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CWG 2018: स्कूल गर्ल से 'गोल्डन गर्ल' बनने तक का 14 वर्ष का सफर, कुछ ऐसा रहा मनिका के लिए

कॉमनवेल्थ गेम्स की टेबल टेनिस के इतिहास में वह गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं

Updated On: Apr 16, 2018 09:34 AM IST

Manoj Chaturvedi

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CWG 2018: स्कूल गर्ल से 'गोल्डन गर्ल' बनने तक का 14 वर्ष का सफर, कुछ ऐसा रहा मनिका के लिए

भारत का गोल्ड  कोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स में झोली भरकर पदक जीतना अप्रत्याशित नहीं है, बल्कि कुछ खेलों में पदक जीतना जरूर सुकून पहुंचाने वाला है. इसमें सबसे खास टेबल टेनिस खिलाड़ी मनिका बत्रा का दो गोल्ड सहित चार पदक जीतना है. मनिका ने इस गोल्ड जीतने के दौरान अपने से ऊंची रैंकिंग की सिंगापुर की दो खिलाड़ियों मेंगयू और तियानवेई  फेंग का फतह किया. कॉमनवेल्थ गेम्स की टेबल टेनिस के इतिहास में वह गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं. पुरुष वर्ग में जरूर अचंत शरत कमल 2006 के मेलबर्न कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीत चुके हैं, पर दो गोल्ड सहित चार पदक किसी अन्य भारतीय टेबल टेनिस खिलाड़ी ने नहीं जीते हैं.

मनिका को दो गोल्ड सहित चार पदक

मनिका बत्रा ने फाइनल में सिंगापुर की मेंगयू को हराकर महिला एकल खिताब जीतकर इतिहास बनाया. इसके अलावा मौमा दास के साथ मिलकर महिला युगल और मिश्रित युगल में कांस्य पदक के अलावा महिला टीम का स्वर्ण पदक जीता. कोच मेसिमो कांस्टेनटाइन कहते हैं कि इन खेलों से एक महीने पहले ही यह अहसास होने लगा था कि मनिका गोल्ड कोस्ट में कुछ खास करेगी, क्योंकि उसने विश्व की 24वें और 25वें नंबर की खिलाड़ी को हराया था, पर वह यह मानते हैं कि उन्हें मनिका से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद तो थी पर इतने पदक जीतने की उम्मीद कतई नहीं थी. मनिका इन गेम्स के टॉप दो खिलाड़ियों को हराना सुखद अनुभव मानती हैं पर वह महिला युगल के फाइनल में हारने से निराश भी हैं.

मनिका बत्रा गोल्डन गर्ल बनी कैसे

मनिका को गोल्डन गर्ल बनने में उसकी मेहनत तो है ही पर उसके खेल में राष्ट्रीय कोच मेसिमो कांस्टेनटाइन ने भी अहम भूमिका निभाई है. मेसिमो जानते हैं कि सिंगापुर की खिलाड़ी विश्व स्तरीय हैं और उनकी स्पीड और स्पिन से पार पाना आसान नहीं है. इसलिए उन्होंने बत्रा को लंबे दानों वाली रबड़ लगे रैकेट से खिलाना शुरू किया. शुरुआत में उसे इससे खेलने में दिक्कत हुई पर मेहनत करने से वह इसमें पारंगत हो गई. इस बदलाव ने मनिका को शिखर पर पहुंचा दिया. इसके अलावा बत्रा ने गोल्ड कोस्ट के लिए जर्मनी में एक माह अभ्यास करके तेज सर्विस, स्मैश और गेंद पर बेहतर कंट्रोल की ट्रेनिंग लेकर अपने को चैंपियन बनाया.

माता-पिता की मेहनत का भी है योगदान

राजधानी दिल्ली के नारायणा विहार में रहने वाले गिरीश और सुषमा बत्रा ने बेटी की ट्रेनिंग को देखते हुए कई स्कूल बदल दिए थे. यह सफर आखिर में हंसराज मॉडल स्कूल में जाकर रुका. इस स्कूल में रहने के दौरान उन्होंने जब आठ साल की बालिकाओं का राज्य स्तरीय खिताब जीता तो उनके करियर ने सही शेप लेनी शुरू की. इस समय ही माता पिता ने बेटी के लिए संदीप गुप्ता से प्रशिक्षण दिलवाना शुरू किया. कुछ ही समय में वह दिल्ली की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बन गई. उन्होंने 15 साल की उम्र में राष्ट्रीय चैंपियनशिप में रजत पदक जीता. इसके बाद उन्होंने सफलताएं लगातार उनके कदम चूमने लगीं. 2011 में चिली ओपन के अंडर-21 वर्ग में रजत पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलताएं पाने का शुरू हुआ सिलसिला कॉमनवेल्थ गेम्स में दो स्वर्ण सहित चार पदक जीतने तक पहुंचा है.

मॉडल बनने का मौका छोड़ा

 मनिका बत्रा जितना अच्छा खेलती हैं, दिखने में भी उतनी ही खूबसूरत हैं. वह जब हंसराज मॉडल स्कूल में शिक्षा पूरी करके ग्रेजुएशन के लिए जीसस एंड मैरी कालेज में पढ़ने गई. इस दौरान उनका खेल तो सुर्खियां पाने ही लगा. साथ ही उन्हें मॉडलिंग के भी प्रस्ताव मिलने लगे. घर से जुड़े कुछ लोग इस पक्ष वाले थे कि  मनिका को टेबल टेनिस खेलना छोड़कर मॉडलिंग को करियर के तौर पर अपना लेना चाहिए, लेकिन  मनिका ने टेबल टेनिस पर ही फोकस बनाए रखने का फैसला किया. इसका ही परिणाम है कि वह आज इस मुकाम पर खड़ी हैं.

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