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क्या गोपीचंद के साथ भी वही होगा, जो कुंबले के साथ हुआ?

कुंबले के साथ बहुत मेल खाती है कोच गोपीचंद की 'स्टाइल'

Updated On: Jun 25, 2017 02:42 PM IST

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi

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क्या गोपीचंद के साथ भी वही होगा, जो कुंबले के साथ हुआ?

चंद रोज पहले एक सुर्खी थी, जिस पर शायद ज्यादा लोगों की नजर नहीं गई. उस वक्त अनिल कुंबले और विराट कोहली का विवाद हर तरफ छाया हुआ था. जब क्रिकेट कोच और कप्तान के विवाद जैसा मसाला सामने हो, तो कुछ चीजों पर ध्यान कम जाता है. लेकिन खबर गंभीर थी, जिस पर चर्चा की जरूरत है.

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में पुलेला गोपीचंद का इंटरव्यू था. इसमें उन्होंने कहा था कि उनके पास पावर नहीं है. अगर होती, तो नतीजे अलग होते. क्या वाकई? ये वो कोच कह रहा है, जिसके शिष्यों के पास ओलिंपिक पदक हैं. वर्ल्ड चैंपियनशिप से लेकर यूबर कप और सुपर सीरीज खिताब हैं. जिसके शिष्य किदांबी श्रीकांत इस समय दुनिया में धूम मचा रहे हैं.

अथाह पावर रही है गोपीचंद के पास

गोपी के बारे में कहा जाता रहा है कि उनके पास अथाह पावर है. उनसे नाराज खिलाड़ियों से पूछिए, जिनमें ज्वाला गुट्टा भी शामिल हैं. वो बताएंगे कि गोपी किस कदर पावरफुल हुआ करते थे. लेकिन अब नहीं. हालात बदले हैं. अखिलेश दासगुप्ता की मौत ने बैडमिंटन की तस्वीर बदलने की तरफ कदम उठा लिया है. हेमंत बिस्व सर्मा नए हेड हैं. उनके आते ही गोपी के विरोधी मजबूत हो गए हैं. एक तरह से देखा जाए तो सीनियर खिलाड़ियों के चयन के अलावा गोपीचंद के पास रही सारी शक्तियां कम या खत्म करने की कोशिश है.

दिलचस्प है कि गोपी के बारे में इस तरह की खबरें उसी दौरान आईं, जिस वक्त अनिल कुंबले को हटाए जाने के सुर बुलंद हो रहे थे. कुंबले और गोपीचंद के स्टाइल में काफी समानताएं हैं. दोनों के लिए अनुशासन से बड़ा कुछ नहीं है. दोनों को कुछ लोग मजाक और कुछ गंभीरता के साथ ‘हिटलर’ कहते हैं. गोपी की एकेडमी में एक मिनट भी देरी से आने वालों के लिए कोई जगह नहीं. यही बात कुंबले के लिए भी कही जाती है.

गोपीचंद और कुंबले में हैं तमाम समानताएं

गोपी मानते हैं कि डेमोक्रेसी से चैंपियन नहीं बनते. कुंबले भी कुछ ऐसा ही मानते हैं. गोपी ने 2012 के लंदन ओलिंपिक से पहले सायना नेहवाल के खाने-पीने से लेकर घूमने-फिरने, बात करने सबके लिए नियम बनाए थे. एक खिलाड़ी ने उस वक्त मजाक में कहा था कि गोपी सांस लेने का नियम भी  बना सकते हैं. यही काम उन्होंने 2016 में पीवी सिंधु के लिए कहा. बेहद सख्ती की. दोनों जगह नतीजा ये आया कि लंदन में कांस्य था और रियो में सिल्वर पदक मिला.

कुंबले को भी यही लगता है. उन्हें लगता है कि मैच के समय मैदान पर कप्तान बॉस है. लेकिन इसके अलावा, सारे अधिकार कोच के हैं. ज्यादातर खेलों में ऐसा ही होता है. लेकिन क्रिकेट में इस तरह की चीज नहीं देखी गई है. क्रिकेट में कोच तभी हावी हुआ है, जब कप्तान कमजोर दिखे. जैसे अजित वाडेकर और अजहरुद्दीन की जोड़ी के वक्त हुआ था. लेकिन ज्यादातर वक्त कप्तान बॉस होता है. खैर, वो अलग मुद्दा है. यहां चर्चा दोनों के स्टाइल को लेकर है, जो काफी मिलती जुलती है.

दोनों का खेल जीवन भी एक जैसा रहा है

कुंबले और गोपीचंद दोनों का करियर अनुशासन की दास्तान है. दोनों के नाम अपने खेल जीवन में कोई विवाद नहीं है. दोनों ने सार्वजनिक जीवन में भी ऐसी ऊंचाई बनाई, जिसे पाना आसान नहीं. खेल जीवन के बाद दोनों के साथ विवाद जुड़े. वो भी ऐक जैसे ही रहे हैं. कुंबले पर कर्नाटक में कॉन्फ्टिक्ट ऑफ इंटरेस्ट का आरोप लगा. गोपी पर भी यह आरोप लगता रहा है. लेकिन इसके बावजूद गोपी अपना काम करते रहे. उन्हें कोई रोक नहीं पाया, क्योंकि लगातार नतीजे आते रहे.

बैडमिंटन में बदलाव इसी से समझ आता है कि आज की तारीख में भारत के छह पुरुष खिलाड़ी दुनिया के टॉप 35 में हैं. चीन के सात हैं. बीच-बीच में ऐसा वक्त भी आता है, जब भारतीय खिलाड़ी चीन से ज्यादा होते हैं. क्या किसी ने कुछ साल पहले ऐसे हालात की कल्पना की थी?

गोपीचंद के विरोधी मानते हैं कि उनका सपना बैडमिंटन संघ पर कब्जा जमाना है. लेकिन अगर नतीजे आते हुए वो ऐसा करते भी हैं, तो क्या गलत है. गोपी अपने एकेडमी के बच्चों को तरजीह देते हैं. लेकिन वहां से रिजल्ट आए हैं. यहां तक कि उनकी बेटी जीत रही है.

खैर, भारतीय खेलों में राजनीति से ज्यादा राजनीति होती है, ये खेलों से जुड़े लोग जानते हैं. ऐसे में उनके पर कतरने की कोशिश है, जो अब कामयाब होती दिखाई दे रही है. कुंबले और गोपीचंद के मामलों में काफी समानताओं की बात हमने की. अब फर्क की बात. फर्क यह है कि कुंबले कभी उतने ताकतवर नहीं रहे, जितना गोपी रहे. उनके ताकतवर होने की कोशिश को खिलाड़ियों की ‘स्टार पावर’ ने खत्म कर दिया. गोपीचंद बेहद ताकतवर रहे. लेकिन अब नए निज़ाम में उनकी ताकत को ‘सत्ता के पावरफुल लोग’ खत्म करना चाहते हैं.

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