विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

रिव्यू, बेयरफुट टू बूट्स: भारतीय फुटबॉल का इतिहास जानने का सरल तरीका

किताब की खास बात ये है कि इसमें टीम के साथ-साथ महान खिलाड़ियों के बारे में विस्तृत जानकारी दी है

Lakshay Sharma Updated On: Oct 05, 2017 04:32 PM IST

0
रिव्यू, बेयरफुट टू बूट्स: भारतीय फुटबॉल का इतिहास जानने का सरल तरीका

अगर आप फुटबॉल फैन है, लेकिन आपकी दिलचस्पी सिर्फ विदेशी टीमों और क्लबों तक है तो आपको फुटबॉल इतिहासकार और पत्रकार नोवी कपाडिया की लिखी हुई किताब ‘बेयरफुट टू बूट्स’ जरूरी पढ़नी चाहिए.

अगर आपको लगता है कि भारतीय फुटबॉल टीम शुरू से ही फिसड्डी साबित रही है तो इस किताब को पढ़ने के बाद आपकी गलतफहमी दूर हो जाएगी.

किताब के बारे में चर्चा करने से पहले आपको किताब के लेखक के बारे में जानना भी बहुत जरूरी है. नोवी कपाडिया पत्रकार हैं. वह ईएसपीएन, टेलीग्राफ और स्पोर्ट्स वर्ल्ड जैसे बड़े ग्रुप के लिए काम कर चुके हैं. इसके साथ ही वह फुटबॉल के जाने माने कॉमेंटेटर भी हैं. उन्होंने भारतीय फुटबॉल के बदलते स्वरूप को काफी करीब से देखा है.

नोवी कपाडिया ने अपने अनुभवों को इस किताब के जरिए फैन को बताने की कोशिश की है. इस किताब में उन्होंने जिस तरह भारत के फुटबॉल इतिहास को दर्शाया है वह काबिले तारीफ है.

शायद ये आपको भी ना पता हो कि ईस्ट बंगाल और मोहन बागान के बीच प्रतिद्वंद्विता कितनी पुरानी और बड़ी है. किताब में जब मोहन बागान की भारतीय इतिहास की सबसे यादगार जीत का भी विस्तृत जिक्र है. जब इस भारतीय क्लब ने 1911 में आईएफए शील्ड के फाइनल में जगह बनाई.

बैंगलोर मुस्लिम्स ने 1937 के रोवर्स कप में जबरदस्त प्रदर्शन से सबको चौंकाया था उसका उल्लेख भी इस किताब में बड़ी बारीकी से किया गया है. जब भारत ने 1962 में जकार्ता में हुए चौथे एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीता, उस गौरवपूर्ण पल का इतिहास भी आपको इस किताब के जरिए पढ़ने को मिलेगा. इस जीत के बाद भारतीय टीम को एशिया की ब्राजील टीम कहा गया.

अगर भारतीय टीम के बारे में बात की जाए तो 1950-60 तक भारतीय फुटबॉल टीम काफी मजबूत मानी जाती थी. भारतीय टीम में ऐसे कई खिलाड़ी थे जो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ फुटबॉलरों को टक्कर दे सकते थे. पीके बनर्जी, चुन्नी गोस्वामी, तुलसीदास बलराम और जरनैल सिंह जैसे दिग्गज खिलाड़ी भारतीय टीम में खेला करते थे. उस समय के फुटबॉलर काबिलियत के मामले में दुनिया के टॉप फुटबॉलरों में शुमार थे.

शुरुआती सालों में भारत में फुटबॉल कोलकाता, बेंगलुरु, दिल्ली, चेन्नई और पंजाब तक ही सीमित था. उस समय जब क्लब मैच होते थे या लोकल टीम भी भिड़ती तो स्टेडियम में फैंस का हुजूम लगता था.

50 और 60 के दशक में भारतीय फुटबॉल टीम को खासी सफलता मिली. भारतीय टीम ने 1951 और 1962 के एशियम गेम्स में गोल्ड मेडल पर कब्जा जमाया था. वहीं 1956 के मेलबर्न ओलिंपिक में वह चौथा स्थान हासिल करने में कामयाब रही थी.

इस किताब की खास बात ये है कि इसमें टीम के साथ-साथ उन महान खिलाड़ियों के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है. उन खिलाड़ियों के बारे में बताया गया है जिनकी वजह से भारतीय फुटबॉल इतना सफल था.

इसके साथ ही साल दर साल भारत में फुटबॉल किस तरह बदला, इस बारे में आपको यह किताब पढ़ने के बाद पता चल जाएगा.

लेखकः नोवी कपाडिया

प्रकाशक: पेंग्विन

कीमतः 399 रु.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi