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एशिया कप हॉकी:  भारत के लिए कितना फर्क लाएगा दस साल बाद का रविवार

ढाका में खिताबी जीत भारत के लिए खुशियों से ज्यादा सबक लेकर आई है

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi Updated On: Oct 23, 2017 03:22 PM IST

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एशिया कप हॉकी:  भारत के लिए कितना फर्क लाएगा दस साल बाद का रविवार

वो रविवार का दिन था. तारीख थी नौ सितंबर, साल 2007. चेन्नई में एगमोर के मेयर राधाकृष्णन स्टेडियम में जितने लोग अंदर थे, करीब उतने ही बाहर थे. उन्हें टिकट नहीं मिले थे. इस वजह से वे बाहर से ही टीम इंडिया की हौसलाअफजाई कर रहे थे. एशिया कप का फाइनल उस दिन था. भारत 7-2 से जीता था, दक्षिण कोरिया को हराकर.

दस साल बीत गए. 2017 में 22 अक्टूबर का रविवार. यहां भारत दस साल बाद एशिया का किंग बना. इस जीत से भारत वाकई सही मायनों में एशिया का किंग बना है. एशियाई खेलों का स्वर्ण भारत के नाम है. एशियाई चैंपियंस ट्रॉफी चैंपियन भारत है. अंडर-18 एशिया कप भी भारत के नाम है. अब सीनियर एशिया कप जीत ही लिया है.

तो क्या वाकई अब भारत को कम से कम एशिया के स्तर पर फिक्र की जरूरत नहीं है? याद रखिए, दस साल पहले का रविवार भी ऐसी ही सोच लेकर आया था. याद कीजिए कि उसके बाद क्या हुआ था. 2008 के मार्च में ओलिंपिक क्वालिफायर्स हुए थे. चिली में उस टूर्नामेंट में भारत सिर्फ एक मैच हारा था. उस हार ने भारत को पहली बार ओलिंपिक्स से दूर कर दिया था.

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उसको याद करते हुए अब ढाका में हुए एशिया कप को गौर से देखना चाहिए. श्योर्ड मारिन्ये की कोचिंग में भारतीय टीम पहला टूर्नामेंट खेल रही थी. भारतीय टीम में पीआर श्रीजेश और रूपिंदर पाल सिंह समेत कई सीनियर खिलाड़ी नहीं थे. तमाम खिलाड़ी जूनियर विश्व कप विजयी टीम से लिए गए थे. इस लिहाज से कहा जा सकता है कि तमाम चीजें आजमाने के लिए इस टूर्नामेंट का इस्तेमाल किया गया होगा.

फिर भी, हम भारतीय प्रयोग नहीं, सिर्फ नतीजों पर ध्यान देते हैं. इस लिहाज से टूर्नामेंट बेहद कामयाब रहा. आखिर दस साल के बाद चैंपियन बनना कामयाबी से कम कैसे कहा जाएगा. लेकिन दो मैचों पर नजर जरूर डालनी चाहिए. पहला मैच कोरिया के खिलाफ था. भारत ने यही मुकाबला ड्रॉ खेला. इस मैच में भारत की तमाम कमियां सामने आ गईं. कोरियाई डिफेंस ने दिखाया कि वे कैसे भारतीयों को हताश, निराश कर सकते हैं.

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उसके बाद मलेशिया के खिलाफ फाइनल. भारत को मुकाबला लगभग उसी अंतर से जीतना चाहिए था, जैसे दस साल पहले कोरिया के खिलाफ जीता था. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. भारत ने दूसरे हाफ में ऐसी गलतियां कीं, जिन पर कोई बेहतर टीम मैच को अपनी गिरफ्त में ले सकती थी.

हम ये जरूर कह सकते हैं कि अभी नए कोच का पहला टूर्नामेंट है. ऐसे में वो गलतियां काबू की जा सकती हैं. टीम भी नई है. सीखने का काफी समय है. बस, जरूरत इस बात की है कि इस जीत को शुरुआत माना जाए.

एशियाई हॉकी में पाकिस्तान जहां है, वहां उससे जीतकर आप विश्व में टॉप पर पहुंचने की उम्मीद नहीं कर सकते. मलेशिया बेहतर हुई है, लेकिन विश्व स्तर पर नहीं. कोरिया पैचेज में अच्छा खेली है. ऐसे में एशिया का किंग होना आपको दुनिया का किंग नहीं बनाता. 2007 में हमें यह कड़वा सबक मिला था. उम्मीद है कि इस बार जीत की बुनियाद पर दस साल पहले के मुकाबले बुलंद इमारत खड़ी होगी.

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