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नई सरकार बनते ही नगालैंड में कौन लेगा इंदिरा गांधी की जगह

नई सरकार बनते ही पहली कैबिनेट मीटिंग ने लिया इंदिरा गांधी स्टेडियम का नाम बदलने का फैसला

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi Updated On: Mar 09, 2018 01:30 PM IST

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नई सरकार बनते ही नगालैंड में कौन लेगा इंदिरा गांधी की जगह

एक नाम है- टी.आओ. नाम सुना है? ज्यादातर लोगों ने शायद ही सुना होगा. कम से कम भारत के जिस हिस्से में हम रहते हैं, वहां ज्यादातर युवाओं ने यह नाम नहीं सुना होगा. अब जरा गौर कीजिए कि इस नाम की चर्चा आज क्यों है. नगालैंड मे सरकार बनने के बाद कैबिनेट की मीटिंग हुई. कैबिनेट की पहली मीटिंग में जिस नाम पर बात हुई, वो यही था. कैबिनेट में फैसला हुआ कि इस नाम से एक और नाम को बदला जाएगा. जिस नाम की जगह टी.आओ का नाम आया, वो इंदिरा गांधी हैं.

कोहिमा में इंदिरा गांधी स्टेडियम है. बार-बार इस पर चर्चा होती रही है कि आखिर खेल के स्टेडियमों के नाम राजनेताओं पर क्यों हों. इस देश में राजीव गांधी, नेहरू, इंदिरा गांधी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर खेलों के स्टेडियम हैं. इसी परंपरा में कोहिमा का भी स्टेडियम है, जिसका नाम इंदिरा गांधी के नाम पर है. नगालैंड सरकार की पहली मीटिंग में वीआईपी कल्चर खत्म करने से लेकर जिन मुद्दों पर बात हुई, उनमें यह भी शामिल था कि इंदिरा गांधी स्टेडियम का नाम बदला जाए. अब वो टी. आओ के नाम पर हो.

कौन हैं टी. आओ? क्यों उनके नाम पर स्टेडियम बनाने की बात हुई है? क्या महज इसलिए, क्योंकि इंदिरा गांधी का नाम हटाना है? क्या यह उसी तरह की प्रतिक्रिया है, जैसे त्रिपुरा में लेनिन को लेकर हुई थी और मूर्तियां तोड़ी गई थीं? बिल्कुल नहीं. यह ऐसा फैसला है, जिससे शायद ही कोई असहमत हो.

डॉक्टर तालिमेरेन आओ का क्या है योगदान

सबसे पहले जानिए कि टी. आओ का पूरा नाम है डॉक्टर तालिमेरेन आओ. फुटबॉल प्रेमी, खासतौर पर जिन्हें भारतीय फुटबॉल का इतिहास पता है, वे उन्हें जरूर जानते होंगे. तालिमेरेन आओ फुटबॉलर थे. 1948 के लंदन ओलिंपिक्स में भारत के झंडाबरदार थे. झंडाबरदार यानी ओपनिंग सेरेमनी में भारतीय तिरंगे के साथ उन्होंने दल का नेतृत्व किया था. याद रखिए, उससे महज एक साल पहले ही देश आजाद हुआ था. तो उस मुल्क में वो तिरंगे के साथ भारतीय दल का नेतृत्व कर रहे थे, जिसकी गुलामी से हिंदुस्तान आजाद हुआ था.

उत्तर भारत में या हिंदी भाषी बेल्ट में शायद उनके बारे में लोग नहीं जानते हों. लेकिन नगालैंड में वो हमेशा हीरो रहे हैं. उनके नाम पर भारत सरकार ने डाक टिकट भी जारी किया था. ऐसा भी नहीं कि देश में उनके नाम पर कोई स्टेडियम न हो. असम में गुवाहाटी और कालियाबोर में उनके नाम पर स्टेडियम हैं. असम वो राज्य है, जहां आओ रहे थे.

तालिमेरेन का मतलब होता है बहुत ताकतवर. हिंदी भाषी क्षेत्र के बच्चे उन्हें शक्तिमान या फैंटम समझ सकते हैं. आओ ने मोहन बागान का नौ सीजन तक प्रतिनिधित्व किया. 1943 से 1952 यानी गुलाम भारत से आजाद भारत तक. मिड फील्ड और डिफेंस में खेलने वाले आओ ने सैलेन मन्ना और ताज मोहम्मद के साथ लंदन ओलिंपिक्स में देश का प्रतिनिधित्व किया था. football-novy-1280

तालिमेरेन नंगे पांव खेला करते थे. उस समय काफी फुटबॉलर नंगे पांव खेलते थे. यहां तक कि 1948 ओलिंपिक में हॉकी टीम के दो सदस्य केडी सिंह बाबू और किशन लाल नंगे पांव खेले थे. एक ब्रिटिश पत्रकार ने तालिमेरेन से पूछा था कि उनकी टीम नंगे पांव क्यों खेलती है, तो जवाब मिला – खेल का नाम फुटबॉल है, बूटबॉल नहीं. ओलिंपिक में भारत को बर्मा के खिलाफ वॉकओवर मिला था. फिर फ्रांस से 1-2 से हार गए थे. यहां भारत ने दो पेनल्टी मिस की थीं.

डॉक्टर बनने के लिए छोड़ दिया था फुटबॉल करियर

एक समय उन्होंने डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए फुटबॉल को छोड़ दिया था. अपने पिता से उन्होंनो डॉक्टर बनने का वादा किया था. इसे पूरा करना उनके लिए जरूरी था. वादा पूरी भी किया. अपने शहर कोहिमा के सिविल हॉस्पिटल में वो असिस्टेंट सिविल सर्जन हो गए थे. 1978 में वो यहां से रिटायर हुए. 1998 में 80 साल की उम्र में उनका निधन हो गया. नगालैंड को राज्य बनाने में भी उनका योगदान रहा.

नगालैंड में जगह है मोकोकचुंग. वहां आओ जनजाति के लोग होते हैं. नगाओं की 16 जनजातियों में एक है यह. वहां गांव है चांगकी, जहां से तालिमेरेन आए थे. छह या सात साल के थे, जब एक बैपटिस्ट ने उनके परिवार को चांगली से इंपुर में बसा दिया था. वे मिशनरी काम में इस परिवार को लगाना चाहते थे. 12 बच्चों में तालिमेरेन चौथे नंबर पर थे. वहां मिशन कंपाउंड में उन्होंने फुटबॉल खेलना शुरू किया. वो भी कपड़े के चिथड़ों से बनी बॉल के साथ. कहा जाता है कि वो दोनों पांवों से खेलते थे और यहीं उन्होंने इसमें महारत हासिल की. वो स्कूल टीम के कप्तान बने.

तालिमेरेन फिर गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज आ गए, जहां अब उनके नाम पर एक स्टेडियम है. यहां उन्होंने एथलेटिक्स, वॉलीबॉल और फुटबॉल में कई पदक जीते.  ईएसपीएन के एक आर्टिकल के मुताबिक यहां से जब वो वापस गए, तो सारी ट्रॉफी अपन दोस्त को दे गए, क्योंकि चांगकी जाने के लिए ट्रेन और बस के अलावा काफी दूरी पैदल तय करनी होती थी. ज्यादा सामान के साथ वो संभव नहीं था.

इन हालात से निकलकर उन्होंने भारत की कप्तानी तक का सफर तय किया. बल्कि कहा तो यह भी जाता है कि दुनिया के बड़े फुटबॉल क्लब से उन्हें ऑफर था. लेकिन वह भारत नहीं छोड़ना चाहते थे. इन सबके बीच आज उनकी चर्चा हो रही है.

क्या राजनेताओं के नाम पर बने और भी स्टेडियमों के नाम बदले जाएंगे

अच्छी बात होगी अगर यह चर्चा आगे बढ़े. देश की राजधानी दिल्ली मे जो बड़े स्टेडियम हैं, उनमें क्रिकेट स्टेडियम का नाम फिरोजशाह कोटला है. बाकी खेलों के लिए जवाहरलाल नेहरू, अंबेडकर स्टेडियम हैं. इंदिरा गांधी स्टेडियम भी दिल्ली में है. जाहिर है, इन तीनों का खेलों से कोई खास लेना-देना नहीं.

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एक समय खेल मंत्री रहते उमा भारती ने दो स्टेडियमों के नाम बदले थे. नेशनल स्टेडियम का नाम ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम कर दिया था, जिसकी बड़ी सराहना हुई थी. लेकिन साथ ही तालकटोरा स्विमिंग कॉम्प्लेक्स का नाम श्यामा प्रसाद मुखर्जी तरणताल रख दिया गया था. उम्मीद है, नगालैंड से प्रेरणा ली जाएगी. सिर्फ बदलने के लिए नाम नहीं बदले जाएंगे. उनके नाम पर बदले जाएंगे, जिन्होंने खेलों के लिए वाकई कुछ किया है.

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