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संडे स्पेशल : कैसा है खेलों की बिना सीमाओं वाली दुनिया का नागरिक होना

क्रोएशिया की अर्जेंटीना पर जीत से सिर्फ अर्जेंटीना के नागरिक दुखी नहीं होंगे, दुनिया भर में मेसी के प्रशंसक भी उनमें शामिल होंगे

Updated On: Jun 24, 2018 10:09 AM IST

Rajendra Dhodapkar

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संडे स्पेशल : कैसा है खेलों की बिना सीमाओं वाली दुनिया का नागरिक होना
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फुटबॉल वैसे तो सारी दुनिया में खेला जाता है, लेकिन कायदे से यह दो महाद्वीपों, यूरोप और दक्षिण अमेरिका का खेल है. अगर इन दोनों महाद्वीपों को हटा दिया जाए तो फुटबॉल कितना बचता है? इन दोनों महाद्वीपों का मिजाज भी बिल्कुल अलग-अलग है. दक्षिण अमेरिका में फुटबॉल का जज्बा मुख्य है और यूरोप में सिस्टम है. यूरोपीय तंत्र इतना अच्छा और व्यापक है कि सारी दुनिया के खिलाड़ी वहीं जाकर निखरते हैं. अफ्रीका की तमाम टीमों और जापान जैसे एशियाई देशों की टीमों के खिलाड़ी यूरोप की लीगों में जाकर ही अपने खेल को इस लायक बनाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला कर सकें.

लीग्स मुकाबले किसी के कम नहीं!

इसलिए यह देखना दिलचस्प होता है कि फुटबॉल के अंतरराष्ट्रीय मंच पर राष्ट्रवाद की क्या स्थिति है? फुटबॉल के कुछ महत्वपूर्ण टूर्नामेंट देशों के बीच ही खेले जाते हैं. लेकिन फुटबॉल में यूरोप की विभिन्न लीग्स का महत्व उनसे कम नहीं है. यूरोप के यूरो कप और दक्षिण अमेरिका के कोपा अमेरिका का बड़ा महत्व है. विश्व कप तो खैर विश्व कप है ही, लेकिन दुनिया में सबसे ज्यादा देखे जाने वाले मुकाबले चैंपियंस लीग के होते हैं. इनमें यूरोप के फुटबॉल क्लब भाग लेते हैं. इनके टीवी पर दर्शक सिर्फ यूरोप में नहीं, सारी दुनिया में होते हैं.

इसी तरह यूरोप के दर्शक कोई कम देशभक्त नहीं होते. लेकिन उनकी दिलचस्पी भी अपने देश के या पड़ोसी देशों की लीग्स में ज्यादा होती है. ला लीगा, बुंदेसलीगा या इंग्लिश प्रीमियर लीग के मैचों में जितनी दिलचस्पी ली जाती है, वह विश्व कप से कम तो नहीं होती. रियाल मैड्रिड, बायर्न म्यूनिख या चेल्सी के वफादार दर्शक उन देशों की टीम के नहीं होंगे. बार्सिलोना के समर्थक आपको सारी दुनिया में मिलेंगे और यह काफी यकीन के साथ कहा जा सकता है कि स्पेन की टीम के उतने समर्थक नही होंगे. मैन यू के समर्थक तो निश्चित रूप से अंग्रेज फुटबॉल टीम के समर्थकों से बहुत ज्यादा होंगे.

यूरोप के लीग तंत्र ने इस तरह फुटबॉल में एक समानान्तर राष्ट्रीयता या उपराष्ट्रीयता को पैदा कर दिया है, जिसके प्रतिबद्ध समर्थकों की तादाद राष्ट्रीय टीमों के समर्थकों से ज्यादा होगी. हालांकि खिलाड़ियों की खरीद फरोख्त चलती रहती है. लेकिन फिर भी तमाम क्लबों की अपनी पहचान है और खिलाड़ियों को भी अपने क्लबों से ज्यादा पहचान मिलती है. सालाह जितने इजिप्ट के हैं उससे ज्यादा पहचान उनकी लिवरपूल से है और मेसी अर्जेंटीना की टीम से ज्यादा बार्सिलोना के खिलाड़ी की तरह पहचाने जाते हैं.

messi

यह मुमकिन है कि बार्सिलोना के समर्थक इसलिए अर्जेंटीना की जीत की इच्छा रखते हों, क्योंकि वे चाहते हैं कि उनके प्रिय खिलाड़ी मेसी कामयाब हों. क्रोएशिया की अर्जेंटीना पर जीत से सिर्फ अर्जेंटीना के नागरिक दुखी नहीं होंगे, दुनिया भर में मेसी के प्रशंसक भी उनमें शामिल होंगे.

लातिनी अमेरिका की स्थिति यूरोप से अलग है. यहां के फुटबॉल पर राष्ट्रीय रंग ज्यादा है, क्योंकि यहां के ज्यादातर देश विकासशील देश हैं.  विकासशील देशों में राष्ट्रवाद का रंग कुछ ज्यादा गहरा होता है. इन देशों में लंबे वक्त तक राजनैतिक अस्थिरता, अराजकता और तानाशाही रही है. अब राजनैतिक स्थिति बेहतर हुई है. हालांकि ग़रीबी अब भी काफी है.

इन देशों में फुटबॉल दबी कुचली जनता के लिए उम्मीद, आजादी और खुशी का प्रतीक रहा है और अब भी है. लेकिन अब हम पाते हैं कि फुटबॉल के प्रति प्रेम तो अब भी बहुत है, लेकिन उससे जुड़ी संकीर्णता और उग्रवाद कम हुआ है. हम याद कर सकते हैं कि ब्राज़ील में पिछले विश्व कप के आयोजन के विरोध ने प्रदर्शन हुए थे क्योंकि लोग आर्थिक संकट के दौर में फुटबॉल विश्व कप पर संसाधन खर्च करने का विरोध कर रहे थे.

Brazil in Saint Petersburg

सत्ताधारी लोगों ने सोचा था कि ब्राजील में विश्वकप आयोजित करने से उनकी लोकप्रियता बढ़ेगी, लेकिन हुआ उल्टा. अब लातिन अमेरिका में राष्ट्रवाद के बरक्स व्यापक लातिन अमेरिकी फुटबॉल की पहचान भी मज़बूत हो रही है. यानी इन देशों में प्रतिस्पर्धा के बावजूद एक भाईचारे का तत्व भी देखने को मिल रहा है. इन देशों के खिलाड़ियों के यूरोपियन लीग में खेलने से भी यहां के दर्शकों का नजरिया विस्तृत हुआ है.

खेलों में यह समानान्तर नागरिकताओं का तत्व इस वक्त दुनिया में उग्र और संकीर्ण राष्ट्रवाद के दौर में एक राहत है. अगर हम किसी अन्य देश के खिलाड़ी या टीम के प्रशंसक होते हैं तो हम राष्ट्रवाद की संकीर्ण परिभाषा से बाहर निकलते हैं. इस मायने में खेल हमें ज्यादा ‘ग्लोबल’ नागरिक बनाते हैं. फुटबॉल विश्व कप देखते हुए यह बात ज्यादा महसूस होती है. अलग-अलग देश की टीमों को समर्थन देते दर्शकों को देखना इसीलिए सुखद है. अपने देश और उसके खिलाड़ियों से लगाव स्वाभाविक है. लेकिन देश की सीमाओं से परे खेल और खिलाड़ियों को समर्थन देना एक अलग स्तर पर हमें संकीर्णता से मुक्त करता है.

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