीना को तो मार ही देंगे.’ हुआ भी यही. भारत एकतरफा मुकाबले में फाइनल जीता. 6-1 के स्कोर में दीपक ठाकुर ने तीन और जुगराज सिंह ने दो गोल किए.

इस बार क्या है अलग

उस टूर्नामेंट में सात गोल करने वाले जुगराज सिंह और दीपक ठाकुर दोनों का मानना है कि अभी टीम को जैसी तैयारियां मिली हैं, तब उसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी. जुगराज कहते हैं, ‘कई साल से टीम  एक साथ खेल रही है. वर्ल्ड क्लास तैयारी मिली है. अपना घर है. इससे बेहतर क्या हो सकता है.’ ठाकुर को भी यही लगता है, ‘इससे बढ़िया चांस नहीं हो सकता. तैयारियों में जमीन-आसमान का फर्क है. हां, एक समानता है, तब हमें अपनी टीम पर भरोसा था. आज की टीम में भी वो भरोसा दिखाई देता है.’

2001 की टीम : देवेश चौहान, बिक्रमजीत सिंह, कंवलप्रीत सिंह, जुगराज सिंह, प्रबोध टिर्की, बिमल लाकड़ा, विरेन रस्किन्हा, गगन अजीत सिंह, दीपक ठाकुर, इंदरजीत सिंह, राजपाल सिंह, अर्जुन हलप्पा, तेजबीर सिंह, प्रभजोत सिंह, इग्नेस टिर्की, भरत छेत्री, विक्रम पिल्लै, बिपिन फर्नांडिस.

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