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अलविदा 2016: जिसने 'सर्कस' को खेल बना दिया

दीपा कर्माकर ने 2016 में आम लोगों को जिम्नास्टिक्स का मतलब समझाया

Updated On: Dec 30, 2016 02:55 PM IST

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi

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अलविदा 2016: जिसने 'सर्कस' को खेल बना दिया

उत्तर-पूर्व भारत से एक लड़की आई थी. वो भी त्रिपुरा से. आसपास के लोगों से त्रिपुरा की राजधानी पूछ लीजिए. देखिए, कितने लोग  बता पाते हैं. देश के सबसे छोटे राज्यों में एक है त्रिपुरा. खेल ऐसा, जिसे खुद इस खिलाड़ी के शब्दों में, लोग सर्कस से अलग नहीं समझते थे.

दीपा कर्माकर उस खेल में टॉप पर पहुंचने का इरादा लेकर आई थीं. अपने हर इंटरव्य में वो कहती थीं कि ये खेल है, सर्कस नहीं. लोगों को समझना चाहिए. 2016 खत्म होते-होते या यूं कहें कि इस साल अगस्त में ही लोगों को समझ आ गया कि जिम्नास्टिक्स और सर्कस में फर्क होता है.

जिम्नास्टिक्स में भी दीपा ने सबसे मुश्किल इवेंट चुना- प्रोद्यूनोवा. लेकिन इसे चुनने के पीछे एक वजह थी. उन्हें और उनके कोच बिश्वेश्वर नंदी को पता था कि अगर पदक आएगा, तो मुश्किल इवेंट में ही आएगा.

कद भले ही चार फुट 11 इंच हो, लेकिन दीपा के इरादे एवरेस्ट की तरह ऊंचे और बुलंद थे. 1964 के बाद पहली बार किसी जिम्नास्ट ने ओलिंपिक के लिए क्वालिफाई किया था. दीपा इस मौके को खोना नहीं चाहती थीं.

ओलिंपिक से पहले उनका अभ्यास दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में हुआ. उन्हें विदेश जाने के लिए कहा गया था. दिलचस्प है कि जब खिलाड़ियों में सरकारी मदद लेने और विदेश जाने की होड़ होती है, उस समय दीपा ने मना कर दिया.

on Day 9 of the Rio 2016 Olympic Games at the Rio Olympic Arena on August 14, 2016 in Rio de Janeiro, Brazil.

साई के महानिदेशक इंजेती श्रीनिवास ने उनसे पूछा तो उनका जवाब था कि मैं दिल्ली में ही प्रैक्टिस करना चाहती हूं. उन्होंने सिर्फ फोम पिट लगवाने के लिए कहा, जो चंद दिनों में लग गई.

यहां तक कि दीपा के लिए जो पैसे टॉप्स स्कीम में तय हुए थे, उसे भी वो लेने को तैयार नहीं थीं. उनका जवाब यही था कि मुझे सिर्फ अभ्यास के लिए सुविधाएं दे दीजिए, मुझे और कुछ नहीं चाहिए. ईश्वर करे, जीवन भर उनकी ये सादगी बनी रहे. सादगी और कड़ी मेहनत, यही उनकी पहचान है.

वो आठ अगस्त था. दीपा ने फाइनल के लिए क्वालिफाई किया. 14 अगस्त को फाइनल था. उस रात मानो पूरा भारत जग रहा था. उस छोटी सी लड़की के बुलंद हौसलों को देखने के लिए.

दीपा के चेहरे पर मुस्कान थी. एक समय वह दूसरे स्थान पर थीं. लेकिन इवेंट खत्म हुआ तो वो चौथे स्थान पर रहीं. दीपा के चेहरे पर अब भी मुस्कान थी. उन्होंने साथियों को बधाई दी.

बाद में इंटरव्यू के समय उन्होंने कहा- मैं अपने प्रदर्शन से बहुत खुश थी. लेकिन आप लोगों के चेहरे पर निराशा देखकर लग रहा है कि क्या मिस कर दिया. यह भी उनकी सादगी की ही एक मिसाल है. दीपा देश लौटीं. अब अच्छी बात ये है कि उन्हें अब अभ्यास के लिए घर से दूर दिल्ली रहने की जरूरत नहीं होगी.

अगरतला में ही उनके लिए अभ्यास की सभी सुविधाएं दी जा रही हैं. वाकई, दीपा वो लड़की हैं, जिन्होंने देश में एक खेल की सूरत बदल दी. अब भारत में जिम्नास्टिक्स को शायद ही कोई सर्कस कहे.

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