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क्या सबसे बड़े हीरो को गुमनाम बताने से ही प्रमोट होता है खेल?

वर्ल्ड कप हॉकी के लिए जर्सी लॉन्च पर खेल को प्रमोट करने के लिए बने प्रोमो पर सवाल

Updated On: Sep 07, 2018 07:39 PM IST

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi

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क्या सबसे बड़े हीरो को गुमनाम बताने से ही प्रमोट होता है खेल?

भव्य समारोह. दमकता हॉल. चमकते चेहरे. हर चेहरे पर खुशी. ऐसा लग रहा था, जैसे एशियन गेम्स में गोल्ड न जीतने की निराशा पीछे छूट गई है. किसको बाहर किया जाएगा, किसे नोटिस पर रखा जाएगा.. इन कयासों पर भी चिंता की लकीरें नहीं थी. वर्ल्ड कप की तैयारी है. मौका था टीम की नई जर्सी लॉन्च किए जाने का.

मुंबई में इस समारोह की चमक-दमक के बीच एक प्रोमो भी चलाया गया. प्रोमो या एमसी के मुताबिक अपील में भारतीय कप्तान श्रीजेश, सरदार सिंह और मनप्रीत सिंह थे. वे बता रहे थे कि आप सानिया मिर्जा, सायना नेहवाल, पीवी सिंधु, विजेंदर, विराट कोहली सबको जानते हैं... लेकिन क्या आप मुझे जानते हैं? मैं हूं सरदार सिंह.

क्या वाकई भारतीय खेल प्रेमी सरदार सिंह को नहीं जानते? अगर सरदार या श्रीजेश को नहीं जानते तो यकीनन वो बाकी खिलाड़ियों को तो नहीं ही जानते होंगे. आखिर सरदार और श्रीजेश इस टीम के सबसे अनुभवी खिलाड़ी हैं. एशियन गेम्स के गोल्ड से लेकर चैंपियंस ट्रॉफी का मेडल उनके पास है. सरदार इस देश के सबसे बड़े खेल अवॉर्ड राजीव गांधी खेल रत्न से सम्मानित हो चुके हैं. ऐसे में अगर खेल प्रेमी उनको नहीं जानते, तो फिर क्या वे वाकई इस बात की फिक्र करेंगे कि हॉकी टीम क्या कर रही है?

sardar singh

मार्केटिंग से जुड़े लोग हॉकी में गुमनामी ही क्यों बेचना चाहते हैं

आखिर ऐसा क्यों है कि जो लोग हॉकी के प्रोमो बनाते हैं, उन्हें गरीबी, मुफलिसी, गुमनामी जैसी बातें ही नजर आती हैं. कुछ समय पहले स्टार स्पोर्ट्स ने एक प्रोमो बनाया था. इसमें खाली प्रेस कांफ्रेंस दिखाई गई थी. यह बताने की कोशिश की गई थी कि कोई नहीं आता. कोई आए तो सही. अब यह दिखाने की कोशिश की गई है कि हर खेल के खिलाड़ियों के नाम सुने गए हैं, बस हॉकी के नहीं. किसी खेल को प्रमोट करने का इससे बुरा तरीका नहीं हो सकता.

समस्या इस बात की है कि जो लोग हॉकी को प्रमोट करने के लिए लाए जाते हैं, वे शायद ही कभी हॉकी से जुड़े रहे हों. वे इस खेल की मुफलिसी बेचते हैं. खुद को अमीर करते हैं और फिर चले जाते हैं. सवाल यह है कि अगर इस खेल के सबसे बड़े खिलाड़ियों को भी कोई नहीं जानता, तो इस खेल को लोगों तक कैसे पहुंचाया जाएगा? लेकिन शायद प्रोमो बनाने वालों और उसे मंजूरी देने वालों के दिल मे यह सवाल नहीं आया.

यह कार्यक्रम ओडिशा सरकार की तरफ से था. ओडिशा ही इस वक्त भारतीय हॉकी का स्पॉन्सर है. ओडिशा ऐसी जगह है, जहां हॉकी अच्छी-खासी लोकप्रिय है. इसी वजह से तमाम बड़े टूर्नामेंट भुवनेश्वर को मिले हैं. वहां स्टेडियम भरा होता है. वहां भी अगर ऐसे प्रोमो को प्रमोट किया जाएगा, तो बाकी जगह की तो बात ही क्या करें.

क्या ऐसे प्रोमो शूट करने में खिलाड़ियों को तकलीफ नहीं होती

नहीं पता कि इस तरह के प्रोमो बनने पर टीम कैसे रिएक्ट करती है. खिलाड़ी इस तरह का प्रोमो दिखाकर खुश हैं या नहीं. लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि उनके पास मना करने का विकल्प नहीं है. उनके लिए तो शूट करना जरूरी है. लेकिन यह हॉकी इंडिया और प्रायोजक को समझना पड़ेगा कि अगर आप खुद को बड़ा नहीं मानेंगे, तो दुनिया आपको कभी बड़ा नहीं मानेगी.

hockey world cup

एक किस्सा याद आता है. काफी साल पहले की बात है. धनराज पिल्लै से किसी ने सचिन तेंदुलकर के बारे मे जानना चाहा. धनराज हमेशा ही तेंदुलकर की तारीफ करते हैं. उन्होंने तारीफ की. इसके बाद तुलना शुरू हुई कि क्रिकेटर्स को इतना मिलता है, हॉकी खिलाड़ी को नहीं. धनराज शायद इस तरह की तुलना चाहते नहीं थे. उन्होंने जवाब दिया- धनराज पिल्लै ओलिंपियन है, सचिन तेंदुलकर कभी ओलिंपियन नहीं बन सकता.

यह बात धनराज ने किसी घमंड में नहीं कही थी. यह उस गर्व का नतीजा थी, जो उन्हें अपने खेल पर रहा. भले ही 1998, एशियन गेम्स के बाद नाराजगी में उन्होंने कहा हो कि अपने बच्चों को कभी हॉकी नहीं खिलाऊंगा. वो भारतीय हॉकी से नाराज भी रहे. लेकिन वो हमेशा उस खेल पर गर्व करते रहे और खुद को बेस्ट मानते रहे. एक बार अनिल कुंबले ने कहा था कि अगर आप खुद को बेस्ट नहीं समझेंगे, तो दुनिया आपको कैसे समझेगी? कुंबले ने अपने बारे में कहा था कि जब मैं खेलता हूं, तो मुझे लगता है कि मुझसे बेहतर और कोई नहीं है. यह रवैया होना किसी भी खिलाड़ी के लिए जरूरी है.

यही रवैया हॉकी टीम में भी होना जरूरी है. एशियन गेम्स में ऐसा नहीं दिखा. अगर कोई प्रेशर मैच न हो, तो मलेशिया जैसी टीम को 10 में नौ बार यह टीम हरा सकती है. लेकिन एशियन गेम्स के सेमीफाइनल में हारी. शायद कहीं मन में है कि हम बेस्ट नहीं हैं. उसके बाद, हर बार इस तरह के प्रोमो बनते हैं. कभी किसी ब्रॉडकास्टर की तरफ से तो कभी किसी स्पॉन्सर की तरफ से. रवैया बदलिए, गेम भी बदलेगा. हॉकी प्रमोट करने वाले लोग अपने दिमाग से मुफलिसी और गुमनामी को निकाल दें. यह खेल अलग दिखेगा.

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