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CWG 2018 : अगर कोई ‘क्रिकेट फैन’ झंडा नहीं हिलाएगा तो भारत मेडल नहीं जीतेगा?

कॉमनवेल्थ खेलों के टीवी प्रोमो में क्रिकेट फैन सुधीर झंडा फहराते नजर आते हैं जिनका इन खेलों से कोई मतलब नहीं है

Updated On: Apr 03, 2018 03:37 PM IST

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi

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CWG 2018 : अगर कोई ‘क्रिकेट फैन’ झंडा नहीं हिलाएगा तो भारत मेडल नहीं जीतेगा?

सोनी टेन या सोनी सिक्स चैनल अपने टीवी सेट पर लगाइए. हर कुछ समय बाद आपको एक शख्स झंडा फहराते दिखेगा. टैग लाइन नजर आएगी ‘रंग दे तिरंगा’. खेल देखने वालों के लिए यह शख्स बिल्कुल अनजान नहीं है. भारत के क्रिकेट मैचों में इसे देखा जा सकता है. इसका नाम सुधीर है, जिसके लिए सचिन तेंदुलकर भगवान हैं. उसी के शब्दों में क्रिकेट के अलावा वो कुछ सोच नहीं पाता. ऐसे में सुधीर किसके लिए झंडा हिला रहा है? क्या किसी क्रिकेट इवेंट के लिए? जाहिर है, ऐसा नहीं है.

अब सवाल उठता है कि सुधीर का अगर उन खेलों से कोई लेना-देना नहीं है, जो कॉमनवेल्थ खेलों में होते हैं, तो इस ‘क्रिकेट प्रशंसक’ का प्रोमो में क्या काम? क्या वाकई हमारे खेल चैनल मैदान से कट गए हैं कि उन्हें टीवी पर दिखने वाला ऐसा चेहरा ही नजर आया, जिसकी पहचान सिर्फ क्रिकेट से है. क्रिकेट कॉमनवेल्थ गेम्स का हिस्सा रहा है, लेकिन उस बात को 20 साल हो गए हैं. यकीनन खेल चैनल के लोगों को मैदान पर उतरने की जरूरत है, ताकि वे समझ सकें कि जुनूनी फैन टीवी स्क्रीन के अलावा मैदान पर भी दिखते हैं.

इंग्लैंड में है हॉकी प्रेमियों का ग्रुप

इंग्लैंड में एक ग्रुप है, जिसमें ज्यादातर या कहें कि सभी सिख हैं. यह ग्रुप हर उस जगह जाता है, जहां भारतीय हॉकी टीम खेल रही हो. अगर टीवी स्क्रीन पर ही दिखने वालों लोगों को लिया जाना तय किया गया था, तो इस ग्रुप के बारे में सोचा जा सकता था. इस ग्रुप में भारतीय लोग भी शामिल हो जाते हैं. शायद ही कोई बड़ा इवेंट हो, जिसमें यह ग्रुप न नजर आता हो. ओलिंपिक, एशियाड, कॉमनवेल्थ गेम्स से लेकर हॉकी वर्ल्ड कप या और कोई भी बड़ा इवेंट.

शंख और घंटी वाले सरदारजी

इसी तरह स्थानीय स्तर पर जाएं, तो तमाम जुनूनी फैन दिखेंगे. याद आता है 2005 चेन्नई में हुई हॉकी की चैंपियंस ट्रॉफी. साइक्लोन की वजह से वहां हर रोज तेज बारिश होती थी. इतनी तेज बारिश की कुछ मीटर दूर देखना संभव नहीं होता था. ऐसा स्टैंड, जो कवर नहीं था, वहां लोग बचने के लिए किसी और जगह शरण लेते थे. ऐसे में एक सरदार जी अकेले स्टैंड में भीगते नजर आते थे. उनके हाथ में घंटी और शंख था. टीम के हर अच्छे मूव पर घंटी और शंख की आवाज से वो हौसला बढ़ाते थे. इन्हें दिल्ली के नेशनल, शिवाजी और अंबेडकर स्टेडियम में लगातार देखा जाता था, जहां हॉकी और फुटबॉल के इवेंट होते हैं. बल्कि मैच के बाद वो खिलाड़ियों से मिलते थे, जो उनका बड़ा सम्मान करते थे.

ऐसे फैन की कहानी, जिसने खिलाड़ी बनाए

सीनियर जर्नलिस्ट नॉरिस प्रीतम एक ऐसे ही शख्स की कहानी सुनाते हैं, जिनकी नेशनल स्टेडियम में कैंटीन थी. उनका नाम बनारसी दास मल्होत्रा था. बनारसी दास की कैंटीन हर उस शख्स के लिए फ्री थी, जिसके पास पैसे नहीं थे. लेकिन खेल का जुनून था. वो हर मैच देखते थे. चाहे वो हॉकी हो, फुटबॉल या एथलेटिक्स. बल्कि नॉरिस प्रीतम के मुताबिक एक मूक-बधिर एथलीट सतीश का करियर बनाने में उनका बड़ा रोल था. उन्होंने खाने-पीने से लेकर हर तरह से सतीश की मदद की.

दिल्ली के शिवाजी और अंबेडकर स्टेडियम में ग्रुप आया करते थे. उनमें हर आदमी खेल का जानकार होता था. कई बार वे अखबारों के रिपोर्ट को बताते थे कि आपने अपनी स्टोरी की एक लाइन गलत लिखी है. फलां मूव इस तरह नहीं, दूसरी तरह बना था. इसी तरह अंबेडकर स्टेडियम में फुटबॉल मैच के दौरान जामा मस्जिद के आसपास का पूरा ग्रुप होता था. वो माहौल अलग नजर आता था.

जब फैन्स ने बनाया नया गोल पोस्ट

एक और कहानी है, जो महान हॉकी खिलाड़ी अशोक कुमार ने सुनाई थी. नेहरू हॉकी का मैच था, जिसमें इंडियन एयरलाइंस की टीम खेल रही थी. अशोक कुमार और बीपी गोविंदा जैसे खिलाड़ी उसका हिस्सा थे. एक मूव पर गोविंदा ने डाइव मारी. गोविंदा का सिर गोल पोस्ट से लगा. गोल पोस्ट टूट गया. दूसरा गोल पोस्ट नहीं था. घोषणा की गई कि मैच नहीं हो पाएगा, क्योंकि गोल पोस्ट नहीं है. शिवाजी स्टेडियम के ठीक पीछे हनुमान मंदिर से एक ग्रुप बैठा था, जिसे यह मंजूर नहीं था. वे रोज मैच देखने आते थे. उन्होंने विरोध किया कि गोल पोस्ट हम बनाएंगे. मैच कराइए. लकड़ी लाई गई. गोल पोस्ट बना. मैच हुआ. दिलचस्प यह है कि गोविंदा वो मैच खेले. पूरे सिर पर पट्टी बंधे होने के बावजूद.

जिन फैन्स की बात की है, वे दिल्ली या आसपास के हैं. जाहिर है, ऐसे फैन्स देश भर में होते होंगे. लेकिन ऐसा लगता नहीं कि टीवी चैनल्स को अब इस तरह के फैन्स की कोई जरूरत है. उनके लिए कॉमनवेल्थ गेम्स या किसी भी ओलिंपिक इवेंट के प्रोमो का मतलब किसी ऐसे शख्स को पकड़ लेना है, जिसकी पहचान क्रिकेट रही हो. यूं तो मिल्खा सिंह से लेकर तमाम बड़े खिलाड़ी भी प्रोमो का हिस्सा हो सकते थे. लेकिन अगर कोई फैन ही चुनना था, तो कम से कम देश के खेल मैदानों पर तो जाते. इतना तय है कि तब निराशा नहीं होती.

(तस्वीरें यू ट्यूब और फेसबुक पेज से साभार)

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