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फुटबॉलर नितिशा की एडिलेड में मौत का मामला : आपकी बिटिया तो घर पहुंच गई होगी ठीक-ठाक, हमारी कभी नहीं आएगी...

ऑस्ट्रेलिया जाने की खुशी में कम से कम मैंने तो नहीं सोचा था कि, वक्त का महज एक झपट्टा उन खुशियों को नोंच डालने के लिए उतावला बैठा है

Updated On: Dec 19, 2017 07:23 PM IST

Smriti Chauhan

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फुटबॉलर नितिशा की एडिलेड में मौत का मामला : आपकी बिटिया तो घर पहुंच गई होगी ठीक-ठाक, हमारी कभी नहीं आएगी...

स्मृति बेटू लो आशीष दयाल सर का दिल्ली से फोन है आपसे बात करना चाहते हैं. कहकर पापा ने मोबाइल मेरी ओर बढ़ा दिया. सर नमस्ते.. मैंने कहा तो दूसरी ओर से से आशीष सर ने मेरी नमस्ते का जवाब दिया..और बोले स्मृति आप जल्दी से जल्दी दिल्ली कब पहुंच सकती होमैंने कहा सर जब आप कहें तब पहुंच जाऊंगी. क्या कुछ जरूरी काम है! पूछने पर सर बोले..10वें पेसिफिक स्कूल गेम्स के लिए इंडिया की गर्ल्स फुटबॉल की टीम के ट्रायल्स के लिए फॉर्म भरना है. यह काम बहुत जरूरी है.

ट्रायल छत्रसाल (दिल्ली का स्टेडियम) में होंगे. ट्रायल की तारीख तो नहीं मालूम है अभी. हांफॉर्म भरने की अंतिम तारीख 3 नवंबर (2017) है. टीम ऑस्ट्रेलिया के एडिलेड जाएगी. नितीशा (नितीशा नेगी)मोलू (शिवानी)राशि तोमर को भी मैंने ट्रायल के लिए फॉर्म भरने को बोल दिया है. तुम बरेली से अगर दिल्ली आकर तुरंत फॉर्म भरकर जमा कर दोतो शायद सेलेक्शन के चांस बन जाए.

मैंने पूछा कि फॉर्म कहां से मिलेगा. सर ने बताया किदिल्ली गवर्नमेंट एजुकेशन डिपार्टमेंट की वेबसाइट से फॉर्म डाउनलोड कर लेना. जहां तक मुझे ध्यान आ रहा है यह बात थी 30 अक्टूबर 2017 को दिन में करीब 2 बजे की. इंडिया की टीम में सेलेक्शन के लिए ट्रायल में शामिल होने का मौका मिल रहा हैयह जानकर खुशी के मारे पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. उसी समय साइबर कैफे से फॉर्म डाउनलोड किया. 2 नवंबर को ही तड़के करीब 4 चार बजे बरेली से पापा के साथ कार से दिल्ली के लिए रवाना हो गई

ऑस्ट्रेलिया के एडिलेड में 10वें पेसिफिक स्कूल गेम्स में भाग लेने वाली भारतीय गर्ल्स फुटबॉल टीम

ऑस्ट्रेलिया के एडिलेड में 10वें पेसिफिक स्कूल गेम्स में भाग लेने वाली भारतीय गर्ल्स फुटबॉल टीम

तड़के चार बजे हाईवे पर भयानक कोहरा था. मगर घने कोहरे में उस डरावने सफर पर इंडिया की टीम में सेलेक्ट होने की उम्मीद और खुशी ज्यादा भारी साबित हो रही थी. पूरे रास्ते पापा से एक ही बात करती आई...पापा अगर इस टीम में खेलने का मौका मिल गया तो जिंदगी बदल जाएगी. जैसे-तैसे करके मैं पापा-मम्मी और छोटी बहन शगुन के साथ सुबह करीब 9 बजे दिल्ली पहुंच गई. ट्रायल-फॉर्म बरेली से ही साथ लेकर आई थी. फॉर्म भरा. उसी दिन छत्रसाल स्टेडियम में जाकर फॉर्म नवीन शर्मा सर के पास जमा कर आई.

आखिर ट्रायल का दिन भी आ गया. छत्रसाल स्टेडियम में ट्रायल्स हो गए. ट्रायल जिस तरह से फेस कर पाईउससे उम्मीद जागी कि सेलेक्शन के चांसेज तो हैंमगर सेलेक्शन को लेकर श्योर नहीं थी. एक दिन दोपहर को पापा के साथ स्कूल से वापस लौट रही थी. तभी मोलू (शिवानी) का फोन पापा के मोबाइल पर आया. उस वक्त मैं गाजीपुर फ्लाईओवर के पास से गुजर रही थी. मोलू ने पूछास्मृति तेरे पास संजय सर (संजय सिंह फुटबॉल कोच छत्रसाल स्टेडियम दिल्ली) का कोई मैसेज तो नहीं आया. मैंने कहा नहीं तू बता तेरा सेलेक्शन हो गया क्याउधर से मोलू बोली सेलेक्शन को अभी कुछ नहीं पता हैबस तुम संजय सर से अभी बात कर लो.

तुरंत संजय सर को फोन मिलाया. मैंने कहा सर मैं स्मृति चौहान बोल रही हूं...उधर से कोई जवाब मिलने के बजाए सर ने सवाल दागा..स्मृति आपके ट्रैक सूट का क्या नंबर हैआपकी जर्सी का साइज क्या रहता हैमैंने तुरंत जर्सी और ट्रैक सूट का साइज बता दिया. संजय सर ने कहा ठीक है...बेटा....और फोन डिस्कनेक्ट हो गया.

29 नवबंर को शाम तीन-चार बजे छत्रसाल स्टेडियम पहुंच गई. बाकी लड़कियां भी आई हुई थीं. वहां पहुंच कर पता चला कि ऑस्ट्रेलिया साथ जाने वाली टीम मैनेजर और कोच की घोषणा होनी है. सेलेक्टेड खिलाड़ियों के नाम की घोषणा हो गई. सभी 16 गर्ल्स फुटबॉलरों को किट बांट दी गई. हिदायतें दे दी गयीं. बताया गया किएक दिसंबर 2017 की रात एक बजे टीम को दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर रिपोर्ट करना है. वहां से तड़के चार बजे की फ्लाइट से मुंबई और फिर वाया सिंगापुरएडिलेड (ऑस्ट्रेलिया) पहुंचना है.

एडिलेड में 10वें पेसिफिक स्कूल गेम्स में भाग लेने वाली भारतीय गर्ल्स फुटबॉल टीम

एडिलेड में 10वें पेसिफिक स्कूल गेम्स में भाग लेने वाली भारतीय गर्ल्स फुटबॉल टीम

छत्रसाल स्टेडियम में ही बता दिया गया कि टीम के कोच वीरेंद्र सिंह सर होंगे और टीम मैनेजर लीना व्यास मैडम. मेरे जेहन में उसी वक्त सवाल कौंधा किजब लड़कों और लड़कियों की दो फुटबॉल टीमें जा रही हैं तोफिर कोच एक क्योंपापा से पूछा तो वे बोले...यह सोचना खिलाड़ी का काम नहीं है. यह सोचने की जिम्मेदारी प्रतियोगिता आयोजकों (स्कूल गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया मतलब एसजीएफआई) की है. खिलाड़ियों को सिर्फ खेल और खेल के बारे में सोचना चाहिए. मगर जेहन में सवाल जरूर था कि दो फुटबॉल टीमों को एक कोच और एक मैनेजर विदेश में जाकर आखिर कैसे संभाल पाएंगेछत्रसाल स्टेडियम ग्राउंड से ‘किट’ लेकर 29 नवंबर 2017 को शाम करीब साढ़े पांच बजे मैं पापामम्मी और शगुन (छोटी बहन) के साथ कार में आकर बैठ गई.

जहां तक मझे याद आ रहा हैअगले दिन यानी 30 नवंबर 2017 को दिन में नेगी अंकल (नितिशा के पापा) का मेरे पापा के मोबाइल पर फोन आया. वे दोनों आपस में मिलने का टाइम फिक्स कर रहे थे. उस वक्त हम चारों (मम्मी पापा मैं और शगुन) मयूर विहार फेज तीन से लौट रहे थे. फोन काटकर पापा ने बताया कि नेगी जी का फोन था. हमारे घर आने का टाइम पूछ रहे थे. शाम चार से साढ़े चार बजे का टाइम फिक्स हुआ है. नेगी जी हमारे घर (इंदिरापुरमगाजियाबाद) ही आ रहे हैं. कोई खास बात पापानेगी अंकल किसी जरूरी काम से आ रहे है या फिर बस यूं ही मिलने! मैंने उत्सुकता में एक साथ कई सवाल पापा के ऊपर दाग दिए. जवाब मिला- नेगी जी चाहते हैं कि ऑस्ट्रेलिया से वापसी में मुंबई से दिल्ली तुम (मैं) और नितिशा एक ही फ्लाइट से घर लौटो.

शाम करीब पांच बजे नेगी अंकल इंदिरापुरम (हमारे घर पर) आ गए. नेगी अंकल और पापा हम दोनों (नितिशा और मेरी) मुंबई से वापसी की फ्लाइट के बारे में विचार कर रहे थे. पता चला कि 11 दिसंबर 2017 की रात 11 बजे जब हम लोग ऑस्ट्रेलिया (एडिलेड) से वापस मुंबई एअरपोर्ट पर पहुंचेंगेतो उसके तुरंत बाद की या उसी रात की किसी भी एअरलाइंस की टिकट सस्ती नहीं है. लिहाजा अगले दिन शाम चार बजे (12 दिसंबर 2017) की एअर इंडिया की फ्लाइट में मेरी और नितिशा की टिकट बुक कर दी गई.

पेसिफिक स्कूल गेम्स में मैच जीतने के बाद जश्न मनाती भारतीय गर्ल्स फुटबॉल टीम

पेसिफिक स्कूल गेम्स में मैच जीतने के बाद जश्न मनाती भारतीय गर्ल्स फुटबॉल टीम

नितिशा पहली बार विदेश जा रही थी. पहली बार ही वो हवाई जहाज से यात्रा करने वाली थी. तो उसके पापा का चिंता करना और जेहन में उनके तमाम सवाल आना लाजिमी था. सब होने के बाद अंकल जब अपने घर को जाने के लिए उठ खड़े हुए तो  मुझे बुलाया और बोले...बेटा स्मृति दोनों साथ-साथ रहना. एक दूसरे का बहुत ध्यान रखना. हमारी नितिशा बहुत सीधी है...वह कभी हमसे इतनी दूर अकेले नहीं गई है. इसके साथ ही अंकल ने हाथ बढ़ाकर मुझे आशीर्वाद दिया और यह कहते हुए सीढ़ियों से उतर गए. भाई साहब ठीक है फिर अब एअरपोर्ट पर ही बच्चियों को विदा करते समय मुलाकात करते हैं.

जैसे-तैसे वो खुशी की रात भी आ गईजिसमें हमें दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर रिपोर्ट करना था. पापा, मम्मी और छोटी बहन शगुन सब के सब मुझसे ज्यादा खुश थे. इंडिया टीम में सेलेक्शन की बात सुनकर तो हम सब बहुत खुश थे ही. मुझे स्पेशल खुशी इस बात की भी थी कि ऑस्ट्रेलिया से वापसी में मुंबई से दिल्ली तक मैं और नितिशा एक साथ फ्लाइट से आएंगे. जिस बेइंतहाई अंदाज में मैं और नितिशा खुश थे...उन खुशगवार लम्हों के साथ चलते-फिरते कम से कम मैंने तो नहीं सोचा था किवक्त का महज एक झपट्टा उन खुशियों को नोंच डालने के लिए उतावला बैठा है. ऐसा उतावला जो मेरीनितिशा और नेगी अंकल-नेगी आंटी (नितिशा के पापा मम्मी) की जिंदगी को क्रूर ग्रहण की मानिंद नेस्तनाबूद कर देगा.

खैर...कहानी बढ़ती जा रही है....दिसंबर 2017 को सुबह करीब छह बजे फ्लाइट मुंबई पहुंची. वहां से ऑस्ट्रेलिया (एडिलेड) के लिए साढ़े ग्यारह बजे वाया सिंगापुरसिंगापुर एअरलाइंस की फ्लाइट से हम लोग दिन में करीब चार बजे सिंगापुर एयरपोर्ट पर पहुंच गए. सिंगापुर से एडिलेड के लिए जब फ्लाइट उड़ी तो मैंनितिशा और दीप्ति एक साथ की सीटों पर बैठे. फ्लाइट उड़ने के कुछ देर बाद ही नितिशा सो गई. मैं और दीप्ति कुछ देर बातें करके सो गए. दिल्ली से सिंगापुर तक की लंबी और टुकड़ों-टुकड़ों की लंबी और उबाऊ फ्लाइट जर्नी ने बदन तोड़ कर रख दिए थे. सिंगापुर से रात करीब दस बजे चली फ्लाइट दिन निकले एडिलेड पहुंच गई.

एडीलेड की फ्लाइट में (बाएं से) दीप्ति, स्मृति चौहान और नितिशा नेगी

एडीलेड की फ्लाइट में (बाएं से) दीप्ति, स्मृति चौहान और नितिशा नेगी

एडिलेड एअरपोर्ट पर हम सबने आधा घंटा बस का इंतजार किया. इस इंतजार के बीच ही हम सबको पेसिफिक स्कूल गेम्स ऑर्गनाइजर्स की तरफ से जारी आई कार्ड दे दिए गए. इन की विशेषता थी कि हम इनसे एडिलेड में कहीं भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल निशुल्क कर सकते थे. बस में नितिशादीप्ति और मेरी एक ही और अंतिम सीट थी. पंद्रह मिनट में होटल मर्कियोर पहुंच गए. वहां दस मिनट रिसेप्शन पर इंतजार के बाद हमें हमारे कमरों की चाबियां दे दी गईं. मेरी रूममेट थी शिवानी मोलू.

एक घंटे बाद ही हम ग्राउंड पर मैच खेलने पहुंच गए. यह हमारा पहला मैच था. नितिशा इस मैच में स्टॉपर पर उससे कहीं ज्यादा अच्छा खेली जितना हम लोग उसके बारे में सोचते थे. या जानते थे. जब मैच खेलकर ड्रेसिंग रूम में पहुंचे तो नितिशा का फोन चोरी हो चुका था. होटल पहुंचे तो नेगी अंकल (नितिशा के पापा) का फोन मेरे मोबाइल पर आ गया तो मैंने नितिशा की बात अंकल से अपने फोन पर ही कराई. तभी अंकल को पता चला कि नितिशा का फोन चोरी हो गया है. इस पर भी अंकल नितिशा से नाराज नहीं हुए, बल्कि उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं चोरी हो गया तो हो गया. अच्छे से खेल कर दिल्ली लौटो.

इसी तरह दिन गुजरते रहे. फुटबॉल मैच चलते रहे. कुछ हारे, कुछ जीते. 10 दिसंबर को समुद्र किनारे जाने का प्लान बना. हम सब करीब तीन बजे होटल से निकले और ट्रैम पकड़कर तीस से चालीस मिनट में बीच पर पहुंच गए. ट्रैम से उतरते ही बीच की ओर चल दिए. किनारे पर जाने से पहले ही मोबाइल पानी से दूर एक जगह सबने इकट्ठे करके रख दिए. डर था कि अगर कीमती मोबाइल पानी में गिर गए तो घर पहुंच कर डांट पड़ेगी.

मैं शिवानी और याचिका के साथ समुद्र किनारे रेत पर खेल ही रही थी कि अचानक बीच पर भगदड़ मची. मुझे दीप्ति की आवाज सुनाई पड़ी...कोई बचा लो उन्हें. वो डूब रहे हैं. इतने में ही रेस्क्यू वैन तेजी से दौड़ती हुई उस जगह पर जा रुकीजहां काफी भीड़ जमा दिखाई दे रही थी. मैं याचिका और शिवानी भी बेतहाशा भागती हुई उस ओर गए. वहां देखा तो युक्तिवाणी पंत और अनन्या अरोड़ा रेत पर बेहोश पड़ी हुई थीं. उनके कपड़े भीगे हुए थे. वाणी के मुंह से सफेद झाग निकल रहे थे. जबकि दीपिका वेंकटेश को आर्टिफिशियल सांस दिलाने में जुटे हुए थे मौके पर मौजूद मददगार.

दोबारा फिर शोर सुनाई दिया... अरे ये तो पांच थीं एक और कौन नहीं मिली हैआवाज देने वाला कौन था नहीं देखा...न ही उसकी आवाज पहचान पाई. तभी भीड़ में से एक आवाज आई... अरे इनमें नितिशा (बाहर निकाल ली गईं चार लड़कियों में) नहीं है. नितिशा को खोजने के लिए बचाव-दलकर्मी दोबारा पानी में कूदे. और दो से ढाई मिनट बाद ही दो हेलीकॉप्टर भी समुद्र के ऊपर उड़कर नितिशा की तलाश में जुटे दिखाई देने लगे.

कई घंटे बीत जाने पर भी जब नितिशा नहीं मिली तो समुद्र से बचाई गई लड़कियों के अस्पताल भेजने के बाद टीम की बाकी खिलाड़ियों को रेस्क्यू वैन में बैठाकर क्लब पहुंचा दिया गया. हमें क्लब में ही इंतजार करने को कहा गया. जब हम लोग नितिशा की सलामती की दुआएं कर रहे थेउसी समय हमारे पास ऑस्ट्रेलियाई पुलिस पहुंची. पुलिस वालों ने हम सब के बयान दर्ज किए. दो-ढाई घंटे की पूछताछ के बाद हम सबको एक बस में बैठाकर सुरक्षित होटल पहुंचा दिया गया. होटल में हम सबके दोबारा स्टेटमेंट रिकॉर्ड किए गए.

खाना रात का दिया गया मगर किसी का मुंह खाने के लिए नहीं खुल रहा था. सिर्फ याद आ रही थी तो नितिशा...नितिशा कहां होगी...कैसी होगी...कहीं गहरे समुद्र में तो नहीं चली गयी....अगले दिन यानी 11 दिसंबर 2017 की सुबह की हमारी फ्लाइट थी. इसलिए रात को हम सबको हमारे कमरों में पैकिंग करने के लिए भेज दिया गया था. अगले दिन सुबह करीब छह बजे होटल से निकल कर हम एडिलेड एयरपोर्ट पहुंच गए. एयरपोर्ट पर हम फ्लाइट में बैठने वाले थेउसी वक्त खबर मिली कि नितिशा का शव समुद्र से बरामद कर लिया गया है. इस एक आवाज ने मेरे बोलनेसोचने की ताकत छीन ली.

एडीलेड में मैच के बाद स्मृति चौहान

एडीलेड में मैच के बाद स्मृति चौहान

जैसे तैसे बिना नितिशा के एडिलेड से वाया सिंगापुर मुंबई पहुंच गयी. 12 दिसंबर को चार बजे मुंबई एअरपोर्ट पर पहुंची...वहां टिकट काउंटर पर बैठी लड़की ने पूछा ....आप नितिशा हैं...मैंने कहा नहीं मैं नितिशा नेगी नहीं स्मृति चौहान हूं...फिर सवाल किया गया मुझसे नितिशा कहां है.....तो मेरी मुठ्ठियां भिंच गईं...आंखों से आंसुओं की झड़ी लग गयी....जैसे तैसे मुझे जब वहां मौजूद लोगों ने संभाला तो मैं जवाब दे सकी कि ...मैम नितिशा इज नो मोर...और इसी के साथ मैं फिर बिलख कर रोने लगी....

मुंबई से दिल्ली तक मेरे बराबर वाली नितिशा की फ्लाइट में सीट खाली रही....दिल्ली में इंदिरा गांधी एअरपोर्ट पर उतरी और सामने शगुनमम्मी पापा की बांहों में चिपट कर फफक पड़ी....घर पहुंचने पर पापा ने नेगी अंकल को फोन किया....पापा ने उनसे कहा नेगी जी मैं आपसे क्या कहूं ...क्या पूछूं...इस पर उधर से नेगी अंकल ने कहा...चौहान साहबआपकी बिटिया तो घर पहुंच गयी होगी ठीक-ठाकहमारी कभी नहीं आएगी...मेरी तो पूरी ज़िंदगी बेटी के इंतजार में ही गुजरेगी...इसके साथ ही बिलखते हुए नेगी अंकल और पापा ने मोबाइल डिस्कनेक्ट कर दिया.

(स्मृति चौहान, पेसिफिक स्कूल गेम्स के लिए एडिलेड गई भारतीय गर्ल्स फुटबॉल टीम की सदस्य थीं)

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